भारतकोश
काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary

महाकवि दण्डी द्वारा

DevanagariHindipublished270 पृष्ठ

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३।८४] ३. वर्णनियम : (१.१) स्वरचतुष्टयनियम चित्रबन्ध १०५ (१.१) आम्नायानामाहान्त्या वाग् गोती रीतोः, प्रीतोर्भीतीः । (१.१) शास्त्रोंका निष्कर्ष रूप वाणी (दर्शन शास्त्र) गाना बजाना तत्त्वं वेत्ति स्वयं दण्डी, के वयं मन्द-धी-हताः ? युक्तिसोपानमाश्रित्य गम्यते महतां मनः ॥ इन सब विधाओंका प्रयोग दण्डीसे पूर्वके किसी काव्यमें उपलब्ध नहीं है। किरातार्जुनीयमें (३) चतुर्वर्णनियम (१५।५में), द्विवर्णनियम (३८में), एकवर्णनियम (१५) उपलब्ध हैं। (२) स्थाननियम (७ और २६ में) एक अन्य प्रकारसे (किसी एक स्थानविशेषसे उच्चार्य वर्णोंका प्रयोग न करके) ओष्ठ्य वर्णोंके बहिष्कारसे उपलब्ध है। यहाँ तो दो श्लोकोंमें ओष्ठ्य वर्णोंके बहिष्कारकी बात है, दण्डीने तो पूरे एक उच्छ्वासमें ओष्ठ्य वर्णोंका बहिष्कार इसलिये किया है, क्योंकि उसमें वक्ता नायकका ओंठ उसकी ललित वल्लभाने प्रेमोन्मादमें इतने जोरसे काटा कि वह ओष्ठ्य स्वरों और व्यञ्जनोंका उच्चारण नहीं कर सकता था।१ माघने (१९वें) सर्गमें चित्र- बन्धोंका प्रारम्भ ही चतुर्वर्णनियमसे (१६।३में) किया है। द्वयक्षर श्लोक ६६, ८४, ८६, ६४, ६८, १००, १०४, १०६, १०८ में तथा एकाक्षर श्लोक ११४ में हैं। (२) स्थाननियम के माघने दो श्लोक दिये हैं : निरोष्ठ्य श्लोक (११), अतालव्य श्लोक (११०)। इस विवेचनसे स्पष्ट है कि दण्डीका निरूपण प्रयोगोंमें उपलब्धिपर ही आधारित नहीं है; अपितु उन्होंने इस प्रकारके निबन्धनकी विवेचना शास्त्र- कारसे अपेक्षित मर्यादा एवं गरिमाके साथ स्वतन्त्र ऊहके रूपमें की है। उनके आसपासके भामह, उद्भट आदि आचार्य दृष्टिकी सूक्ष्मता, विशालता, मर्मस्पर्शिता, एवम् पदार्थके सौन्दर्यको अधिकसे अधिक आयामोंमें देख सकने की क्षमतामें दण्डीके कहीं आसपास भी नहीं ठहरते। एकमात्र अपवाद पहले मुनि भरत और बादमें आनन्दवर्धन हैं ॥ ८३ ॥ (१) स्वरनियम चित्रबन्ध—(१) स्वरचतुष्टयनियम : इस श्लोकमें कविने विद्युन्माला छन्दमें प्रथम पादमें 'आ' स्वरका, द्वितीयमें 'ई' का, तृतीय में 'ओ' का और चौथे पादमें 'ए' का प्रयोग आठ-आठ बार किया है । इस १. दशकुमारचरित, छठे उच्छ्वासका अन्तः : स (मन्त्रगुप्तः) किल कर- कमलेन किञ्चित् संवृताननो, ललित-वल्लभा-रभस-दत्त-दन्त-क्षत-व्यसन- विह्वलाधर-मणिर् निरोष्ठ्य-वर्णमात्म-चरितमाचचक्षे ।