भारतकोश
काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary

महाकवि दण्डी द्वारा

DevanagariHindipublished270 पृष्ठ

पृष्ठ 127, कुल 270 में से

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पृष्ठ 127

दन्त्यीकरणकी पुरानी प्रकृत प्रवृत्तिको संस्कृतमें स्वीकारनेकी दिशामें ही एक प्रयास था, जो अन्तस्थके स्तरपर तो पनपा, पर स्वरके स्तरपर नहीं पनप पाया। इसे ही 'रलयोरभेदः', 'डलयोरैक्यम्', 'ऌ-लृवर्णयोर्मिथः सावर्ण्यं वाच्यम्' (अष्टा० पर वार्तिक) के रूपमें कहा गया है। (२) स्थाननियम चित्रबन्ध—जब कवि अपनी रचनामें एक ही स्थानसे उच्चार्य स्वरों और व्यञ्जनोंका प्रयोग करता है, तब काव्य स्थाननियमके कारण श्रव्य शोभासे युक्त हो जाता है। (३) वर्णनियमवान् चित्रबन्ध—शिक्षावेदाङ्गके अनुसार यद्यपि 'वर्ण' शब्द पदकी घटक ध्वनिके लिये प्रयुक्त है, जो 'स्वर' और 'व्यञ्जन' दो प्रकारकी है, पर 'स्वर' के साहचर्यसे यहाँ यह पारिशेष्य नियमसे 'व्यञ्जन' अर्थमें है। स्वरनियमके समान ही यह भी पूरे श्लोकमें एक वर्ण, दो वर्ण, तीन वर्ण और चार वर्ण तक तो कवियोंको चारुत्वनिबन्धनके रूपमें अभीष्ट है। जितने अधिक वर्णोंका प्रयोग होगा, वह बन्ध उतना सुकर होता जायेगा। दुष्करको प्रेम करने वाले कविमल्लोंको उसमें अपनी सामर्थ्य दिखानेका अवसर नहीं मिलता। अतः वह इष्ट नहीं है। आचार्यने इन तीनों प्रकारोंका प्रदर्शन चार-चार उदाहरणोंसे किया है। अत एव लक्षणवाक्यमें 'चतुः-प्रभृति' का अर्थ अधिकतम सङ्ख्या ४ ही टीकाकारोंने बताई है। किन्तु वर्णनियमके क्रममें प्रदत्त प्रथम उदाहरण (६२) में नियत स्वर, व्यञ्जन और दोनोंके स्थानोंकी सङ्ख्या पाँच-पाँच है। अतः 'चार' की सङ्ख्या इयत्ताकी अवधि नहीं बताती है, जैसा कि तरुणवाचस्पतिने माना है, अपितु यहाँ 'प्रभृति' शब्द 'आदि' अर्थमें है। श्लोककी संयुक्त अक्षरसङ्ख्यामें चार-पाँचसे अधिक स्वरों, व्यञ्जनों अथवा इनसे अधिक स्थानोंसे उच्चार्य वर्णोंसे श्लोककी रचना होगी, तो चारुत्व कम होता जायेगा। अतः 'चतुः-प्रभृति' उपलक्षक है अमहर्ती सङ्ख्याका। जितने ही कम स्वरों, स्थानों और व्यञ्जनोंका नियमन होगा, काव्य उतना ही अधिक दुष्कर होगा। सङ्ख्या जितनी बढ़ती जायेगी, दुष्करता उतनी कम होती जायेगी और परिणामतः चित्रता भी। 'चतुः-प्रभृति' में अवधिवाचक शब्द न देनेसे तथा चारसे अधिकका नियमन ६२वें श्लोकमें प्रस्तुत करनेसे आचार्यका यही अभिप्राय प्रतीत होता है। १. इस वार्तिकके खण्डनार्थ कृपो रो लः, वैयाकरणसिद्धान्तकौमुदी, भ्वादिपर हमारी भवतोषिणी, पृष्ठ ५२४ देखें।

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