काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary
महाकवि दण्डी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३।८३] ३. वर्ण-नियमवान् चित्र बन्ध : (१) स्वरणियम १०३ (१) स्वरणियमवान् चित्र बन्ध—उच्चारण स्थानके भेदसे भिन्नताको प्राप्त करने वाले अकार, इकारादि स्वर मात्रा, नासिक्यानासिक्यताके कारण अवान्तर भेदोंसे युक्त हैं। लौकिक भाषामें उदात्तादि बलाघातरूप स्वरोंकी पहचान वैदिक कालके उतारसे ही नहीं रही है। अतः उनके कारण सम्पन्न स्वरभेद यहाँ अपेक्षित नहीं है। १ अवान्तर भेदोंको दृष्टिमें न रखकर मुख्यतया (स्थानभेदके कारण) भिन्न स्वरोंका श्लोकमें यदि किसी नियमसे, व्यवस्थासे, प्रयोग होता है, तो यह स्वरणियम होता है। आचार्यका कहना है कि स्वरोंकी सङ्ख्या यदि एक पादमें एक स्वरकी दृष्टिसे चार तक रहती है, तो चारों पादोंमें एक स्वर दो अर्धोंमें एकेकके हिसाबसे, दो स्वरों, चारों पादोंमें मिले-जुले या क्रमिक तीन स्वरों और चार पादोंमें एकेक करके चार स्वरों तकके प्रयोग वाले बन्ध दुष्कर ही होंगे। आचार्यकी चिन्तनपरम्पराको देखते हुए इस व्यवस्थामें और प्रकार भी उपलक्षित समझने चाहिये। स्वर (१) कण्ठ्य, (२) तालव्य, (३) ओष्ठ्य और (४) मूर्धन्यके भेद से शुद्ध अवस्थामें अ, इ, उ, ऋ चार हैं। इन्हें शिक्षाशास्त्रमें 'समानाक्षर' (simple vowels) कहा जाता है। कण्ठ और तालु तथा कण्ठ और ओष्ठ दो-दो स्थानोंमें निष्पन्न होनेसे ए, ऐ ओ तथा औ भी चार हैं। इन्हें 'सन्ध्य- क्षर' (diphthongs) कहा जाता है। यों तो दन्त्य 'ऌ' भी समानाक्षरोंमें संस्कृतमें किसी समय था। पर बहुत प्राचीन कालसे ही वह √ कृप् के एक रूप √ कॢप् के ही कुछ शब्दोंमें सीमित है। २ वस्तुतः यह मूर्धन्य अक्षरोंके १. वादीजीने 'स्वर' के विवरणमें यहाँ उदात्तानुदात्तस्वरितके भेदसे भिन्नता की चर्चा की है। वह शास्त्रकी दृष्टिसे भले ठीक हो, पर प्राप्तिकी दृष्टिसे ठीक नहीं है। २. ऋक्प्रातिशाख्य १।१३ : अष्टौ समानाक्षराण्यादितः । ततश्चत्वारि सन्ध्यक्षराण्युत्तराणि । एते स्वराः । ६ : सर्वः शेषो व्यञ्जनान्येव । १३।३४-३५ : रेफोऽस्त्यूकारे च परस्य चार्धे पूर्वे ह्रसीयांस्तु न वेतर- स्मात् । मध्ये सः ।। तस्यैव लकारभावे धातौ स्वरः कल्पयताल्ऌकारः ।। सन्ध्यानि सन्ध्यक्षराण्याहुरेके; द्विस्थानतैतेषु तथोभयेषु ।। ३८ सन्ध्येष्वकारोऽर्धमिकार उत्तरं युजोरुकार इति शाकटायनः ।। ३६ मात्रासंसर्गादवरेऽपृथक्श्रुती ('अवरे पृथक् श्रुती' इति वा योजना) ।।४० ह्रस्वानुस्वारव्यतिषङ्गवत् परे ।। ४१