काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary
महाकवि दण्डी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१०२ काव्यादर्श [३।८३ ३. यः (१) स्वर-(२) स्थान-(३) वर्णानां नियमो, दुष्करेष्वसौ । इष्टश्चतुःप्रभृत्येषु दृश्यते; सुकरः परः ॥ ८३ ॥ ३. (१) स्वरों, (२) उच्चारण-स्थानों (३) वर्णों (व्यञ्जनों) की जो व्यवस्था होती है, वह चार आदि/तक सङ्ख्यामें दुष्कर रूपमें अभीष्ट है । उससे भिन्न, अर्थात् अधिक सङ्ख्यामें, नियम सुकर होता है । (इष्टसे) पर (अन्य, अर्थात् अनिष्ट) है ॥ ८३ ॥ भाव सङ्कर दो हैं : (१) प्रतिलोमयमक और सर्वतोभद्रका; (२) स्वर- नियमचित्रालङ्कार और सर्वतोभद्रका । यमक और स्वरनियम चित्रोंकी संसृष्टि एक है । इस बन्धकी दुष्करता स्पष्ट है । सा मा या मा मा या मा सा । मा रा ना या या ना रा मा । या ना वा रा रा वा ना या ॥ मा या रा मा मा रा या मा ॥ ॥ मा या रा मा मा रा या मा ॥ या ना वा रा रा वा ना या । मा रा ना या या ना रा मा । सा मा या मा मा या मा सा ॥ ८२ ॥ ३. वर्णनियमवान् चित्र बन्ध—(१) वर्णोंकी आवृत्तिसे अनुप्रास, (२) वर्णसमुदायकी सुकर, दुष्कर, अनुलोम, प्रतिलोम आवृत्तियोंसे यमक, (३) वस्तुविशेषके स्वरूपको प्रकट करने वाले वर्णविन्याससे आकारबन्धके रूपमें तीन प्रकारके चित्र (रचनाविधानकी दृष्टिसे विचित्र, आश्चर्यकारी) शब्दालङ्कार बतानेके बाद आचार्य दण्डी अब ८३-६५ में वर्णोंके व्यवस्था- युक्त, नियमित, प्रयोगसे होनेवाली शब्दलभ्य शोभाके विधायक अलङ्कारका निरूपण कर रहे हैं । रचनाविधानकी दृष्टिसे यह व्यवस्थित निबन्धन भी असाधारण है, अद्भुत है, अतएव चित्र है । वर्णोंकी व्यवस्थासे लभ्य यह अलङ्कार वर्णोंके दो प्रकारों—स्वर और व्यञ्जन तथा उन दोनोंके भी आधार उच्चारणस्थानका नियत स्वरूप तथा सङ्ख्यामें प्रयोग करनेपर निर्भर करता है । 'स्वर' और 'व्यञ्जन' दोनोंसे सम्बद्ध होनेके कारण आचार्यने 'स्थान' का निर्देश मध्यमें किया है ।