भारतकोश
काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary

महाकवि दण्डी द्वारा

DevanagariHindipublished270 पृष्ठ

पृष्ठ 124, कुल 270 में से

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पृष्ठ 124

३।८२] २. चित्र बन्ध : (३) सर्वतो-भद्र १०१ (३) सामायामामा या मासा मारनायायाना रामा । यानावारांरावाऽऽनाया मायारामा मारायामा ॥१ ८२ ॥ (३) वह सुन्दरी मधुमासके कारण (मास) मापसे रहित (अम) विस्तार (आयाम) वाले रोग (आम) से युक्त (सामायामा) है, जो कामदेव (मार) के जाल (आनाय) में आगमन (आयान) से युक्त है, प्रियतमको गमन (यान) से रोकने (आवार) की गुहारों (आराव) वाली, प्राणों (आन) को नहीं प्राप्त करने वाली (अ-या, अर्थात् प्रेमकी अत्यन्त तीव्र अवस्थामें स्थित होनेके कारण मरणके निकट पहुँची हुई, आनाया) है। लीलाओं (मायाओं) से आनन्दित करने वाली (रामा) काम (मार) के विस्तार (आयाम) से युक्त हो गई है ॥ ८२ ॥ डा० श्री धर्मेन्द्रकुमार गुप्तने उपर्युक्त सम्पूर्ण चित्रको उल्टा करके भी, उक्त क्रमसे ही, इससे पादोद्धार किया है।२ पर इसमें लिपिको ऊर्ध्वमुख करके लिखनेके अतिरिक्त कोई वैचित्र्य नहीं है। यों तो अगर वर्णोंको तिरछा करके लिख दिया जाये, तब भी तिरश्चीन चित्र बन जायेगा । वह भी दक्षिणामुख और उत्तरामुख दो प्रकारका हो सकता है। अतः यह सब व्यामोह मात्र है ॥ ८१ ॥ (३) सर्वतो-भद्र चित्र बन्ध – बयासीवें श्लोकमें कविने किसी सुन्दरीकी प्रेमपीरका वर्णन अनुष्टुभ् जातिके विद्युन्माला छन्दमें किया है। पीड़ाके आयामके वर्णनके लिये सर्वदीर्घाक्षर यह छन्द, उपयुक्त है। इसे आगे (८७वें श्लोकके रूपमें ११० पृष्ठ पर) स्वरनियमके उदाहरणमें भी दिया गया है। यहाँ यह सर्वतोभद्र मण्डलके आकारवाली विचित्र रचना (चित्र बन्ध) के उदाहरणके तौरपर दिया गया है। इसके निबन्धनमें व्यपेत पादाद्यन्त प्रतिलोम यमक तथा अव्यपेत पादमध्य प्रतिलोम यमकका उपयोग होता है। परन्तु प्रतिलोम रचना उपाय है सर्वतोभद्र आकारकी प्राप्तिका । अतः मुख्य चित्रता सर्वतोभद्रके कारण होनेसे यह उदाहरण उसीका माना जायेगा। इसी प्रकार दीर्घाक्षर नियम भी सर्वतोभद्रके अङ्गके रूपमें ही शोभायुक्त है। अतः यहाँ प्रतिलोमयमक चित्रालङ्कार, स्वरनियम चित्रालङ्कार और सर्वतोभद्र चित्रालङ्कार, इन तीनों शब्दालङ्कारोंका सङ्कर है। अङ्गाङ्गि- १. काव्यादर्श, सुदर्शना, मेहरचन्द लछमनदास, दिल्ली, पृष्ठ ३३२ । २. अन्वय : सा रामा अमायामामा, या मासा मारनायायाना, यानावारा- रावाना-या । माया-रामा मारायामा ।