काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary
महाकवि दण्डी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१०० काव्यदर्श [ ३ । = १ (२) मनोभव, तवानीकं नोदयाय न मानिनी । भयादमेयामामावा वयमेनोमया नत ॥ ८१ ॥ (२) हे मनमें होने वाले (कामदेव), मानवती सुन्दरी रूपी तुम्हारी सेना उदय (विजय) में समर्थ नहीं, ऐसा नहीं है । हे निकृष्ट, (उसके) भयसे अपरिमेय विरहज्वरसे बँधे हुए हम पापी हैं (जो मिलन नहीं हो पा रहा है) ॥ ८१ ॥ कर्मकाण्डमें 'सर्वतोभद्र' मण्डलके समान कोष्ठबन्धके कारण इसे यह नाम दिया गया है ॥ ८० ॥ (२) अर्ध-भ्रम चित्र बन्ध—इस श्लोकमें कविने किसी प्रेमीकी विप्रलम्भ- रतिका वर्णन उसके द्वारा कामदेवको उलाहना दिलानेसे किया है : काम- देवकी सुन्दरी रूपी सेना बड़ी मानिनी (हठीली) है; वह जिसे पराजित करना धार ले, उसे पराजित किये बिना चैन नहीं लेती; हमेशा सफल रहने के कारण भी उसे बड़ा मान है । इस प्रकारकी यह सेना कामदेवके लिये उदयकारी (विजयदायिनी) न हो, यह सम्भव नहीं है । वह मुझसे रूठी है । यह हमारा ही पाप है कि हम उस सेनाके भयसे अपरिमित आम (रोग, पीड़ा, प्रेम ज्वर) के बन्धनमें जकड़े बैठे हैं । हे काम, तुम बड़े निकृष्ट (नत) हो, जो इस प्रकार पीड़ा दे रहे हो । अमेयामामावाः—अमनम् आमः, अम रोगे (भ्वादि०), भावे घञ् । अमेयः मातुं न शक्यश्चासावामः अमेयामः । आ समन्तात् मनसि, बुद्धौ, सर्वा- ङ्गेषु च मवनं मावः बन्धनम् आमावः । अमेयामस्य आमावः (षष्ठी तत्पुरुष) अमेयामामाव एषामिति अमेयामामावाः (मत्वर्थीय अच्) । १ ३ ५ ७ ८ ६ ४ २ | म नो भ व ↑ | त वा नी कं | नो द या य | न मा नि नी । | भ या द मे | या मा मा वा ↓ | व य मे नो | म या न त ॥ ————→ ————→