भारतकोश
काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary

महाकवि दण्डी द्वारा

DevanagariHindipublished270 पृष्ठ

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३।८०] २. चित्र बन्ध : (२) अर्ध-भ्रम, (३) सर्वतो-भद्र ६६ (२) प्राहुरर्धभ्रमं नाम श्लोकार्ध-भ्रमणं यदि । (३) तदिष्टं सर्वतोभद्रं भ्रमणं यदि सर्वतः ॥ ८० ॥ (२) अगर श्लोकके अर्धोंका भ्रमण होता है, तो 'अर्धभ्रम' नामक चित्रबन्ध कहते हैं । (३) अगर सब दिशाओंमें भ्रमण हो, तो वह 'सर्वतोभद्र' इष्ट है ॥ ८० ॥ यहाँ पूर्व वर्ण पूर्वार्धका एवम् उत्तर वर्ण उत्तरार्धका, फिर पूर्वार्धका, फिर उत्तरार्धका इस प्रकार एकेक अक्षर छोड़कर लेनेसे उत्तरार्धका ही पाठ निष्पन्न होगा । उत्तरार्धका पूर्व वर्ण और पूर्वार्धका उत्तरवर्ण लेनेसे श्लोकका पूर्वार्ध ही निष्पन्न होता है । इस प्रकार ऊपर नीचेका और नीचे ऊपरका वर्ण लेनेसे गोमूत्रधाराका सा आकार बनता है । अतः इसे 'गोमूत्रिका चित्रबन्ध' कहते हैं । द म रा णा पा स्त्रो ये यम् ∧ ∨ ∨ ∨ ∨ ∨ म नो दि क्षी म ङ्गा ज द ∨ ∧ ∧ ∧ ∧ ∧ ∧ दे य तत् ण न याञ् लिं धे ॥ ७६ ॥ (२) अर्ध-भ्रम चित्र बन्ध—श्लोकके चारों पादोंको चार पङ्क्तियोंमें लिख लें । चारों पङ्क्तियोंके प्रथम अक्षरोंको ऊपरसे नीचेकी ओर पढ़नेपर आठ पादार्ध बन गये । अब प्रथम और अन्तिम पङ्क्तिको पढ़नेसे श्लोकका पहला पाद निष्पन्न होगा, द्वितीय और सप्तमसे दूसरा, तृतीय तथा षष्ठसे तीसरा एवं चतुर्थ तथा उसके बाद पञ्चम अक्षरोंको ऊपरसे नीचेकी ओर पढ़नेसे चौथा पाद निष्पन्न होगा । इसे ही 'अर्ध-भ्रमक' कहते हैं । (३) सर्वतो-भद्र चित्र बन्ध—यदि श्लोकके घटक वर्णोंका ऊपरसे नीचे, नीचेसे ऊपर, दायेंसे बाएँ और बायेंसे दायें सब दिशाओंमें भ्रमण होनेसे श्लोक अव्याहत रहता है, तो इसे 'सर्वतो-भद्र' विचित्र बन्ध कहते हैं । इस प्रकार सब दिशाओंमें भ्रमणके लिये श्लोकके चार पादोंको अर्धभ्रमके समान चार पङ्क्तियोंमें लिखनेके बाद उन्हीं पादोंको चार पादोंमें नीचेसे ऊपर की ओर अर्धभ्रमसे व्युत्क्रम करके लिखा जाता है । इस प्रकार अनुष्टुप्के ६४ अक्षरोंको ६४ कोष्ठकोंमें लिखनेपर चाहे जिधरसे पढ़ें, आठ अष्टकोंसे चार पाद अनुलोम विधिसे और चार पाद प्रतिलोम विधिसे निष्पन्न होकर श्लोक पूरा हो जाता है । इस वैचित्र्यके कारण यह बन्ध 'चित्र' भी हो जाता है, दुष्करता तो स्वतः स्पष्ट है ही । कोषोंमें इसे 'काव्यचित्र' कहा है ।१ १. सर्वतोभद्र इत्युक्तः काव्यचित्रे, गृहान्तरे । मेदिनीकोष २८।३०८