काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary
महाकवि दण्डी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६८ काव्यादर्श [३।७६ मदनो मदिराक्षीणामपाङ्गास्त्रो जयेदयम् । मदेनो; यदि तत् क्षीणमनङ्गायाञ्जलिं दधे' ॥ ७६ ॥ मादक नयनों वालियोंके अपाङ्ग (कटाक्ष) रूपी अस्त्र वाला यह मदन (मस्त, मदहोश बना देने वाला कामदेव) मेरे पापको जीत ले। अगर वह (पाप) क्षीण हो जाये, तो मैं देहरहित (कामदेव) को अञ्जलि प्रदान करता हूँ ॥ ७६ ॥ पादोंसे उत्तरार्ध । इन दोनों अर्धोंमें पूर्व और उत्तर अर्धोंमें क्रमशः एकेक वर्णका व्यवधान करके ऊपर-नीचे, वर्णोंको एक क्रममें रखनेसे वही वर्ण- विन्यास निष्पन्न होता है, जो मिश्रित होने वाले पादोंका है। बैलकी मूत्र- धाराके समान ऊपर नीचे गति करनेसे गोमूत्रका आकार बन जानेसे, उसके सादृश्य वाला यह चित्र बन्धन 'गोमूत्रिका बन्ध' कहलाता है। गोमूत्रिकाके आकारकी निष्पत्तिके लिये पृथक् प्रयत्नसे निष्पाद्य होनेके कारण यह बन्ध दुष्कर है ॥ ७८ ॥ (१) गोमूत्रिका चित्र बन्धका उदाहरण—'मदनो मदिराक्षीणा०' (७६) में कविने किसी मादक नयनों वाली सुन्दरीके नयनशरोंसे आहत युवाकी विप्रलम्भ रतिका चित्रण प्रकृत श्लोकमें किया है। वह युवा सुन्दरीके कटाक्षरूपी विकट शरको कामदेवका अस्त्र समझता है। वह प्रार्थना करता है कि इस अलौकिक अस्त्रसे कामदेव उसके इस पापको नष्ट कर दे, जिसके कारण उसका अपनी प्रियासे सङ्गम नहीं हो पा रहा है। यदि युवाका वह पाप कामदेवने क्षीण कर दिया, और उसे उसकी प्रियाका सङ्गसुख प्राप्त हो गया, तो वह कामदेवको प्रणामाञ्जलि प्रदान करेगा। यहाँ 'एनस्' (पाप) को जीतने (जयेत्) की अपेक्षा वादिप्रोक्त 'दहेत्' पाठ अधिक उचित है। इसी प्रकार 'अञ्जलि देने' से 'जलाञ्जलि' या 'तिला- ञ्जलि' देना व्यक्त होता है, जो 'अनङ्ग' कहनेसे कामकी मृत्युका अनिष्ट अर्थ सूचित करता है। अतः 'ददे'के स्थानपर 'दधे' उचित है : धारण प्रणामाञ्जलिका मस्तकसे होता है; यही अभीष्ट है। 'मदिराक्षीणाम्' का सम्बन्ध समस्त पद 'अपाङ्गास्त्रः' (तत्पुरुषगर्भित बहुव्रीहि) के अवयव 'अपाङ्ग' से उसी तरह है, जैसे 'देवदत्तस्य गुरुकुलम्' वाक्यमें देवदत्तका सम्बन्ध 'गुरुकुल' समुदायके अवयव गुरुके साथ अवयवीसे सम्बन्धके माध्यमसे अवयवसे सम्बन्धके रूपमें होता है। १. 'तरुण० : ० स्त्रं । वादीटीका : '० स्त्रं जयन्दहेत् ।' इति पाठः । 'ददे' को पाठभेद तथा 'दधे' को स्वीकृत पाठ माना है।