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काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary

महाकवि दण्डी द्वारा

DevanagariHindipublished270 पृष्ठ

दन्त्यीकरणकी पुरानी प्रकृत प्रवृत्तिको संस्कृतमें स्वीकारनेकी दिशामें ही एक प्रयास था, जो अन्तस्थके स्तरपर तो पनपा, पर स्वरके स्तरपर नहीं पनप पाया। इसे ही 'रलयोरभेदः', 'डलयोरैक्यम्', 'ऌ-लृवर्णयोर्मिथः सावर्ण्यं वाच्यम्' (अष्टा० पर वार्तिक) के रूपमें कहा गया है। (२) स्थाननियम चित्रबन्ध—जब कवि अपनी रचनामें एक ही स्थानसे उच्चार्य स्वरों और व्यञ्जनोंका प्रयोग करता है, तब काव्य स्थाननियमके कारण श्रव्य शोभासे युक्त हो जाता है। (३) वर्णनियमवान् चित्रबन्ध—शिक्षावेदाङ्गके अनुसार यद्यपि 'वर्ण' शब्द पदकी घटक ध्वनिके लिये प्रयुक्त है, जो 'स्वर' और 'व्यञ्जन' दो प्रकारकी है, पर 'स्वर' के साहचर्यसे यहाँ यह पारिशेष्य नियमसे 'व्यञ्जन' अर्थमें है। स्वरनियमके समान ही यह भी पूरे श्लोकमें एक वर्ण, दो वर्ण, तीन वर्ण और चार वर्ण तक तो कवियोंको चारुत्वनिबन्धनके रूपमें अभीष्ट है। जितने अधिक वर्णोंका प्रयोग होगा, वह बन्ध उतना सुकर होता जायेगा। दुष्करको प्रेम करने वाले कविमल्लोंको उसमें अपनी सामर्थ्य दिखानेका अवसर नहीं मिलता। अतः वह इष्ट नहीं है। आचार्यने इन तीनों प्रकारोंका प्रदर्शन चार-चार उदाहरणोंसे किया है। अत एव लक्षणवाक्यमें 'चतुः-प्रभृति' का अर्थ अधिकतम सङ्ख्या ४ ही टीकाकारोंने बताई है। किन्तु वर्णनियमके क्रममें प्रदत्त प्रथम उदाहरण (६२) में नियत स्वर, व्यञ्जन और दोनोंके स्थानोंकी सङ्ख्या पाँच-पाँच है। अतः 'चार' की सङ्ख्या इयत्ताकी अवधि नहीं बताती है, जैसा कि तरुणवाचस्पतिने माना है, अपितु यहाँ 'प्रभृति' शब्द 'आदि' अर्थमें है। श्लोककी संयुक्त अक्षरसङ्ख्यामें चार-पाँचसे अधिक स्वरों, व्यञ्जनों अथवा इनसे अधिक स्थानोंसे उच्चार्य वर्णोंसे श्लोककी रचना होगी, तो चारुत्व कम होता जायेगा। अतः 'चतुः-प्रभृति' उपलक्षक है अमहर्ती सङ्ख्याका। जितने ही कम स्वरों, स्थानों और व्यञ्जनोंका नियमन होगा, काव्य उतना ही अधिक दुष्कर होगा। सङ्ख्या जितनी बढ़ती जायेगी, दुष्करता उतनी कम होती जायेगी और परिणामतः चित्रता भी। 'चतुः-प्रभृति' में अवधिवाचक शब्द न देनेसे तथा चारसे अधिकका नियमन ६२वें श्लोकमें प्रस्तुत करनेसे आचार्यका यही अभिप्राय प्रतीत होता है। १. इस वार्तिकके खण्डनार्थ कृपो रो लः, वैयाकरणसिद्धान्तकौमुदी, भ्वादिपर हमारी भवतोषिणी, पृष्ठ ५२४ देखें।

३।८४] ३. वर्णनियम : (१.१) स्वरचतुष्टयनियम चित्रबन्ध १०५ (१.१) आम्नायानामाहान्त्या वाग् गोती रीतोः, प्रीतोर्भीतीः । (१.१) शास्त्रोंका निष्कर्ष रूप वाणी (दर्शन शास्त्र) गाना बजाना तत्त्वं वेत्ति स्वयं दण्डी, के वयं मन्द-धी-हताः ? युक्तिसोपानमाश्रित्य गम्यते महतां मनः ॥ इन सब विधाओंका प्रयोग दण्डीसे पूर्वके किसी काव्यमें उपलब्ध नहीं है। किरातार्जुनीयमें (३) चतुर्वर्णनियम (१५।५में), द्विवर्णनियम (३८में), एकवर्णनियम (१५) उपलब्ध हैं। (२) स्थाननियम (७ और २६ में) एक अन्य प्रकारसे (किसी एक स्थानविशेषसे उच्चार्य वर्णोंका प्रयोग न करके) ओष्ठ्य वर्णोंके बहिष्कारसे उपलब्ध है। यहाँ तो दो श्लोकोंमें ओष्ठ्य वर्णोंके बहिष्कारकी बात है, दण्डीने तो पूरे एक उच्छ्वासमें ओष्ठ्य वर्णोंका बहिष्कार इसलिये किया है, क्योंकि उसमें वक्ता नायकका ओंठ उसकी ललित वल्लभाने प्रेमोन्मादमें इतने जोरसे काटा कि वह ओष्ठ्य स्वरों और व्यञ्जनोंका उच्चारण नहीं कर सकता था।१ माघने (१९वें) सर्गमें चित्र- बन्धोंका प्रारम्भ ही चतुर्वर्णनियमसे (१६।३में) किया है। द्वयक्षर श्लोक ६६, ८४, ८६, ६४, ६८, १००, १०४, १०६, १०८ में तथा एकाक्षर श्लोक ११४ में हैं। (२) स्थाननियम के माघने दो श्लोक दिये हैं : निरोष्ठ्य श्लोक (११), अतालव्य श्लोक (११०)। इस विवेचनसे स्पष्ट है कि दण्डीका निरूपण प्रयोगोंमें उपलब्धिपर ही आधारित नहीं है; अपितु उन्होंने इस प्रकारके निबन्धनकी विवेचना शास्त्र- कारसे अपेक्षित मर्यादा एवं गरिमाके साथ स्वतन्त्र ऊहके रूपमें की है। उनके आसपासके भामह, उद्भट आदि आचार्य दृष्टिकी सूक्ष्मता, विशालता, मर्मस्पर्शिता, एवम् पदार्थके सौन्दर्यको अधिकसे अधिक आयामोंमें देख सकने की क्षमतामें दण्डीके कहीं आसपास भी नहीं ठहरते। एकमात्र अपवाद पहले मुनि भरत और बादमें आनन्दवर्धन हैं ॥ ८३ ॥ (१) स्वरनियम चित्रबन्ध—(१) स्वरचतुष्टयनियम : इस श्लोकमें कविने विद्युन्माला छन्दमें प्रथम पादमें 'आ' स्वरका, द्वितीयमें 'ई' का, तृतीय में 'ओ' का और चौथे पादमें 'ए' का प्रयोग आठ-आठ बार किया है । इस १. दशकुमारचरित, छठे उच्छ्वासका अन्तः : स (मन्त्रगुप्तः) किल कर- कमलेन किञ्चित् संवृताननो, ललित-वल्लभा-रभस-दत्त-दन्त-क्षत-व्यसन- विह्वलाधर-मणिर् निरोष्ठ्य-वर्णमात्म-चरितमाचचक्षे ।

१०६ काव्यादर्श [३।८४ भोगो रोगो, मोदो मोहो, ध्येये वेच्छेद्देशे क्षेमे१ ॥ ८४ ॥ आदिको बह जाना२ (तथा) प्रीतियोंको भय (बन्धनका कारण) कहती है । (विषयोंका) भोग रोग (पीडाका मूल) है। (विषयोंमें) हर्ष (अथवा हर्ष शोक आदि द्वन्द्व) मोह (बुद्धिपर पड़दा डालने वाला होता) है। (इनके) विकल्पमें (सबका मूल) इच्छा क्षेम (कल्याणकारी) 'ई' लक्ष्मीके देश (श्रीनिवास विष्णु) में स्थापित करनी चाहिये ॥ ८४ ॥ प्रकार एक पादमें एक ही स्वरका प्रयोग करनेसे यहाँ 'एकस्वर पादबन्ध' निष्पन्न हुआ है। श्लोकके चार पादोंमें चार स्वरोंका इस प्रकार व्यवस्थासे प्रयोग होनेके कारण इसे 'स्वरचतुष्टयनियमवान् चित्र बन्ध' कहा है। मिले- जुले रूपमें चार स्वरादिके प्रयोगसे भी ये स्वरनियमादि बन्ध बन सकते हैं । पर वे नादसौन्दर्य कम उत्पन्न करनेके कारण उतने सुन्दर नहीं होंगे । किन्तु यदि ये स्वरादि किसी एक व्यवस्थासे प्रयुक्त होते हैं, तो नादसौन्दर्य उत्पन्न करनेके कारण ऐसा बन्ध भी सुन्दर लगेगा । अतः नियमसे केवल संख्या ही अभीष्ट नहीं है, व्यवस्था भी इष्ट है । उदाहरणार्थ ३।६३ देखें । यहाँ कविने कल्याणकामीको कल्याणका मार्ग शास्त्रके प्रमाणसे बताया है। आस्तिक हो, चाहे नास्तिक, सभी शास्त्रों (आम्नायों) का यह अन्तिम निचोड़ है कि गाना, बजाना, नृत्य आदि आमोद-प्रमोदके साधन प्रेम- व्यापार, विषयभोग, वस्तुतः दुःखकारी हैं। इन सबमें आनन्दकी बुद्धि, एक प्रवाह है, जो मनुष्यको बहा ले जाता है। वह भयका सबसे बड़ा कारण है। वस्तुतः यह मनका एक रोग है, मोह है। इस लिये ये सब हेय हैं। मनुष्यको इच्छाएँ दो ही रखनी चाहिये : (१) देशमें, अर्थात्, तीर्थ, विद्वद्गोष्ठी आदि में और (२) क्षेममें, अर्थात्, मङ्गलमें, जिससे मनुष्यके दुःख समाप्त हों, ऐसे आचरणमें । क्षेम विष्णुको चाहने (भक्ति) से या ई (लक्ष्मी माया) के द (खण्डक ज्ञान) से ई (मायापर) श (विराजने वाले ब्रह्म) से हो सकता है । १. सरस्वतीकण्ठा० २।२८१में धृत तथा रत्नदर्पण और वाडिटीकामें व्याख्यात पाठ 'ध्येये वेच्छेत् क्षेमे देशे' है। रत्नदर्पणमें 'चेच्छेत्' अन्यसम्मत पाठ बताया है। रत्नश्रीमें यही है। वादि-तरुणटीकाओंमें 'इव' की व्याख्या की गई है। रत्नश्रीमें 'इच्छेत्' की व्याख्या नहीं है 'इच्छे'की है। वादीजीने और भी पाठान्तर बताया है: इच्छे देवेति द्वे द्वे, इति च पाठान्तरम् । सही पाठका निर्णय करना दुष्कर है। २. अमरकोष ३।३।६८ : प्रचार-स्यन्दयो रीतिः । कुछ लोगोंने 'ईती:' पद- च्छेद करके इसे 'उपद्रव' अर्थमें पर्यवसित किया है।

३।८५] ३. वर्णनियम चित्र बन्ध : (१.२) स्वरत्रितयनियमवान् १०७ (१.२) क्षिति-विजिति-स्थिति-विहिति-व्रत-रतयः, पर-मतयः । उरु रुरुधुर्गुरु दुधुवुर्युधि कुरवः स्वमरिकुलम ॥८५॥ (१.२) पृथ्वीको जीतने और मर्यादा (व्यवस्था) के विधान रूपी व्रतमें प्रसन्न रहने वाले, उत्कृष्ट सूक्ष्म विषयोंमें समझ वाले (अथवा उत्कृष्ट समझ वाले) कौरवोंने अपने शत्रुसमूहको खूब रुद्ध (बसमें) किया और युद्धमें जोरसे हिला डाला ॥ ८५ ॥ अन्य प्रकारसे पदच्छेद भी हो सकते हैं । 'आम्नायोकी अन्तिम वाणी' से टीकाकारोंने वेदान्त, उपनिषद अर्थ लिया है । पर जब यह सिद्धान्त सर्वसम्प्रदायसम्मत, सार्वभौम, है, तो इसे केवल वेदान्तसे जोड़कर सीमित क्यों किया जाये ? अतः 'आम्नाय' का अर्थ 'वेद'न लेकर 'सम्प्रदाय' उचित है ।१ द्वितीय पादके 'गीतीः' आदि पद 'आह' क्रियाका उद्देश्य और विधेय होनेसे कर्मणि द्वितीयान्त हैं । तृतीय पादमें बुद्धिस्थ कर्मवाच्यके कारण 'भोगः' आदि उद्देश्य और विधेयमें प्रथमाका प्रयोग किया है । 'भोगं रोगं, मोदं मोहम्' होता तो मार्गभेद नहीं होता । चतुर्थ पादके 'धेया' प्रथमान्तको देखते हुए 'गीती रीतिः प्रीतिर्भीतिः' तथा तृतीय पादका यथावस्थित पाठ भी ठीक होता । तब 'गीतीः' आदि वाक्य का कर्म होगा । यहाँ यदि आचार्य 'ए' और 'ओ' के प्रयोगमें क्रमव्यत्याम कर देते, तो (१) प्रथम पादमें कण्ठ्य, (२) द्वितीयमें तालव्य, (३) तृतीयमें कण्ठ-तालव्य और (४) चतुर्थमें कण्ठोष्ठ्यके प्रयोगसे विशिष्ट शोभा हो जाती ॥ ८४ ॥ (१.२) स्वरत्रितयनियमवान् चित्र बन्ध—पच्चासीवें श्लोकमें आचार्यने कौरवोंके शौर्यका वर्णन अर्थख्यापनकी दृष्टिसे सरल किन्तु प्रथम पादमें 'इ', द्वितीय पादमें 'अ', तृतीय पादमें 'उ' तथा अन्तमें 'उ' 'इ' 'अ' एवम् 'अ', 'इ', 'उ' के द्विविध मिले-जुले प्रयोगके कारण दुष्कर बन्धसे किया है । इस प्रकार यहाँ समूचे श्लोकमें तीन ही स्वरोंके त्रिविध प्रयोगसे तीन स्वरोके नियम वाला विचित्र बन्ध सम्पन्न हुआ है । यहाँ आचार्यने त्रिस्वरनियमवान् बन्धके दो प्रकार प्रस्तुत किये हैं : (१) एक पादमें एकविध स्वरका ही प्रयोग करके शुद्ध तथा (२) एक पादमें त्रिविध स्वरोंके द्विविध प्रयोग मिश्र बन्ध । यह भेदव्यवस्था अन्य बन्धोंमें भी प्रयुक्त हो सकती है । द्वितीय प्रकार यदि एक पादमें ही किया जाता है, तो कोई चमत्कार उत्पन्न नहीं कर पायेगा । पर यदि चारों पादोंमें अपनाया जाता है, तो अवश्य शोभाधायक होगा । पर एक पादमें एक स्वर १. अमरकोष : श्रुतिः स्त्री, वेद आम्नायस्त्रयी । अथाम्नायः सम्प्रदायः ।

का ही प्रयोग सुननेमें अधिक अच्छा तो लगता ही है, दुष्कर भी अधिक है । मिश्र बन्धको चतुर्थ पादमें (श्लोकके अन्तमें) देनेसे यह आपेक्षिक शोभावहता भी व्यक्त होती है । पूर्वार्धमें कौरवोंकी (१) योगक्षेमपरायणताका,¹ (२) उत्कृष्ट समझका एवम् उत्तरार्धमें युद्धमें शत्रुकुलको बसमें करने और हिला डालनेका वर्णन किया है कि वह फिरसे उनके सामने खड़ा न हो सके । रत्नश्रीमें धृत, वादिटीका तथा रत्नदर्पण (२।२८०) में व्याख्यात पाठ ‘पर-गतयः’ है । ‘परा गति’ तो मृत्यु होती है, जो यहाँ विजेता कौरवोंके प्रसङ्गमें इष्ट नहीं है । यदि वादिव्याख्यात ‘उत्कृष्ट चेष्टा वाले’² अर्थ लें, तो वह तो योग (पृथिवीविजय) और क्षेम (मर्यादापालन) के वर्णन से कही ही जा चुकी है । अतः अनुवादमात्र है ! इसलिये रत्नश्रीज्ञानकी यह व्याख्या उचित ही है कि योगक्षेमका विधान प्रज्ञाके बिना नहीं हो सकता । (इसलिये अगला विशेषण दिया है) ।³ इस कथनसे प्रतीत होता है कि मुद्रित पाठ भले ही ‘गतयः’ हो, पर रत्नश्रीज्ञानने व्याख्या ‘परमतयः’ की ही की है, ‘परगतयः’ की नहीं । ‘गति’ का अर्थ प्रज्ञा नहीं होता, ‘मति’ का होता है । इसी प्रकार तिरुवादिमं० में मूलमें भले ‘मतयः०’ छपा हो, पर व्याख्यात पाठ ‘गतयः’ ही है । तरुणटीकामें ‘परमतयः’ ही धृत है । उन्होंने व्याख्या नहीं की है । इतिहासमें असत्पक्षके प्रतिनिधि माने जाने वाले कौरवोंके अभ्युदयका वर्णन प्रबन्धकाव्यमें तो दण्डीके ‘धिनोति नः’ (१।२२) पक्षके अधीन ठीक है, पर यहाँ मुक्तकमें अखरता है । हो सकता है कि यह श्लोक किसी प्रबन्धकाव्य का अङ्ग हो । यहाँ ‘ति’ तथा ‘रु’ की अनेक बार और ‘तयः’ की एक बार आवृत्तिसे अनुप्रास है । कविने इस पद्यकी रचना पङ्क्ति जातिके ४६६वें भेद ‘अमृत- १. (क) अविजित क्षितिकी विजिति अप्राप्तकी प्राप्तिके कारण योग है । (ख) प्राप्तकी स्थिति (टिके रहने) का विधान प्राप्तका रक्षण होनेसे ‘क्षेम’ है । २. वादिटीका ३।८५ : परोत्कृष्टा गतिश्चेष्टा येषां, ते परगतयः । ३. रत्नश्री ३।८५ : एतच्च प्रज्ञामन्तरेण न भवतीत्याह—परा शोभापरा, गुणदोषविवेकसमर्था गतिः = प्रज्ञा येषामिति परगतयः । एवं च ‘शक्ति- सम्पन्नरिपुविजयचतुरा’ इत्याचष्टे ।

३।८६] ३. वर्ण-नियम चित्र बन्ध : (१.३) द्विस्वरनियमवान् १०६ (१.३) श्री-दीप्ती, ह्री-कीर्ती, धी-नीती, गीः-प्रीती । एधेते द्वे द्वे ते, ये नेशे देवेशे ॥ ८६ ॥ (१.३ क) लक्ष्मी और तेज, (ख) लज्जा और यश, (ग) प्रज्ञा और नीति, (घ) वाणी और प्रीति ये दो-दो तुम्हारे ही वृद्धिको प्राप्त हो रही हैं, जो कि देवराज (इन्द्र) में (या हे राजन्, शिवमें) नहीं हैं ॥ ८६ ॥ गति' छन्दमें की है। यह अन्यत्र 'अमृतगतिका', 'अमृततिलका', 'त्वरितगति' नामोंसे भी अभिहित है। अन्यत्र इसे 'कुलटा' नाम भी दिया है। इसमें न, ज, न, ये तीन गण तथा अन्तमें एक गुरु होता है और प्रत्येक पाँचवें अक्षरपर यति होती है। पाँचवाँ अक्षर ही गुरु भी होता है१ ॥ ८५ ॥ (१.३) दो स्वरोंके नियम वाला चित्र बन्ध—षडक्षर गायत्री जातिके 'शेषा', 'शेषराज' अपरनामक 'विद्युल्लेखा' छन्दमें२ निबद्ध प्रकृत छियासीवें श्लोकमें कविने अपने वर्ण्य राजाको श्री आदि आठ गुणोंके चार युग्मोंमें देवराज या शिवसे भी बढ़कर बताया है। ये दो-दो गुणोंके चारों युग्म न इन्द्रमें हैं न शिव में; परन्तु वर्ण्य राजा में ये वर्धमान अवस्थामें (एधेते) हैं; कहाँ जाकर रुकेंगे, कोई नहीं कह सकता । (१) इन्द्रमें श्री तो है, पर दीप्ति (तेज) विलासिता के कारण नहीं है। जब भी शत्रुओंका आक्रमण होता है, दौड़े जाते हैं ब्रह्मा, विष्णु, महेशके या और तो और किसी पार्थिव प्राणीके ही पास सहायता लेनेको । (२) देवराज हैं, पर उनमें न लज्जा है, न यश । कामुकके रूपमें निर्लज्जकी प्रसिद्धि अलबत्ता अवश्य है। यह उनकी सहस्राक्षता से ही व्यक्त होता है । (३) कामुकमें बुद्धि होती भी है, तो वह नीतिका अनुसरण नहीं करती । (४) ऐसे स्वार्थप्रेरित पुरुषमें मधुर वाणी और उससे सम्पाद्य प्रीति भी दुर्लभ ही होती है ।३ श्मशानवास, दिगम्बरता, १. दिअवर हार पअलिआ पुण वि तह डिअ करिआ । वसु-लहु वे गुरु सहिआ अमिअगइ, धअ कहिआ ॥ प्राकृतपैङ्गल २।६६ कुलटा स्यान्नजनगा, पञ्चभिः पञ्चभिर्यतिः । २. वाराहा मत्ता जं कण्णा तीआ होतं । हारा छक्का बन्धो सेसा राजा छन्दो ॥ प्राकृतपैङ्गल २।४२ वृत्तरत्नाकर ३।६ : विद्युल्लेखा मो मः । नारायण भट्ट : गायत्री तककी जातिके छन्दोंमे पादान्तयति होती है, यह छान्दस उपदेशपरम्परा है । ३. कविका प्रेरणास्रोत श्रीमद्भागवत (८।८।२०) प्रतीत होता है : कश्चिन्महांस्तस्य न कामनिर्जयः, स ईश्वरः किं ? परतो व्यपाश्रयः ॥

११० काव्यादर्श [३।८७-८८ (१.४) सामायामा मायामासा मारानाया यानारामा । यानावारा रावानाया मायारामा मारायामा ॥ ८७ ॥ (२.१) नयनानन्द-जनने, नक्षत्र-गण-शालिनि । अघने गगने दृष्टिरङ्गने, दीयतां सकृत् ॥ ८८ ॥ (२.१) हे प्रशस्त अङ्गों वाली, नयनोंको आनन्द उत्पन्न करने वाले नक्षत्र- समूहसे सुशोभित, मेघरहित गगनपर एकबार तनिक नज़र तो डालो ।।८८।।

अशुचिता, विरक्ततासे शिवमें भी श्री, ह्री, नीति और प्रीतिका अभाव स्वतः
व्यक्त है।
यहाँ श्लोकके पूर्वार्धमें सब १२ अक्षर दीर्घ इकार हैं और उत्तरार्धमें सभी
१२ अक्षर एकार हैं । यह बन्ध 'ई', 'ए' के व्यस्त प्रयोगसे भी बन सकता
है । उसका सौन्दर्य व्यवस्थाके तारतम्यपर निर्भर करता है। इस प्रकार
दो स्वरोंसे ही निबद्ध होनेसे यह श्लोक विचित्र शोभासे सम्पन्न हो गया है ।
यह शोभा शब्दों (वर्णविन्यास) से प्राप्य होनेके कारण यह वर्णविन्यास
शब्दालङ्कार है । दो स्वरोंमें सीमित होनेसे दुष्कर भी है ।। ८६ ।।
(१.४) एकस्वर नियमवान् दुष्कर चित्रबन्ध—यह श्लोक पीछे 'सर्वतो-
भद्र चित्रबन्ध' के उदाहरणके रूपमें (३।८२, पृष्ठ १०१ पर) आ चुका है।
अर्थ तथा अन्य वक्तव्य वहाँ कहा जा चुका है । यहाँ यह आचार्यने एक
'आ' स्वरके ही बत्तीस बार प्रयोगके कारण एक स्वरनियम चित्रबन्धके
उदाहरणके रूपमें दिया है । इसीसे इस अलङ्कारका भी उदाहरण प्रस्तुत
हो जानेके कारण अलग उदाहरण देना आवश्यक नहीं समझा है । १ दोनों
शब्दालङ्कार तुल्यबल हैं। अतः इनकी संसृष्टि है ।। ८७ ।।
(२.१) चार स्थानोंसे उच्चरित वर्णोंके ही प्रयोग वाला चित्र बन्ध—
वर्णनियमवान् चित्रबन्धके द्वितीय भेद स्थाननियमके इस प्रथम उदाहरणमें
कविने नकारावृत्तिसे सम्पन्न अनुप्रास वाले प्रथम पादमें न-विपुला तथा शेष
पादोंमें श्लोकके प्रयोगसे नायकने रजनीमें झिलमिलाते तारों वाले शरद् ऋतु
के स्वच्छ गगनकी शोभापर एक नज़र डालनेकी प्रार्थना सजनीसे की है ।
१. रत्नश्री : सर्वतोभद्रं पूर्वोक्तमेकस्वरोदाहरणमपि कल्पत इति पुनरुदा-
हृतम् । एकस्वरोदाहरणमात्रमिह विवक्षितम् । तच्च पूर्वसिद्धमेव
सम्भवतीति किमपूर्वेणेदृशेनाहोपुरुषिकामात्रेणेति भावः ।

३।८६] ३. वर्णनियम : चित्र बन्ध (२.२) त्रिस्थानवर्णनियमवान् १११ (२.२) अलि-नीलालक-लतं कं न हन्ति घन-स्तनि ? आननं नलिन-च्छाय-नयनं शशि-कान्ति ते ॥ ८६ ॥ (२.२) हे मघन स्तनों वाली, भ्रमरसमान काली घुंघराली अलकावली वाला, कमलसमान शोभासे युक्त नज़रों वाला, चन्द्रके समान कान्ति वाला तुम्हारा मुख किसे कष्ट नहीं पहुँचाता है ? ॥ ८६ ॥ प्रथम पाद तृतीयपादोक्त 'गगने' का सप्तम्यन्त विशेषण भी हो सकता है, तो 'अङ्गने' का सम्बुद्धिविभक्त्यन्त विशेषण भी हो सकता है । 'अघने' से शरद् ऋतुके कारण 'निरभ्रे' अर्थ अभिप्रेत है । नक्षत्रोंसे शोभित निरभ्र गगनमें एक ही कमी रह गई है चन्द्रकी । वह यहाँ तुम मेरे पास हो ! अतः 'हे नयनोंको आनन्दित करने वाली' कहना अधिक उपयुक्त है । 'आनन्दजनने' से √ह्लाद्, √चन्द् धातुओंका अर्थ कविने जानबूझकर कहा हैं। नयनोंकी कमलसे प्रसिद्ध समानताको दृष्टिमें रखते हुए 'चन्द्र' या 'चन्द्रिका' का तथा नयनोंका प्रयोग नहीं किया है, क्योंकि कमल और चन्द्रमा में विरोध जो है। 'दृष्टि'से कमलकी प्रतीति नहीं होती । यहाँ कविने समूचे श्लोकमें कण्ठ्य अकार ह्रस्व, गुरु और दीर्घ तीनों प्रकारका, (ii) तालव्य इकार (ह्रस्व और दीर्घ), (iii) कण्ठतालव्य ए तथा (iv) मूर्धन्य ऋ (ह्रस्व और गुरु), इन चार स्थानोंसे उच्चार्य स्वरोंका प्रयोग किया है । (i) कण्ठ्य क, ख, १ ग, घ, ङ का, (ii) तालव्य ज, य, श का, (iii) मूर्धन्य ट, ण, र, और षका तथा (iv) दन्त्य त, द, न, और स का इस प्रकार इन चार ही स्थानोंसे उच्चार्य व्यञ्जनोंका प्रयोग कविने किया है । कविने इन स्थानों से उच्चार्य वर्णोंके चयनमें एक और बात ध्यानमें रखी है : (१) स्वरोंमें मात्रिक अवान्तर भेद भी दिये हैं । (२) व्यञ्जनोंमें (i) स्पर्श, (ii) अन्तस्थ और (iii) ऊष्म प्रत्येक वर्गका चयन किया है । इस प्रकार यहाँ शब्दचयनकी दुष्करता स्पष्ट है ॥ ८८ ॥ (२.२) तीन स्थानोंमें उच्चरित वर्णोंके नियम वाला चित्र बन्ध- प्रस्तुत ८६ वाँ श्लोक स्थाननियमवाले चित्रबन्धके द्वितीय त्रिस्थान वर्णनियम चित्रबन्धको प्रदर्शित करनेको दिया है। इसमें कविने वक्ताकी रतिके आलम्बन १. 'नक्षत्र' के 'क्ष' का पूर्वाङ्ग 'क्' 'ष्' के योगमें 'ख्' के रूपमें भी उच्चरित होता है : चयो द्वितीयाः शरि पौष्करसादेरिति वाच्यम् (सिद्धान्तकौमुदी, हल्सन्धि); शुक्लयजुःप्रातिशाख्य ४।१२० : असस्थाने मुदि द्वितीयं शानकस्य ।

११२ काव्यादर्श [३।६० (२.३) अनङ्ग-लङ्घनालग्न-नानाऽऽतङ्का सदङ्गना । सदानघ, सदानन्द, नताङ्गासङ्ग सङ्गत ॥ ६० ॥ (२.३) हे सदा अनघ (पापरहित), सदानन्द (श्रेष्ठोंको आनन्दित करने वाले), नत (विनत) अङ्गों वालीको प्रेम करने वाले मित्र, वह श्रेष्ठ सुन्दरी अनङ्गका लङ्घन (कामदेवकी मर्यादाका अतिक्रमण) करनेके कारण तरह- तरहके आतङ्कोंमें आ घिरी है। (उसे तुम कामदेवके कोपसे बचाओ) ॥६०॥ विभाव सुन्दरीके उद्दीपन विभाव मुखकी अद्भुत आकर्षकताका वर्णन पिछले पद्यके समान प्रथम पादमें नविपुलासे युक्त श्लोक छन्दमें किया है। कोमल तथा आनन्ददायी नील कुञ्चितकेशोंसे तथा कमलसदृश नयनोंसे युक्त ज्योत्स्नामय, देखते ही भली भाँति प्राण युक्त कर देने वाले (आनन) मुख पदार्थ द्वारा भी हनन किए जानेसे अधिक विषम क्या होगा ? दण्डीके यहाँ यह विरोध है । ग३३४ देखें । यहाँ (१) स्वरोंमें कण्ठ्य (i) अ, आ, (ii) तालव्य इ, ई, (iii) कण्ठ-तालव्य ए स्वरोंका ही प्रयोग किया गया है। (२) व्यञ्जनोंमें (i) कण्ठ्य क, घ, ह, (ii) तालव्य च, छ, य, श, (iii) दन्त्य त, न, ल, स का, (३) तथा स्वरव्यञ्जनोभयात्मक अनुस्वारका¹ प्रयोग किया गया है। यहाँ भी अवान्तर सभी भेदोंका प्रयोग किया हुआ है। अर्थावबोधकी दृष्टिसे यद्यपि यह पद्य प्रसादगुणयुक्त (झटिति अर्थसमर्पक) होनेसे सुगम है, पर रचनाविधानमें वर्णचयनमें स्थानविशेषसे तथा उसमें भी अवान्तर भेदोंको स्थान देनेके लिये विशेष प्रयत्न अपेक्षित होनेसे यह आधुनिक मन्त्रिमण्डलके गठनके प्रयासोंके समान दुष्कर है, यह स्पष्ट है ॥ ८६ ॥ (२.३) द्विस्थान वर्णनियम चित्र बन्ध—नवतितम श्लोकमें कविने वर्ण- स्थाननियम चित्रबन्ध वाले पद्यमें सुन्दरीकी विप्रलम्भ रतिका वर्णन किया है। उत्तरार्धके सभी पद सम्बोधन हैं। कोई पुरुष अपने मित्रको मित्रके प्रेममें बिरहिन नायिकाकी स्थितिका वर्णन कर रहा है। अर्थकी दृष्टिसे यह सुगम १. शौनकके अनुसार अनुस्वारमें स्वर और व्यञ्जन दोनोंके धर्म हैं। अतः यह स्वर भी माना जा सकता है और व्यञ्जन भी : अनुस्वारो व्यञ्जनं वा, स्वरो वा (ऋक्प्रातिशाख्य १।५) । उवटने इसकी व्याख्या इसे स्वरव्यञ्जनोभयात्मा वर्णान्तरके रूपमें बताकर की है : ‘अं’ इत्यनुस्वारो वर्णसमाम्नाये पठ्यते । स कांश्चित् स्वरधर्मान् गृह्णाति, कांश्चिद् व्यञ्जन-धर्मान् ।...तत्रोभय-धर्म-योगादुभय-स्वभावं स्वर-व्यञ्जनयोरन्यद् वर्णान्तरं प्रकाशयति—‘अनुस्वारो व्यञ्जनं वा, स्वरो वा ।’ इति ।

३।६० ] ३. वर्ण-नियम चित्र बन्ध : (२.३) द्वि-स्थान वर्ण-नियम ११३ है । पर रचनाकी दृष्टिसे दो ही स्थानोंके व्यञ्जनोंके चयनके कारण कठिन है । इसमें (i) कण्ठ्य व्यञ्जनों क, ग, घ, ङ, का तथा (ii) दन्त्य त, द, न और स का प्रयोग हुआ है । पिछले दो उदाहरणोंमें स्वर और व्यञ्जन दोनों, सदृशसङ्ख्यक स्थाननियमसे प्रयुक्त थे ।१ यहाँ स्वरस्थाननियम है, किन्तु वह व्यञ्जनस्थाननियमसे भिन्न है : केवल कण्ठ्य 'अ' का ही ह्रस्व और दीर्घ रूपोंमें प्रयोग हुआ है । इससे यह सूचित होता है कि आचार्यके मनमें (i) केवल व्यञ्जन या (ii) केवल स्वरका स्थाननियम भी शोभाकारकके रूपमें स्थित है । इस दृष्टिसे यह श्लोक द्विस्थानव्यञ्जननियम और एकस्थान- स्वरनियमका उदाहरण है । मिश्र पद्धतिको आदर देने वाले आचार्यके लिये यह दिग्निर्देश उचित ही है । यहाँ भी कविने स्पर्श, अन्तस्थ और ऊष्म तीनों प्रकारके व्यञ्जनोंका प्रयोग किया है । नताङ्गासङ्ग—नतान्यङ्गानि यस्याः, सा नताङ्गी, नताङ्गा२ (बहुव्रीहि) । नताङ्गायामासङ्ग आसक्तिः प्रेमा यस्य, तथाविध (बहु०) । रत्नश्रीज्ञान आदिने 'नताङ्गासङ्गेन सङ्गत' विग्रह मानकर 'सङ्गत' को समासका उत्तर पद माना है : हे अन्यस्त्रीसम्भोगप्रसङ्ग । पर यह पिछले दो विशेषणोंके विपरीत होनेसे उचित नहीं है : अन्यस्त्रीसम्भोगप्रसङ्ग (परस्त्रीके सम्भोगमें लीन) पुरुष 'सदा अनघ' (निष्पाप) तथा 'सदानन्द' (सत्‌को, या सदा, आनन्दित करने वाला) कैसे होगा ? सङ्गत—सम् + √गम् + क्त । 'क्त' जब भावमें होता है, तब 'सख्य' अर्थ होता है और जब कर्ता अर्थमें, तब रूढिमे 'सखा' अथवा यौगिक 'संयुक्त' अर्थ होता है३ ।। ६० ।। १. पीछे स्वरों और व्यञ्जनोंके स्थानोंमें भेद व्यञ्जनोंका कण्ठ-तालव्य भेद सम्भव न होनेसे हुआ है । समानाक्षर (simple vowels) उसी स्थान वाले प्रयुक्त हैं, जिस स्थानके व्यञ्जन हैं । सन्ध्यक्षर (diphthongs) भिन्न हैं । २. सिद्धान्तकौमुदी, स्त्रीप्रत्यय : नासिकोदरौष्ठजङ्घादन्तकर्णशृङ्गाच्च (अष्टा० ४।१।५५) । अत्र वृत्तिः—अङ्ग गात्र-कण्ठेभ्यो वक्तव्यम् । स्वङ्गी, स्वङ्गेत्यादि । कवियोंमें ङीषन्त अधिक प्रचलित है : अद्य प्रभृत्यवनताङ्गि, तवास्मि दासः (कुमारसम्भव ५।८६) । दण्डीने अकारबहुल पद्यमें भिन्नस्थानोच्चार्य एक ईकारान्तका प्रयोग वैरस्य- कारक समझकर नहीं किया है । ३. अष्टाध्यायी ३।१।१०४ : अजर्यं सङ्गतम् । भट्टिकाव्य ६।५३ : तेन सङ्गतमार्येण रामाजर्यं कुरु द्रुतम् । ५५ : आदृत्यस्तेन वृत्त्येन स्तुत्यो जुष्येण सङ्गतः ।

११४ काव्यदर्श [३।६१ (२.४) अगा गाङ्गाङ्ककाकाक-गाहकाघक-काक-हा । अ-हाहाऽङ्ग, ख-गाङ्गाग-कङ्काग-खगकाककः१ ॥ ६१ ॥ (२.४) गङ्गाके जलमें (जलविहारमें अपेक्षित राजस) चञ्चलतासे रहित होकर, अर्थात् सात्त्विक पुण्यबुद्धिसे, अवगाहन (स्नान) करने वाले, हा-हाकार (शोक, धिक्कारके शब्दों) को (गङ्गास्नानसे पवित्र होनेके कारण) नहीं प्राप्त करने वाले आकाशमें गतिशील सूर्य, चन्द्र, नक्षत्र आदि ज्योतियोंको अङ्कमें धारण करने वाले (सुमेरु) पर्वतको अर्थात्, वहाँ स्थित सभी २१ स्वर्गों२ को प्राप्त करने वाले (हे सत्पुरुष), महा-पातक आदि निन्दित पापों रूपी कौवोंको (स्नानके पुण्यसे) नष्ट करने वाले तथा स्थावर जङ्गम दोनों रूपोंमें स्थित ब्रह्मकी प्राप्तिके सुख वाले होकर आदित्यमण्डलकी प्राप्ति रूपी वैराज पदको प्राप्त (ही) हो गए हो, अर्थात् इस पदको अवश्य प्राप्त करोगे ॥६१॥ (२.४) एकस्थान वर्णनियम चित्रबन्ध—इक्यानवेंवे श्लोकमें कविने गङ्गा- स्नानके पुण्यका महत्त्व गङ्गास्नान करने वाले किसी पुरुषके लिए उत्तम वैराजपदकी प्राप्तिकी आशंकासे व्यक्त किया है। इसमें कविने कण्ठ्य (१) स्वर अ, आ का, (२ i) स्पर्श व्यञ्जनों क, ख, ग, घ, ङ, (ii) ऊष्म ह और (iii) विसर्ग३ इन एक ही स्थान कण्ठसे उच्चार्य वर्णोंका मिलाजुला (लयात्मक) प्रयोग किया है। रचनाकी दुष्करता स्पष्ट है। गाङ्ग-काकाक-गाहक — गङ्गाया इदं गाङ्गम्, तस्येदम् (अष्टा० ४।३।१२०) अण्, गाङ्गं च तत् कम् उदकम् गाङ्ग कम् गङ्गाजलम्, ककनं लौल्यं चाञ्चल्यम्, कक लौल्ये (भ्वादि) न काकः अकाकः, अचञ्चलता, अकाकेन गाहते प्रविशति १. अन्वयः—(हे) गाङ्ग-काकाक-गाहक, अ-हाहाऽङ्ग, ख-गाङ्गाग-कङ्क, अघक-काक-हा अग-खग-काककः (त्वम्) गाम् अगाः । रत्नश्रीज्ञानने पद्यके अन्तिम शब्दको भी सम्बोधन ही माना है। इस पाठमें कण्ठ्य वर्णों में विसर्ग रह जाता है। अतः पूर्वार्धके अन्तमें प्रथमान्तके समान उत्तरार्ध के अन्तमें भी प्रथमान्त पाठ विसर्गका भी समावेश हो जानेसे उचित है । २. एक-विंशत्यमी स्वर्गा निविष्टा मेरु-मूर्धनि ।। नृसिंहपुराण ३०।२४ सरित्स्नायी・・・निर्मलं स्वर्गमाप्नोति・・・॥ ३७ ३. 'अः, ‿ क, ‿ प, अं' (ऋक्प्रातिशाख्य, विष्णुमित्रकृत वर्गद्वयवृत्तियुत, पृष्ठ १६) तक प्रोक्त वर्णराशिमें स्वर और अनुस्वारसे इतर वर्णोंको शौनक‌ने 'व्यञ्जन' कहा है : सर्वः शेषो व्यञ्जनान्येव (ऋ प्रा १।६) । विसर्गकी गणना व्यंजनोंमें भी ऊष्म वर्णोंमें की है : प्रथमपञ्चमौ च द्वा ऊष्मणाम् । केचिदेता उरस्यौ (ऋ प्रा १।३८-३६) ।

३।६२] ३ (३.१) त्रि-विध पञ्चस्थानवर्ण-नियम चित्र बन्ध ११५ ३.१ रे रे रोरू-रुरूरो-रुगागो-गोऽगाङ्ग-गोऽग-गुः । (३.१.) अरे अरे (अति नीच) निर्मम, अचञ्चल (मौन) वाणी वाला अर्थात् चुपचाप होकर पर्वतके अङ्गों (कन्दरा, खोह, शिलाकी ओट) में (अथवा वृक्षोंके अङ्गों तने, डालियों, पत्तों, झुरमुटोंकी ओटमें) स्थित, मेरे इति अकाक-गाहकः, गाङ्ग-कस्य अकाक-गाहकः, तस्य सम्बोधनम् अ-हा-हाऽङ्ग हा-हा-शब्दं शोक-धिक्कार-व्यञ्जकम् अङ्गति गच्छति, अगि... गत्यर्थाः (भ्वादि) इति हा-हाऽङ्गः, न हा-हा-ऽङ्गः इति अ-हा-हाऽङ्गः, तस्य सम्बोधनम् । ख-गाङ्गाकङ्क — खेन गच्छन्तीति ख-गानि नक्षत्रादीनि ज्योतींषि, तानि अङ्के यस्य स खगाङ्कः, स चासावगः पर्वत: सुमेरुः,१ तं कङ्कति इति ख-गाङ्क-कङ्कः, ककि... गत्यर्थाः (भ्वादि), तस्य सम्बुद्धौ अघक-काक-हा — कुत्सितानि निरति- शय-तमोमय-निरय-गतिफलत्वान्निन्दितानि अघानि पापानि अघ कानि, तान्येव काका इव कुत्सितत्वात्, इति अघक-काकाः, रूपक समासः, तान् हन्ति नाशयति इति । अग-खग-काककः— न गच्छतीत्यगं स्थावरम् । खेन आकाशेन गच्छ- तीति खगम् जङ्गमम्, अगं च खगं चेत्यग-खगं स्थावर-जङ्गमं, तथाविधं च कम् सुखस्वरूपमानन्दमयं ब्रह्म अग-खग-कम्, तस्य अकनम् आकः गमनं प्राप्तिरिति यावत्, तस्य कं सुखमस्त्यस्य, मत्वर्थीयोऽच्, सः । १ गाम् आदित्यं, तदुपलक्षितं स्वर्गम् । अगाः—गतवानसि, इणो गा लुङि (अष्टा० २।४।४५)—यहाँ 'ऐसे पुरुषका स्वर्गगमन अवश्य होता है,' इस धारणासे भविष्यकालमें ही भूतकाल का प्रयोग उपचारसे किया गया है (—रत्नश्री) ।। ६१ ।। (३.१) त्रिविध पञ्चस्वर-स्थान-वर्णनियमवान् चित्रबन्ध—६२वें श्लोक में कविने आश्रमके पालतू मृगको मारने वाले किसी शिकारीको अपने पास आनेसे मना करते किसी तपस्वीका वर्णन किया है । १. महाभारत, वनपर्व १६३।१५, २७, २८ आदि देखें । २. रत्नश्रीज्ञानकी यह व्याख्या भी सुन्दर है : एवं कल्याणायतत्वाद् दुर्जन- संसर्गोऽपि तव नास्तीति कथयति—अगन्ति कुटिलं गच्छन्ति अदान्तत्वाद् इत्यगानि । कर्तयंच् । अगानि च तानि खानीन्द्रियाणि चेत्यग-खानि । तानि गच्छन्तीत्यग-ख-गाः अदान्तेन्द्रियाः, खला इति यावत् । त एव कुत्सितत्वादगखगकाः । तेष्वककोऽलोलोऽलुब्धो निरपेक्षस्तत्संसर्ग-द्वेषात् । अर्थात् विषयोंके प्रति कुटिलतासे (मनुष्यको हानिकारक रूपसे) गमन करने वाली ज्ञानकर्मेन्द्रियोंके प्रति गमन करने वाले असंयमी लोगोंमें संसर्ग नहीं रखने वाला प्रकृत पुरुष । रत्नश्रीज्ञानने इस विशेषणको सम्बोधन माना है ।

११६ काव्यादर्श [३।६३ किं केका-काकु-कः काको मा-माऽऽगा मा समामम¹ ॥६२॥ (३.२) देवानान्नन्दनो देवो नोदनो वेदनिन्दिनः । (पालित) किलकारियां भरते हुए मृगकी छातीको आहत करनेके अपराधको प्राप्त (तू) मेरे पास मत आ, मत आ । क्या कौआ (कभी) केका (मयूर- ध्वनि) की स्वरभङ्गियों (आनन्दकारी पञ्चम) को बोलने वाला हो सकता है ? ॥ ६२ ॥ (३.२) देवताओंको प्रसन्न करने वाले, वेदनिन्दक (असुर) वर्गको दुःखी यह उदाहरण चित्रबन्धकी दृष्टिसे बहुत कलापूर्ण है। इसमें तीनों प्रकार के नियम एक साथ अपनाए गये हैं : (१) पञ्च-स्वर-नियम—अ, इ, उ, ए तथा ओ; (२) पञ्च-स्थान-नियम—(क) स्वर : (i) कण्ठ्य अ, आ. (ii) तालव्य इ, (iii) ओष्ठ्य उ, (iv) कण्ठ-तालव्य ए, (v) कण्ठोष्ठ्य ओ; (ख) व्यञ्जनः (i) कण्ठ्य क, ग, विसर्ग, (ii) कण्ठ-नासिक्य (अनुनासिक) ङ, (iii) मूर्धन्य र, (iv) जिह्वामूलीय ≍क तथा (v) ओष्ठ्य म; (३) पञ्च-व्यञ्जन-नियम—क, ग, ङ, म और र। विसर्ग उपध्मानीय एवं जिह्वा- मूलीय घोष हका ही अघोष रूप (allophone) होनेसे² स्वतन्त्र व्यञ्जनके रूपमें अभिप्रेत नहीं हैं । नियमतः स्वरके पश्चात् तदङ्गत्वेन प्रयुक्त होनेके कारण अनुस्वार एवं विसर्ग स्वरधर्म अधिक हैं, स्वतन्त्र वर्ण कम । पर स्थान- नियममें सुस्पष्टतया पृथक्प्रयत्ननिर्वर्त्यताके कारण उनकी पृथग् गणना उचित है । 'चतुःप्रभृति' अल्पत्वका उपलक्षक ही है। इयत्ताका निर्धारक नहीं। सभी टीकाकारोंने इस श्लोकको चतुर्वर्णनियमका उदाहरण माना है। 'ह'के अघोष रूप और उनके रूपभेद जिह्वामूलीयको छोड़नेपर भी दो बार प्रयुक्त नासिक्य स्पर्श 'ङ' की पञ्चम वर्णताका अपलाप कैसे किया जा सकता है ? इसके अतिरिक्त, जब अन्य दो प्रकारके वर्णनियम भी यहाँ व्यवस्थित रूपसे उपस्थित हैं, तो उन्हें शोभाकारक (चित्रबन्धत्वका प्रयोजक) क्यों न माना जाये ? अतः वस्तुतः आचार्यने यहाँ तीनों प्रकारके चित्रबन्धोंकी संसृष्टि (समकक्षतया उपस्थिति) प्रस्तुत की है ॥ ६२ ॥ (३.२) त्रिवर्ण-नियमवान् चित्र-बन्ध—हिरण्यकशिपु द्वारा मुष्टिसे ताडित स्तम्भसे अतिभीषण निनाद करते हुए भगवान् विष्णु प्रकट हुए । इसी १. अन्वयः—रे रे अमम, अगाङ्ग-गः, अगगुः, मम रोरु-रूरुरो-रुगागो-गः (त्वम्) मा मा-मा आ-गाः । किं काकः केका-काकु-कः ? २. ऋक्प्रा०१।१०: उत्तरेऽष्टा ऊष्माणः । ११: अन्त्याः सप्त तेषामघोषाः ।

२।६३] ३. (३.२) त्रि-वर्ण-नियमवान् चित्र बन्ध : ११७ दिवन्दुदाव नादेन दाने दानवनन्दिनः ॥ ९३ ॥ करने वाले देव (नृसिंह रूपधारी विष्णु) ने दानवनन्दन (हिरण्यकशिपु) के खण्डन (दान, विदारण) (प्रयुक्त) गर्जना (नाद) से आकाशको विदीर्ण कर दिया ॥ ६३ ॥ पुराणप्रसिद्ध कथाको आचार्य दण्डीने तिरानवेंवे श्लोकमें बताया है। ब्रह्मासे वर प्राप्त करनेके बाद निश्चिन्त हुए हिरण्यकशिपुने वेदप्रतिपादित मर्यादाओंको तोड़ना शुरू किया। १ हरिभक्त प्रह्लादसे चिढ़कर उसने 'स्तम्भमें स्थित विष्णु तेरी रक्षा करेगा' कहकर उस स्तम्भपर मुष्टिकाका प्रहार किया। ३ उस स्तम्भसे तभी अति भीषण निनद (गर्जना) हुआ, जिससे ब्रह्माण्ड कटाह ही फूटनेको आया और ब्रह्मादि देवोंको भी लगा कि अब उनके लोकका प्रलय होने ही वाला है। ४ श्रीमद्भागवतकी इस कथाको आचार्य दण्डीने सङ्केतात्मक 'वेदनन्दिनः', 'दाने नादेन दिवं दुदाव' से व्यक्त किया है। यहाँ स्वर तो विविध प्रकारके अ, इ, उ, ए तथा ओ आये हैं। किन्तु ये चित्रत्वप्रयोजक नहीं हैं। व्यञ्जन केवल तीन हैं : (i द १३ बार, (ii) न १८ बार, (iii) व छह बार । इन व्यञ्जनोंका प्रयोग पीछेके उदाहरणोंमें पूरे पादमें या श्लोकके काफी बड़े हिस्सेमें लगातार एक ही व्यञ्जनके प्रयोगके रूपमें हुआ है; किन्तु यहाँ यह एक उचित व्यवधानसे हुआ है। इससे यह बन्ध बहुरंगी मनकोंसे व्यवहित ग्रथित मालाके समान सुशोभित हो गया है। इससे आचार्य 'स्थाननियमके निबन्धनका यह भी एक प्रकार है', यह सूचित करना चाहते हैं। ५ इस ग्रथनसे यहाँ अनुप्रासकी भी सुन्दर सृष्टि हो गई है। १. दितेर्द्वाविव दायादौ दैत्य-दानव-वन्दितौ । हिरण्यकशिपुर्नाम, हिरण्याक्षश्च कीर्तितौ ॥ श्रीमद्भागवत ६।१८।११ २. स एव वर्णाश्रमिभिः क्रतुभिर्भूरि-दक्षिणैः । इज्यमानो हविर्भागानग्रहीत् स्वेन तेजसा ॥ श्रीमद्भागवत ७।४।१५ एवमैश्वर्यमत्तस्य दृप्तस्योच्छास्त्रवर्तिनः । कालो महान् व्यतीयाय ब्रह्मशापमुपेयुषः ॥ २० यदा देवेषु, वेदेषु, गोषु, विप्रेषु, साधुषु । धर्मे मयि च विद्वेषः, स वा आशु विनश्यति ॥ २७ ३. खङ्गं प्रगृह्योत्पतितो वरासनात्तस्तम्भं तताडातिबलः स्वमुष्टिना । । ८।१५ ४. तदैव तस्मिन्निनदोऽतिभीषणो बभूव येनाण्डकटाहमस्फुटत् । यं वै स्वधिष्ण्योपगतं त्वजादयः श्रुत्वा स्वधामाप्ययमङ्ग मेनिरे ॥१६ ५. इसकी चर्चा ३।८४, पृष्ठ १०६ में की जा चुकी है।

११८ काव्यादर्श [३।६४-६५ (३.३) सूरिः सुरासुरासारि-सारः, सारसि-सारसाः । ससार सरसीः सीरी स-सूरूः स सुरा-रसी ॥ ६४ ॥ (३.४) नूनन्नुन्नानि नानेन नाननेनाननानि नः । नानेना ननु नानूनेनैनेनानानिनो निनीः १ ॥ ६५ ॥ (३.३) विद्वान् (नीतिज्ञ), सुरों और असुरोंको व्याप्त करने वाले बलसे युक्त, सुन्दर जाँघों वाली रमणियों सहित, सुरामें रस लेने वाले उन हलधर (बलराम) ने कलरव करते सारसों वाली सरसियों (पुष्करिणियों) में अव- गाहन किया ।। ६४ ।। (३.४) इस बलवान् (पुरुष) ने हमारी सेनाओंको निश्चय ही ध्वस्त नहीं कर दिया है, ऐसा नहीं है (अर्थात् ध्वस्त कर ही दिया है) । न्यूनके विपरीत (अर्थात अधिक, बलवत्तर) इस (पूर्वोक्त पुरुष) के साथ बलहीनों (दुर्बलों) को लड़ाने वाला (पुरुष) क्या निरपराध हो, ऐसा नहीं है ? (अर्थात् ऐसा पुरुष अपराधी है ही) ।। ६५ ।। दुदाव—टुदु उपतापे (स्वादि०) कर्तरि लिट्, प्र० ए० व० । द्युलोक (आकाश अमूर्त, निराकार द्रव्य) को उपतप्त करना सम्भव नहीं है । अतः लक्षणया द्युस्थ विभिन्न लोकोंके निवासी अभिप्रेत हैं । श्रीमद्भागवतमें इसी भावको सुन्दर अभिव्यक्ति दी गई है। दण्डीने सङ्क्षेपके कारण सङ्केत ही किया है । दाने— दो अवखण्डने (दिवादि०) से ल्युट्, सप्तमी, ए० व० ॥६३॥ (३.३) द्वि-व्यञ्जन-नियम चित्र बन्ध—चौरानवेंवे श्लोकमें आचार्य दण्डीने बलवत्ता, स्त्रीसङ्ग और सुरापानके लिये प्रसिद्ध हलायुध बलरामके पुष्करिणियोंमें विहारका वर्णन समूचे श्लोकमें 'स' और 'र' दो व्यञ्जनोंका ही प्रयोग करके किया है । स्वर यहाँ यद्यपि अ, इ, उ (सब ह्रस्व और दीर्घ) तीन ही प्रयुक्त हुए हैं, अतः स्वरनियम भी है । तथापि समूचे ध्वनिप्रभावकी दृष्टिसे व्यञ्जननियम चारुतर है । यों इसमें सादा-सा यमक भी है ।। ६४ ।। (३.४) एक-व्यञ्जन-नियमवान् चित्र बन्ध—वर्णनियम बन्ध प्रकरणके अन्तिम श्लोकमें आचार्य दण्डीने बलवान् शत्रुसे भिड़नेके कारण डरे हुए निर्बल लोगों द्वारा अपने स्वामीकी आलोचना कराई है । भारविका उदाहरण अर्थकी दृष्टिसे इससे बेहतर है । किन्तु उसमें चतुर्थपादान्तमें तकारका प्रयोग १. अन्वय : अनेन अननेन नः अननानि नूनं न नुन्नानि, न । अनूनेन एनेन अनानिनः निनीः ना ननु अनेनाः न ?

३।६६] दुष्कर एवं सुकर मार्गका उपसंहार ११६ इति दुष्करमार्गेऽपि किञ्चिदादर्शितः क्रमः। प्रहेलिकाप्रकाराणां पुनरुद्दिश्यते गतिः ॥ ६६ ॥ इस प्रकार दुष्कर (कठिन, दुर्बोध रचना वाले) मार्गमें भी क्रम (व्यवस्था, स्वरूप) कुछ दिखा दिया है। अब प्रहेलिकाके भेदोंका स्वरूप नामतः बताया जा रहा है ॥ ६६ ॥ एकव्यञ्जन नियमको शिथिल करता है।¹ परवर्ती आचार्यों द्वारा अन्त्य वर्णकी भिन्नताको दोषावह न बताना² कविके सामर्थ्यकी शिथिलताको स्वीकार करना है। दण्डीके प्रकृत उदाहरणमें एक ही व्यञ्जन नकारका प्रयोग किया गया है। विसर्गको उस दृष्टिसे व्यञ्जन नहीं माना जाता (श्लोक ६२, पृष्ठ ११६ देखें) । अतः वह एकव्यञ्जन नियमका भञ्जक नहीं है ॥ ६५ ॥ दुष्कर एवं सुकर मार्गका उपसंहार—आचार्य दण्डीने तृतीय अध्यायमें (क) ३७वें श्लोक तक सुकर बन्ध वाले यमकका निरूपण किया है। (ख) ३८वेंसे ७७वें श्लोक तक ४० श्लोकोंमें दुष्कर बन्ध वाले यमकके विभिन्न भेद और उनके उदाहरण दिये हैं। (ग) ७८वें से ८२वें तक ५ श्लोकोंमें त्रिविध दुष्कर आकारबन्ध प्रदान किये हैं। (घ) ८३वें से ६५ वें तक १३ श्लोकोंमें दुष्कर वर्णनियमके तीन प्रकार उनके चार-चार अवान्तर भेदोंमें प्रतिपादित किये हैं। इस प्रकार (ख—घ) ३८वेंसे ६५वें तक ५८ श्लोकोंमें आचार्य दण्डीने काव्यमें शोभावह दुष्कर निबन्धनके मार्गका सङ्क्षेपमें किन्तु अनुक्त- की उपलक्षकताकी दृष्टिसे समृद्ध वर्णन किया है। 'अपि'से दुष्करसे पूर्व प्रतिपादित (क) सुकर मार्गका समुच्चय आचार्य को इष्ट है। दुष्करके अतिरिक्त सुकर मार्गका भी निरूपण सङ्क्षेपसे (किञ्चिद्) ही किया गया है। सुकरकी सङ्क्षिप्तताका स्पष्ट कथन पीछे ३७वें श्लोकमें किया जा चुका है। दुष्कर मार्ग भी पूरी तरहसे नहीं दिखलाया गया है। कुछ ही दिखलाया गया है। दुष्करके इस 'किञ्चिदादर्शित क्रम' में अभी (ङ) प्रहेलिकाओं (पहेलियों) का निरूपण रहता है। आचार्यने अगले ८० श्लोकोंमें पूर्वाचार्यों द्वारा निर्दिष्ट पन्द्रह शुद्ध और एक संकीर्ण १. न नोननुन्नो, नुन्नोनो, नाना नानाऽऽनना ननु । नुन्नोऽनुन्नो ननुन्नेनो नानेना नुन्ननुन्न नुत् ।। किरातार्जुनीय १५।१५ २. किरातार्जुनीय १५।१४ पर मल्लिनाथ सूरिका घण्टापथ : अयमेकव्य- ञ्जनः । अन्त्यस्तकारस्तु न दोषावहः । 'नान्त्यवर्णस्तु भेदकः' इत्यभ्यनु- ज्ञानात् ।

१२० काव्यादर्श [३।६६ प्रकारकी पहेलियोंके नाम तथा लक्षण दिये हैं। उन्हीं आचार्यों द्वारा प्रोक्त १४ दुष्ट पहेलियाँ न बतानेका प्रयोजन ११वें श्लोकमें बताकर १६ श्लोकोंमें पूर्वोक्त साधु प्रहेलिकाओंके उदाहरण प्रस्तुत किये हैं। सङ्कीर्ण प्रकार उप- लक्षक है नाना (गौण-मुख्य भावसे तथा समकक्ष रूपसे सम्पन्न) सङ्कर- प्रकारोंका। प्रहेलिका प्रकरणके अन्तिम (१७वें) श्लोकमें सङ्कीर्ण प्रहेलिकाकी सङ्गति बताई है। इस प्रकार ६७से १२४ तकके २७ श्लोकोंकी नक्षत्रमालासे आचार्यने रमणीय प्रहेलियोंकी कण्ठभूषा निर्मित की है। आचार्यने प्रहेलिकाओंके प्रयोजनोंमें (६७वें श्लोकमें) 'परव्यामोहन' भी एक प्रयोजन बताया है। इससे प्रहेलिकाओंकी दुष्करता सूचित होती है। रत्नश्रीज्ञान, वादि जङ्घालदेव तरुण वाचस्पति आदि प्राचीन तथा रङ्गाचार्य रेड्डी आदि अर्वाचीन सभी टीकाकारोंने इसके पूर्वार्ध श्लोकमें दुष्कर मार्गका उपसंहार माना है। यह उचित नहीं है। केवल पूर्वार्धमें दुष्करका उपसंहार माननेसे प्रहेलिकाएँ दुष्करसे बहिर्भूत माननी होंगी। तब वे पर-व्यामोहनमें उपयुक्त कैसे होंगी ? यह प्रयोजन तो इनके दुष्कर, दुर्बोध होनेसे ही सिद्ध हो सकता है, सुकर होनेसे नहीं। अतः इस समूचे श्लोकमें दुष्करका उपसंहार मानना उचित है ॥ त्रयोदश्यां गुरौ प्रातश्चन्द्रे रिरंसि-संयुते । वर्णनियमवांश्चित्रबन्धो व्याख्यायि यत्नतः ॥ १ ॥ हन्तेदमुज्ज्वलं दीप्तं प्रजाहाहाकरं नभः । न स्पृष्टं मेघनाम्नाऽपि; नितान्ताकरुणः प्रभुः ॥ २ ॥ कपूयाचरणे राज्ञि प्रजास्वस्यानुयासु च । कुतो देवस्य दृष्टिः स्यात्कोमला सुखदायिनी ॥ ३ ॥ हरो हरतु सन्तापमूलं दुष्कर्मभावनाम् । भव्यं भवतु लोकस्य; देशे स्याच्छासनं शुभम् ॥ ४ ॥ — ০ — नभःकृष्णे भृगो रात्रौ युगे-युगे प्रहेलिकाः । लोकमानसगाहिन्यो हंस्यो यथा समुज्ज्वलाः ॥ १ ॥ निर्दोषारावसंयुक्ता विद्वद्बालमनोहराः । सम्प्रत्याख्यामि ताः सम्यग् वेदे लोके समादृताः ॥ २ ॥ नैवेष्टा भामहैर्मुग्धैर्युक्त्याऽऽख्यातास्तु दण्डिभिः । इतो यत्नेन मध्येषा प्रीयतां वागधीश्वरी ॥ ३ ॥

३।६६] ४. प्रहेलिका १२१ पाटलोष्ठदलच्छन्नदशनस्मितपुष्पिणी । नखनिर्भातवीणाऽऽह्यतारस्वरनिनादिनी । ४ । ४. प्रहेलिका—यह शब्द प्र + √ हिल् (भावकरण, तु०) + इन् + कन् (अनुकम्पा में) + टाप् से निष्पन्न है ।१ इससे प्रकट होने वाला भाव ‘व्या- मोहन’ (उलझनमें, चक्करमें डालना) है, यह इस शब्दके प्राचीन पर्याय ‘प्रवल्हिका’ की ऐतरेय और गोपथ ब्राह्मणोंमें उपलब्ध व्याख्या तथा उसके अथर्ववेदीय उदाहरणोंसे२ स्पष्ट है । भावप्रकाशनकी यह पद्धति निबन्धनके काव्यात्मक स्वरूपके कारण प्रकृष्ट है तथा गोष्ठियोंमें लोकप्रिय होनेसे अनुकम्पाका विषय है । इस प्रकार चित्र अलङ्कारकी इस विधिका अर्थ ‘व्यामोहनकारी उक्तिका प्रकृष्ट (काव्यात्मक) लोकप्रिय प्रकार’ है । भामहके कथनसे विदित होता है कि ‘प्रहेलिका’ का दुष्कर अलङ्कारोंके मध्य निरूपण आचार्य रामशर्माने ‘अच्युतोत्तर’ नामक ग्रन्थमें किया था । भामहने इसका लक्षण नहीं दिया है । इसके द्विविध चरित्रके निर्देशसे इसके स्वरूपपर कुछ प्रकाश डाला है : प्रहेलिका (१) नाना धातुओं तथा अर्थोंसे गम्भीर (गूढ) होती है, तथा (२) नामसे यमक कहाती है ।३ कदाचिद् भामह १. अमरकोष १।६।२ : प्रवल्हिका प्रहेलिका । रामाश्रमी : प्रहेलयति = अभिप्रायं सूचयति । ‘हिल भावकरणे’ (तुदादि, प० सेट्) । उणादिसूत्र ४।११८ : सर्वधातुभ्य इन् । अष्टा० ५।३।७६ : अनुकम्पायाम् । यह शब्द कन् प्रत्ययके विना भी मिलता है : प्रहेलिः । हिन्दी ‘पहेली’ इसीसे विकसित है । २. ऐ० ब्रा० ३०।७ (६।३३) : प्रवल्हिकाः* शंसति । प्रवल्हिकाभिर्वै देवा असुरान् प्रवर्ल्ह्याथैनानत्यायन् । तथैवैतद् यजमानाः प्रवल्हिकाभिरेवाऽप्रियं भ्रातृव्यं प्रवर्ल्ह्याथैनमति यन्ति । सायणभाष्य : ‘विततौ किरणौ द्वौ’ (अथर्ववेद २०।१३३) इत्याद्याः षडनुष्टुभः प्रवल्हिकाऽऽख्याः । बृहद्देवता १।५७ : वितताऽऽदिः प्रवल्हिका । गोपथ ब्रा०, उत्तर भाग, ६।१३ : अथ प्रवल्हिकाः पूर्वं शस्त्वा ‘विततौ किरणौ द्वौ’ (अथर्व० २०।१३३) इति... । प्रवल्हिकाभिर्हं वै देवा असुराणां रसामप्रववृहुः । तद् यथाऽऽभिर् ह वै देवा असुराणां रसां प्रववृहुः । तस्मात् प्रवल्हिकाः । तत् प्रवल्हिकानां प्रवल्हिकात्वम् । वर्तनीपर विचारार्थ निरुक्तके पाँच अध्याय, पृष्ठ ५६६ देखें । ३. नाना-धात्वर्थ-गम्भीरा, यमक-व्यपदेशिनी । ‘प्रहेलिका’ सा ह्युदिता रामशर्माच्युतोत्तरे ॥ काव्यालङ्कार २।१६

१२२ काव्यादर्श [३।६७ क्रीडा-गोष्ठी-विनोदेषु तज्ज्ञैराकीर्ण-मन्त्रणे । पर-व्यामोहने चापि सोपयोगाः प्रहेलिकाः ॥ ६७ ॥ (१) खेलों, गोष्ठियों, मनोरञ्जनके अवसरोंपर, (२) भीड़में बातचीत करनेमें और (३) दूसरोंको विशेष रूपसे भुलावा देने (चकराने) में प्रहेलि- काएँ उनके जानकारोंके द्वारा उपयोगी (लाभकारी) होती हैं ॥ ६७ ॥ ऐसे यमकको नाममात्रका यमक कहते हैं, जिसमें नाना धातु अथवा अर्थ गूढ़ रहते हैं । पर अर्थोंकी गूढ़ताके कारण वे इसे ‘प्रहेलिका’ मानते हैं, यमक नहीं । भामहके इस कथनसे प्रहेलिकामें (१) धातु तथा (२) अर्थकी गूढ़ता लक्षण सिद्ध होती है । ‘धातु’ उपलक्षक है नाम उपसर्ग आदि प्रकारके शब्दों का । इस प्रकार प्रहेलिकाके (१) शब्दगूढ़ और (२) अर्थगूढ भेद भामहको अभिप्रेत प्रतीत होते हैं । पर भामहका प्रहेलिकाको ‘यमक’ कहना कुछ जँचता नहीं है : यमकमें तो तुल्यश्रुति वर्णोंकी आवृत्ति मुख्य स्वरूपलक्षण धर्म है; प्रहेलिकाके स्थलमें वह अनुप्रास, उपमा आदिके समान आनुषङ्गिक तो हो सकती है, पर स्वरूपगत कैसे हो सकती है ? दण्डीने (श्लोक १०६ में) सोलह प्रकारकी पहेलियाँ पूर्वाचार्यों द्वारा निर्दिष्ट बताई हैं । रत्नश्रीज्ञानने पूर्वाचार्योंकी व्याख्या ‘रामशर्मादिभिः’ की है । कह नहीं सकते कि उन्होंने यह नामोल्लेख सुनी-सुनाई बातके आधारपर किया है, या रामशर्माके ग्रन्थको देखकर किया है । पर दण्डीने (श्लोक १०६ में) पूर्वाचार्योंको अभिमत १६ साधु और १४ दुष्ट प्रहेलिकाओंकी बात ठोस आधारपर (उनके ग्रन्थ देखकर) ही की लगती है । दण्डी द्वारा प्रस्तुत पूर्वा- चार्यसम्मत ये सोलह प्रहेलिकायें यमकके संस्पर्शसे रहित हैं । इससे अनुमान किया जा सकता है कि पूर्वाचार्यों रामशर्मा आदिकी प्रहेलिकाओंमें भी यमक तत्त्व आवश्यक नहीं रहा होगा, अन्यथा दण्डीके लक्षणोदाहरणोंमें यमक- संस्पर्श पूर्वपक्षके रूपमें ही सही, अवश्य, मिलता ॥ ६६ ॥ प्रहेलिकाओंकी उपयोगिता - दण्डीने प्रहेलिकाका सामान्य लक्षण न देकर भेदोंके लक्षणमें उसे स्पष्ट किया है । षोडशभेद निरूपणसे पूर्व आचार्यने एक (६७) श्लोकमें पहेलियोंका प्रयोजन बताया है । वात्स्यायनके अनुसार नाग- रककी दिनचर्यामें अपराह्नका समय गोष्ठी-विहारके लिये नियत था । इसके अतिरिक्त किसी निमित्तसे, पर्वोंपर, या पक्ष अथवा मासमें किसी एक घोषित दिन समान विद्या, बुद्धि, शील, आर्थिक स्थिति और वयस् वाले लोगोंका

जमावड़ा वेश्याभवनमें, सभामें या नागरकोंमेंसे ही किसी एकके घरपर होता था । इनका उद्देश्य नागरकोंके काव्यव्यासङ्गसे अथवा अन्य गीत, वाद्य आदि के प्रदर्शनसे बुद्धिविकास था । इनमें गम्भीर चर्चाओंकी तो कम गुंजाइश थी, हाँ हल्की फुल्की काव्यचर्चा, अथवा कलाविषयक समस्याओंपर विचार आदि हुआ करता था ।१ इस तरहके अवसरोंके लिये प्रहेलिका, प्रतिमाला (अन्त्या- क्षरी), समस्यापूर्ति, कलायें विशेष उपयोगी होती थीं ।२ गोष्ठियोंके अन्तमें श्रेष्ठ प्रहेलिका आदिको सम्मान व्यक्त करके प्रोत्साहित किया जाता था ।३ इन सब प्रकारके अवसरोंपर आयोजित गोष्ठियोंको आचार्यने 'क्रीडा- गोष्ठी-विनोदेषु' कहा है । स्पष्ट है कि इन गोष्ठियोंमें गम्भीर प्रबन्धकाव्योंका प्रणयन या उन पर विचार नहीं होता होगा । अतः प्रहेलिकाओंका (१) प्रथम उपयोग इन गोष्ठियोंमें इन्हें सुनाना, वाहवाही लूटना तथा अपने ईर्ष्यालुओंको हत-प्रभ करना और अपना तथा दूसरोंका विनोद (मनोरञ्जन) करते हुए कालक्षेप करना था । यही आज भी है । (२) जनसङ्कुल स्थानों में भी पहेलियाँ बुझाकर अपने मन्तव्यका सम्प्रेषण करके आमन्त्रण (बात- १. कामसूत्र १।४।२२ : गृहीत-प्रसाधनस्यापराह्णे गोष्ठीविहाराः । जयमङ्गला : 'गोष्ठीविहारा' = 'गोष्ठ्यां क्रीडा' इति । २६ : घटानि- बन्धनं, गोष्ठीसमवायः, समापानकम्, उद्यानगमनं, समस्याः, क्रीडाश्च प्रवर्त्तयेत् । २७ : पक्षस्य मासस्य वा प्रज्ञातेऽहनि... ३४ : वेश्याभवने, सभायामन्यतमस्योदवसिते वा समान-विद्या-बुद्धि-शील-वित्त-वयसां सह वेश्याभिरनुरूपैरालापैरासनबन्धो गोष्ठी । ३५ : तत्र चैषां काव्य- समस्या कलासमस्या च । जयमङ्गला : सम्भूय दर्शनं निरूपणं तत्समस्या, 'चर्चा' इत्यर्थः । २. कामसूत्र १।३।१६ तथा इसपर जयमङ्गला : '(२८) प्रहेलिका' इति— क्रीडार्था, वाक्यार्था च । '(२६) प्रतिमाला' इति—यस्या अन्त्याक्षरिकेति प्रतीतिः । सा क्रीडाऽर्था वादार्था च । यथोक्तम्— 'प्रतिश्लोकं क्रमाद्यत्र सन्धायाक्षरमन्तिमम् । पठेतां श्लोकमन्योन्यं प्रतिमालेति सोच्यते ।।' इति । ....'(३३) काव्यसमस्यापूरणम्' इति—'...' काव्यस्य श्लोकस्य समस्या पाद इत्यर्थः, तस्याः पूरणं क्रीडाऽर्थं वादार्थं च । ३. कामसूत्र १।४।३६ : तस्यामुज्ज्वला लोककान्ताः पूज्याः प्रीतिसमाना- श्चाहारिताः :