भारतकोश
काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary

महाकवि दण्डी द्वारा

DevanagariHindipublished270 पृष्ठ

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३।६६] ४. प्रहेलिका १२१ पाटलोष्ठदलच्छन्नदशनस्मितपुष्पिणी । नखनिर्भातवीणाऽऽह्यतारस्वरनिनादिनी । ४ । ४. प्रहेलिका—यह शब्द प्र + √ हिल् (भावकरण, तु०) + इन् + कन् (अनुकम्पा में) + टाप् से निष्पन्न है ।१ इससे प्रकट होने वाला भाव ‘व्या- मोहन’ (उलझनमें, चक्करमें डालना) है, यह इस शब्दके प्राचीन पर्याय ‘प्रवल्हिका’ की ऐतरेय और गोपथ ब्राह्मणोंमें उपलब्ध व्याख्या तथा उसके अथर्ववेदीय उदाहरणोंसे२ स्पष्ट है । भावप्रकाशनकी यह पद्धति निबन्धनके काव्यात्मक स्वरूपके कारण प्रकृष्ट है तथा गोष्ठियोंमें लोकप्रिय होनेसे अनुकम्पाका विषय है । इस प्रकार चित्र अलङ्कारकी इस विधिका अर्थ ‘व्यामोहनकारी उक्तिका प्रकृष्ट (काव्यात्मक) लोकप्रिय प्रकार’ है । भामहके कथनसे विदित होता है कि ‘प्रहेलिका’ का दुष्कर अलङ्कारोंके मध्य निरूपण आचार्य रामशर्माने ‘अच्युतोत्तर’ नामक ग्रन्थमें किया था । भामहने इसका लक्षण नहीं दिया है । इसके द्विविध चरित्रके निर्देशसे इसके स्वरूपपर कुछ प्रकाश डाला है : प्रहेलिका (१) नाना धातुओं तथा अर्थोंसे गम्भीर (गूढ) होती है, तथा (२) नामसे यमक कहाती है ।३ कदाचिद् भामह १. अमरकोष १।६।२ : प्रवल्हिका प्रहेलिका । रामाश्रमी : प्रहेलयति = अभिप्रायं सूचयति । ‘हिल भावकरणे’ (तुदादि, प० सेट्) । उणादिसूत्र ४।११८ : सर्वधातुभ्य इन् । अष्टा० ५।३।७६ : अनुकम्पायाम् । यह शब्द कन् प्रत्ययके विना भी मिलता है : प्रहेलिः । हिन्दी ‘पहेली’ इसीसे विकसित है । २. ऐ० ब्रा० ३०।७ (६।३३) : प्रवल्हिकाः* शंसति । प्रवल्हिकाभिर्वै देवा असुरान् प्रवर्ल्ह्याथैनानत्यायन् । तथैवैतद् यजमानाः प्रवल्हिकाभिरेवाऽप्रियं भ्रातृव्यं प्रवर्ल्ह्याथैनमति यन्ति । सायणभाष्य : ‘विततौ किरणौ द्वौ’ (अथर्ववेद २०।१३३) इत्याद्याः षडनुष्टुभः प्रवल्हिकाऽऽख्याः । बृहद्देवता १।५७ : वितताऽऽदिः प्रवल्हिका । गोपथ ब्रा०, उत्तर भाग, ६।१३ : अथ प्रवल्हिकाः पूर्वं शस्त्वा ‘विततौ किरणौ द्वौ’ (अथर्व० २०।१३३) इति... । प्रवल्हिकाभिर्हं वै देवा असुराणां रसामप्रववृहुः । तद् यथाऽऽभिर् ह वै देवा असुराणां रसां प्रववृहुः । तस्मात् प्रवल्हिकाः । तत् प्रवल्हिकानां प्रवल्हिकात्वम् । वर्तनीपर विचारार्थ निरुक्तके पाँच अध्याय, पृष्ठ ५६६ देखें । ३. नाना-धात्वर्थ-गम्भीरा, यमक-व्यपदेशिनी । ‘प्रहेलिका’ सा ह्युदिता रामशर्माच्युतोत्तरे ॥ काव्यालङ्कार २।१६