भारतकोश
संग्रह पर लौटें

काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary

महाकवि दण्डी द्वारा

DevanagariHindipublished270 पृष्ठ

३।६६] ४. प्रहेलिका १२१ पाटलोष्ठदलच्छन्नदशनस्मितपुष्पिणी । नखनिर्भातवीणाऽऽह्यतारस्वरनिनादिनी । ४ । ४. प्रहेलिका—यह शब्द प्र + √ हिल् (भावकरण, तु०) + इन् + कन् (अनुकम्पा में) + टाप् से निष्पन्न है ।१ इससे प्रकट होने वाला भाव ‘व्या- मोहन’ (उलझनमें, चक्करमें डालना) है, यह इस शब्दके प्राचीन पर्याय ‘प्रवल्हिका’ की ऐतरेय और गोपथ ब्राह्मणोंमें उपलब्ध व्याख्या तथा उसके अथर्ववेदीय उदाहरणोंसे२ स्पष्ट है । भावप्रकाशनकी यह पद्धति निबन्धनके काव्यात्मक स्वरूपके कारण प्रकृष्ट है तथा गोष्ठियोंमें लोकप्रिय होनेसे अनुकम्पाका विषय है । इस प्रकार चित्र अलङ्कारकी इस विधिका अर्थ ‘व्यामोहनकारी उक्तिका प्रकृष्ट (काव्यात्मक) लोकप्रिय प्रकार’ है । भामहके कथनसे विदित होता है कि ‘प्रहेलिका’ का दुष्कर अलङ्कारोंके मध्य निरूपण आचार्य रामशर्माने ‘अच्युतोत्तर’ नामक ग्रन्थमें किया था । भामहने इसका लक्षण नहीं दिया है । इसके द्विविध चरित्रके निर्देशसे इसके स्वरूपपर कुछ प्रकाश डाला है : प्रहेलिका (१) नाना धातुओं तथा अर्थोंसे गम्भीर (गूढ) होती है, तथा (२) नामसे यमक कहाती है ।३ कदाचिद् भामह १. अमरकोष १।६।२ : प्रवल्हिका प्रहेलिका । रामाश्रमी : प्रहेलयति = अभिप्रायं सूचयति । ‘हिल भावकरणे’ (तुदादि, प० सेट्) । उणादिसूत्र ४।११८ : सर्वधातुभ्य इन् । अष्टा० ५।३।७६ : अनुकम्पायाम् । यह शब्द कन् प्रत्ययके विना भी मिलता है : प्रहेलिः । हिन्दी ‘पहेली’ इसीसे विकसित है । २. ऐ० ब्रा० ३०।७ (६।३३) : प्रवल्हिकाः* शंसति । प्रवल्हिकाभिर्वै देवा असुरान् प्रवर्ल्ह्याथैनानत्यायन् । तथैवैतद् यजमानाः प्रवल्हिकाभिरेवाऽप्रियं भ्रातृव्यं प्रवर्ल्ह्याथैनमति यन्ति । सायणभाष्य : ‘विततौ किरणौ द्वौ’ (अथर्ववेद २०।१३३) इत्याद्याः षडनुष्टुभः प्रवल्हिकाऽऽख्याः । बृहद्देवता १।५७ : वितताऽऽदिः प्रवल्हिका । गोपथ ब्रा०, उत्तर भाग, ६।१३ : अथ प्रवल्हिकाः पूर्वं शस्त्वा ‘विततौ किरणौ द्वौ’ (अथर्व० २०।१३३) इति... । प्रवल्हिकाभिर्हं वै देवा असुराणां रसामप्रववृहुः । तद् यथाऽऽभिर् ह वै देवा असुराणां रसां प्रववृहुः । तस्मात् प्रवल्हिकाः । तत् प्रवल्हिकानां प्रवल्हिकात्वम् । वर्तनीपर विचारार्थ निरुक्तके पाँच अध्याय, पृष्ठ ५६६ देखें । ३. नाना-धात्वर्थ-गम्भीरा, यमक-व्यपदेशिनी । ‘प्रहेलिका’ सा ह्युदिता रामशर्माच्युतोत्तरे ॥ काव्यालङ्कार २।१६

१२२ काव्यादर्श [३।६७ क्रीडा-गोष्ठी-विनोदेषु तज्ज्ञैराकीर्ण-मन्त्रणे । पर-व्यामोहने चापि सोपयोगाः प्रहेलिकाः ॥ ६७ ॥ (१) खेलों, गोष्ठियों, मनोरञ्जनके अवसरोंपर, (२) भीड़में बातचीत करनेमें और (३) दूसरोंको विशेष रूपसे भुलावा देने (चकराने) में प्रहेलि- काएँ उनके जानकारोंके द्वारा उपयोगी (लाभकारी) होती हैं ॥ ६७ ॥ ऐसे यमकको नाममात्रका यमक कहते हैं, जिसमें नाना धातु अथवा अर्थ गूढ़ रहते हैं । पर अर्थोंकी गूढ़ताके कारण वे इसे ‘प्रहेलिका’ मानते हैं, यमक नहीं । भामहके इस कथनसे प्रहेलिकामें (१) धातु तथा (२) अर्थकी गूढ़ता लक्षण सिद्ध होती है । ‘धातु’ उपलक्षक है नाम उपसर्ग आदि प्रकारके शब्दों का । इस प्रकार प्रहेलिकाके (१) शब्दगूढ़ और (२) अर्थगूढ भेद भामहको अभिप्रेत प्रतीत होते हैं । पर भामहका प्रहेलिकाको ‘यमक’ कहना कुछ जँचता नहीं है : यमकमें तो तुल्यश्रुति वर्णोंकी आवृत्ति मुख्य स्वरूपलक्षण धर्म है; प्रहेलिकाके स्थलमें वह अनुप्रास, उपमा आदिके समान आनुषङ्गिक तो हो सकती है, पर स्वरूपगत कैसे हो सकती है ? दण्डीने (श्लोक १०६ में) सोलह प्रकारकी पहेलियाँ पूर्वाचार्यों द्वारा निर्दिष्ट बताई हैं । रत्नश्रीज्ञानने पूर्वाचार्योंकी व्याख्या ‘रामशर्मादिभिः’ की है । कह नहीं सकते कि उन्होंने यह नामोल्लेख सुनी-सुनाई बातके आधारपर किया है, या रामशर्माके ग्रन्थको देखकर किया है । पर दण्डीने (श्लोक १०६ में) पूर्वाचार्योंको अभिमत १६ साधु और १४ दुष्ट प्रहेलिकाओंकी बात ठोस आधारपर (उनके ग्रन्थ देखकर) ही की लगती है । दण्डी द्वारा प्रस्तुत पूर्वा- चार्यसम्मत ये सोलह प्रहेलिकायें यमकके संस्पर्शसे रहित हैं । इससे अनुमान किया जा सकता है कि पूर्वाचार्यों रामशर्मा आदिकी प्रहेलिकाओंमें भी यमक तत्त्व आवश्यक नहीं रहा होगा, अन्यथा दण्डीके लक्षणोदाहरणोंमें यमक- संस्पर्श पूर्वपक्षके रूपमें ही सही, अवश्य, मिलता ॥ ६६ ॥ प्रहेलिकाओंकी उपयोगिता - दण्डीने प्रहेलिकाका सामान्य लक्षण न देकर भेदोंके लक्षणमें उसे स्पष्ट किया है । षोडशभेद निरूपणसे पूर्व आचार्यने एक (६७) श्लोकमें पहेलियोंका प्रयोजन बताया है । वात्स्यायनके अनुसार नाग- रककी दिनचर्यामें अपराह्नका समय गोष्ठी-विहारके लिये नियत था । इसके अतिरिक्त किसी निमित्तसे, पर्वोंपर, या पक्ष अथवा मासमें किसी एक घोषित दिन समान विद्या, बुद्धि, शील, आर्थिक स्थिति और वयस् वाले लोगोंका

जमावड़ा वेश्याभवनमें, सभामें या नागरकोंमेंसे ही किसी एकके घरपर होता था । इनका उद्देश्य नागरकोंके काव्यव्यासङ्गसे अथवा अन्य गीत, वाद्य आदि के प्रदर्शनसे बुद्धिविकास था । इनमें गम्भीर चर्चाओंकी तो कम गुंजाइश थी, हाँ हल्की फुल्की काव्यचर्चा, अथवा कलाविषयक समस्याओंपर विचार आदि हुआ करता था ।१ इस तरहके अवसरोंके लिये प्रहेलिका, प्रतिमाला (अन्त्या- क्षरी), समस्यापूर्ति, कलायें विशेष उपयोगी होती थीं ।२ गोष्ठियोंके अन्तमें श्रेष्ठ प्रहेलिका आदिको सम्मान व्यक्त करके प्रोत्साहित किया जाता था ।३ इन सब प्रकारके अवसरोंपर आयोजित गोष्ठियोंको आचार्यने 'क्रीडा- गोष्ठी-विनोदेषु' कहा है । स्पष्ट है कि इन गोष्ठियोंमें गम्भीर प्रबन्धकाव्योंका प्रणयन या उन पर विचार नहीं होता होगा । अतः प्रहेलिकाओंका (१) प्रथम उपयोग इन गोष्ठियोंमें इन्हें सुनाना, वाहवाही लूटना तथा अपने ईर्ष्यालुओंको हत-प्रभ करना और अपना तथा दूसरोंका विनोद (मनोरञ्जन) करते हुए कालक्षेप करना था । यही आज भी है । (२) जनसङ्कुल स्थानों में भी पहेलियाँ बुझाकर अपने मन्तव्यका सम्प्रेषण करके आमन्त्रण (बात- १. कामसूत्र १।४।२२ : गृहीत-प्रसाधनस्यापराह्णे गोष्ठीविहाराः । जयमङ्गला : 'गोष्ठीविहारा' = 'गोष्ठ्यां क्रीडा' इति । २६ : घटानि- बन्धनं, गोष्ठीसमवायः, समापानकम्, उद्यानगमनं, समस्याः, क्रीडाश्च प्रवर्त्तयेत् । २७ : पक्षस्य मासस्य वा प्रज्ञातेऽहनि... ३४ : वेश्याभवने, सभायामन्यतमस्योदवसिते वा समान-विद्या-बुद्धि-शील-वित्त-वयसां सह वेश्याभिरनुरूपैरालापैरासनबन्धो गोष्ठी । ३५ : तत्र चैषां काव्य- समस्या कलासमस्या च । जयमङ्गला : सम्भूय दर्शनं निरूपणं तत्समस्या, 'चर्चा' इत्यर्थः । २. कामसूत्र १।३।१६ तथा इसपर जयमङ्गला : '(२८) प्रहेलिका' इति— क्रीडार्था, वाक्यार्था च । '(२६) प्रतिमाला' इति—यस्या अन्त्याक्षरिकेति प्रतीतिः । सा क्रीडाऽर्था वादार्था च । यथोक्तम्— 'प्रतिश्लोकं क्रमाद्यत्र सन्धायाक्षरमन्तिमम् । पठेतां श्लोकमन्योन्यं प्रतिमालेति सोच्यते ।।' इति । ....'(३३) काव्यसमस्यापूरणम्' इति—'...' काव्यस्य श्लोकस्य समस्या पाद इत्यर्थः, तस्याः पूरणं क्रीडाऽर्थं वादार्थं च । ३. कामसूत्र १।४।३६ : तस्यामुज्ज्वला लोककान्ताः पूज्याः प्रीतिसमाना- श्चाहारिताः :

१२४ काव्यादर्श [३।६७ बीत) कर ली जाती है । (३) लोगोंको गूढ शब्द अथवा गूढार्थके प्रयोगसे चक्करमें डालना भी पहेलीका प्रयोजन है । इन तीनों प्रयोजनोंमें अन्तिम प्रयोजन ही पहेलियोंका मुख्य प्रयोजन है । वैदिक साहित्यमें गूढार्थक बहुतसे मन्त्र उपलब्ध हैं, जिनकी गूढार्थताका प्रयो- जन श्रोताओंको चक्करमें डालना है । प्रसिद्ध अस्यवामीय (ऋ० १।१६४) सूक्तके १-४, ७, ११-२०, २२, ३२, ४१, ४८ मन्त्र ठेठ पहेलियाँ ही हैं, जिन्हें समझ न पानेपर श्रोताको ऋषिसे पूछना पड़ा होगा : महाराज, अब इनका अर्थ समझाइये । अथर्ववेदका तो एक पूरा सूक्त (२०।१३३) ही 'पहेलियोंका सूक्त' कहा जाता है ।१ ऐतरेय महीदासने इन्हें 'प्रवह्निका' कहा है : असुरों को पहेलियोंमें उलझनमें डालकर देव लोग उनसे आगे बढ़ गये । यजमान भी पहेलियोंसे अपने शत्रुको उलझाकर उनसे आगे बढ़ जाते हैं ।२ आचार्य रुद्रटने इन तीनों प्रयोजनोंमें दण्डीकी 'क्रीडा' को ही उपयुक्त माना है ।३ उनकी दृष्टि कदाचिद् यह है कि पहेलियोंसे परव्यामोहन क्रीडा (मनोविनोद) का ही साधन है, साध्य नहीं । परव्यामोहन साध्य होनेपर शत्रुता पनपती है, जो काव्यका प्रयोजन नहीं हो सकती । पर भोजने (सरस्वती० २।१३४में) दण्डीकी दृष्टिका ही अनुकरण किया है । स्पष्ट ही ये सब बातें महाकाव्यमें यत्र-तत्र-सर्वत्र आने वाली स्थितियाँ नहीं हैं । अतः महाकाव्यमें तो इनका प्रयोग सीमित ही होगा । हाँ, मुक्तक आदि छोटे बन्ध इनका स्वतन्त्र क्षेत्र हैं । पर उनमें भी अवसर और प्रयोजन सीमित ही हैं । यही कारण है कि अच्छे कवि तथा काव्यशास्त्री पहेलियोंको अधिक प्रोत्साहन नहीं देते । किन्तु भामहका यह कहना भी उचित नहीं है कि गूढशब्दार्थ होनेके कारण व्याख्यागम्य होनेसे प्रहेलिकायें हेय हैं ।४ सहृदयोंके १. बृहद्देवता १।५७ : वितताऽऽदिः* प्रवह्निका । अथर्व २०।१३३ । २. प्रवह्निकाः शंसति । प्रवह्निकाभिर्वै देवा असुरान्* प्रवल्ह्याथैनान- त्यायन् । तथैवैतद् यजमानाः प्रवह्निकाभिरेवाप्रियं भ्रातृव्यं प्रवल्ह्याथैन- मति यन्ति । सायण : 'विततौ किरणौ द्वौ' (अथर्व० २०।१३३) इत्याद्या षडनुष्टभः प्रवह्निकाऽऽख्याः । *इन शब्दोंकी वर्तनीके लिये देखें निरुक्त के पाँच अध्याय, ७।११, पृष्ठ ५६६ । ३. मात्रा-बिन्दु-च्युतके, प्रहेलिका, कारक-क्रिया-गूढे । प्रश्नोत्तरादि चान्यत् क्रीडामात्रोपयोगमिदम् ।। काव्याल० ५।२४ ४. काव्यान्यपि यदीमानि व्याख्यागम्यानि शास्त्रवत् । उत्सवः सुधियामेव, हन्त दुर्मेधसो हताः ।। काव्याल० २।२०

३। - ८] ४. प्रहेलिकाओंके लक्षण १२५ (१) आहुः समागतां नाम गूढार्थां पद-सन्धिना । (२) वञ्चिताऽन्यत्र रूढेन यत्र शब्देन वञ्चना ॥ ६८ ॥ (१) पदों (सुबन्त-तिङन्तरूप शब्दों) की सन्धिसे जिस उक्तिका अर्थ छुप जाता है, उसे समागता कहते हैं । (२) अन्य अर्थमें प्रसिद्ध शब्दका प्रयोग करके जहाँ छला जाता है, वह वञ्चिता (कहलाती) है ॥ ६८ ॥

छोटे-मोटे जमावड़ोंमें इस तरहके हल्के-फुल्के काव्य लोकहृदयग्राही होते हैं । यह अनुभवसिद्ध है, किसी आचार्यवचनकी अपेक्षा नहीं करता ॥ ६७ ॥ आचार्य दण्डीने प्रहेलिकाओंका निरूपण तीन क्रमोंमें किया है : (१) ६८- १०४।। तकके श्लोकोंमें पन्द्रह शुद्ध प्रहेलिकाओंके लक्षण बतानेके बाद इनके सङ्करसे निष्पन्न सङ्कीर्ण प्रहेलिका प्रकारको बताया है; (२) पूर्वाचार्यसम्मत दोषयुक्त चौदह प्रहेलिकाओंका अभिधान न करनेका हेतु १०६-१०७ में बताया है; (३) फिर १०८-१२२ तक पन्द्रह शुद्ध प्रहेलिकाओंके पन्द्रह उदा- हरण देकर १२३ में उदाहृत संकीर्ण प्रहेलिकामें सङ्कीर्ण पहेलियाँ बताकर इस उदाहरणको अन्य भेदोंके साङ्कर्यका उपलक्षक बताया है । सभी प्रहेलिकाओंमें सामान्य तत्त्व परव्यामोहन है । व्यामोहन कहीं शब्दका स्वरूप समझ न आनेसे आता है, तो कहीं अर्थकी दुरूहताके कारण आता है । शब्द और अर्थ को दुरूह बनानेके प्रकारोंमें भेद होनेसे ये प्रहेलिकायें एक-दूसरेसे भिन्न हैं । इन सोलह भेदोंके अतिरिक्त पूर्वाचार्य चौदह दोषयुक्त प्रहेलिकायें भी मानते थे, यह दण्डीने बताया है । (१) समागता—यह पहेली विशुद्ध रूपसे शब्दगूढा है । दो पदोंमें स्वर- सन्धि या व्यञ्जनसन्धिसे जब भिन्न प्रकारका शब्द निष्पन्न हो जाता है, तब पदके स्वरूपके विषयमें श्रोताकी बुद्धि भ्रान्त हो जाती है । उस उक्तिका वास्तविक अर्थ छुप जाता है । इस प्रकारकी यह प्रहेलिका पदोंके समागम (सन्धान) के कारण निष्पन्न होनेसे 'समागता' कहलाती है । इसका उदाहरण आचार्यने १०८वें श्लोकमें दिया है । (२) वञ्चिता—विवक्षितसे भिन्न अर्थमें प्रसिद्ध शब्दका प्रयोग करके उससे जहाँ विवक्षितार्थका गोपन किया जाये, वह प्रहेलिका 'वञ्चिता' होती है । इस प्रकार अन्यार्थक शब्दके प्रयोगसे श्रोताकी सही अर्थका बोध नहीं होता, वह भ्रान्त हो जाता है । इस प्रकार वञ्चन (छलने) के कारण यह पहेली 'वञ्चिता' है । 'वञ्चिता' पद 'वञ्चितं = वञ्चनमस्त्यस्यां' व्युत्पत्तिसे

१२६ काव्यादर्श [३।६६-१०० (३) व्युत्क्रान्ताऽतिव्यवहित-प्रयोगान्मोहकारिणी । (४) सा स्यात् प्रमुषिता, यस्यां दुर्बोधार्था पदावली ॥ ६६ ॥ (५) समानरूपा गौणार्थारोपितैर्ग्रथिता पदैः । (३) पादोंके अधिक व्यवधानसे प्रयोगके कारण (अर्थके बारेमें) भ्रान्ति करने वाली व्युत्क्रान्ता (होती है) । (४) वह प्रमुषिता होती है, जिसमें पदसमूह कठिनाईसे समझमें आने वाले अर्थसे युक्त होता है ॥ ६६ ॥ (५) गौण (लाक्षणिक) अर्थोंमें आरोपित पदोंसे विरचित (प्रहेलिका) समान-रूपा होती है । ‘प्रहेलिका’ का विशेषण है । यहाँ वञ्चन (प्रतारण) शब्दके द्वारा नहीं, अपितु अन्य अर्थमें रूढ शब्दके माध्यमसे गूढ हुए अर्थके द्वारा होता है । अर्थ के द्वारा अर्थके विषयमें भ्रान्ति करनेसे यह अर्थगूढा है । उदाहरणार्थ १०६ वाँ श्लोक देखें ॥ ६८ ॥ (३) व्युत्क्रान्ता—पदोंके अत्यन्त व्यवहित प्रयोग (विन्यास) से अन्वय में कठिनाई आ जाती है, जिससे श्रोताको अर्थके विषयमें व्यामोह हो जाता है । व्युत्क्रमणसे विन्यास शब्दका धर्म है, जिससे प्रभावित होता है पदोंका परस्पर सम्बन्ध (अन्वय) । सम्बन्ध अर्थगत होता है । अतः यह प्रहेलिका भी अर्थगूढा ही है । पदोंके सम्बन्धके निश्चित न होनेसे या तो (i) अर्थका निश्चय ही नहीं होगा, या (ii) विपरीत अर्थका अवबोध भी हो सकता है । इस प्रहेलिकामें व्यामोहका आदि कारण पदोंका व्युत्क्रम (व्यवहित प्रयोग) है । अतः इसे ‘व्युत्क्रान्ता’ कहा गया है । यहाँ ‘क्त’ प्रत्यय कर्त्रर्थमें है । इसका उदाहरण ११०वें श्लोकमें है । (४) प्रमुषिता—जिस प्रहेलिकामें शब्दावलीका अर्थ स्वरूपतः ही दुर्बोध हो, तो वह अर्थका अपहरण (प्रमोषण) हो जानेसे ‘प्रमुषिता’ कहलाती है । यह भी अर्थगूढा है । उदाहरण १११वें श्लोकमें है ॥ ६६ ॥ (५) समानरूपा—प्रहेलिकाके ग्रथनमें प्रयुक्त पद अपने प्रसिद्ध मुख्यार्थके वाचक न होकर उनके वाच्य पदार्थके गुणोंसे साम्यके कारण उन गुणोंसे युक्त किसी अन्य पदार्थको लक्षित करते हों, तब समान पदार्थके आरोपके कारण यह प्रहेलिका ‘समान-रूपा’ कहलाती है । यह आरोप प्रायः समासोक्तिकी सृष्टि करता है । यह प्रहेलिका भी अर्थगूढा है । शब्दोंसे किसी वस्तुका वर्णन प्राप्त होते हुए भी अन्य सदृश पदार्थकी विवक्षा साधारण जनके लिये दुर्बोध होती है, अतः यह दुष्कर चित्र शब्दालङ्कार है । उदाहरण ११२वें श्लोकमें है ।

३।१००-१०२] ४. प्रहेलिकाके भेद १२७ (६) परुषा लक्षणास्तित्व-मात्र-व्युत्पादित-श्रुतिः ॥१००॥ (७) सङ्ख्याता नाम सङ्ख्यानं यत्र व्यामोहकारणम् । (८) अन्यथा भासते यत्र वाक्यार्थः, सा प्रकल्पिता ॥ १०१ ॥ (६) सा नामान्तरिता यस्या नाम्नि नानाऽर्थकल्पना । (६) पदोंके निरूपक शास्त्र (व्याकरण) के सद्भाव मात्रसे व्युत्पन्न किये गये पदों वाली परुषा होती है ॥ १०० ॥ (७) जिसमें गिनती उलझाने वाली होती है, वह सङ्ख्याता है । (८) जहाँ वाक्यका अर्थ (इष्टसे) भिन्न प्रकारसे प्रतीत होता है, वह प्रकल्पिता है ॥ १०१ ॥ (६) वह (पहेली) नामान्तरिता (दूसरे नामपदसे युक्त) होती है, जिसके नाम (सञ्ज्ञापद) में विभिन्न (अनेक) अर्थोंकी कल्पना होती है । (६) परुषा जिस प्रहेलिकामें ऐसे शब्दोंका प्रयोग किया जाता है, जिनका लोकमें प्रयोग नहीं होता । शब्दोंके व्युत्पादक शास्त्र व्याकरणके सूत्रोंमें उनकी व्युत्पत्ति अवश्य प्रतिपादित होती है । व्यवहार और काव्यके क्षेत्रसे बाहरके शास्त्राभ्याससे ही ज्ञेय ऐसे शब्द कोमलमति लोगोंको चावलमें कंकड़की तरह कठोर लगते हैं । अतः इस प्रकारके प्रयोग जब विनोदार्थ किये जायें, तो वे कोमलमति नागरिकोंको खूब व्यामूढ करते हैं । प्रहेलिकाका उप- योग ही परव्यामोहनार्थ है । इस लिये ऐसे प्रयोग प्रहेलिकामें शोभाकारक होते हैं । काव्यके सामान्य प्रकारमें भले ये प्रयोग दोष माने जाते हैं । यह अर्थगूढताका ही एक प्रकार है । उदाहरण ११३वें श्लोकमें देखें ॥ १०० ॥ (७) सङ्ख्याता—जिस उक्तिमें गिनती उलझानेवाली होती है, उसे ‘सङ्ख्याता’ प्रहेलिका कहा जाता है । ‘सङ्ख्या’ अर्थ है । अतः यह पहेली भी अर्थगूढा है । इसका उदाहरण ११४वें श्लोकमें है । (८) प्रकल्पिता—जिस उक्तिमें वाक्यार्थ विवक्षितसे अन्य रूपमें भासित होता है, वह वास्तविक नहीं होता । जानबूझकर अर्थान्तरका आभास करानेके कारण उस उक्तिको ‘प्रकल्पिता’ प्रहेलिका कहा जाता है । यह भी अर्थगूढा है । इसका उदाहरण ११५वें श्लोकमें है ॥ १०१ ॥ (६) नामान्तरिता—जिस उक्तिमें प्रयुक्त नाम (सञ्ज्ञा) पदोंमें अनेक अर्थोंकी कल्पनाकी जाती है, उसे ‘नामान्तरिता’ प्रहेलिका कहा जाता है ।

१२८ काव्यादर्श [३।१०२ (१०) निभृता निभृतान्यार्था तुल्य-धर्म-स्पृशा गिरा ॥ १०२ ॥ (१०) समान धर्मों (अथवा तुल्य धर्म वाले अर्थों) को स्पर्श करने वाली वाणी (शब्दों) से अन्य अर्थको छुपाने वाली पहेली निभृता होती है ॥१०२॥ (८) 'प्रकल्पिता' में अर्थान्तरकल्पना श्रोताको हो जाती है, वह कविको विवक्षित नहीं होती । अर्थात् कवि उन अनेक अर्थोंका वर्णन पहेलीमें नहीं करता, वह तो श्रोताको आभासित होती है; जब कि 'नामान्तरिता' में नाना अर्थ कविको विवक्षित होते हैं । प्रेमचन्द्र शर्मानि यहाँ 'नाम' से 'वस्तु' (अर्थ) ली है, केवल उसकी बोधक सञ्ज्ञा नहीं । इससे वर्णित पदार्थमें नाना (भिन्न) अर्थकी कल्पनासे भी 'नामान्तरिता' निष्पन्न हो जाती है ।¹ यह प्रहेलिका भी अर्थगूढा है । ११६वाँ श्लोक इसका उदाहरण है । (१०) निभृता—विवक्षित और अविवक्षित पदार्थोंके समान धर्मोंको छूने वाली पदावलीके प्रयोगसे अन्य अर्थको छुपाकर प्रस्तुत करने वाली उक्ति छुपानेके कारण 'निभृता' प्रहेलिका कहलाती है । आचार्य रत्नश्रीज्ञानने 'तुल्य-धर्म-स्पृशा गिरा' की दो व्याख्याएँ की हैं: (१) विवक्षित और अवि- वक्षित दोनोंमें वर्तमान होनेके कारण तुल्य=समान अर्थरूपी धर्मको, उसे निमित्त बनाकर प्रवृत्तिके कारण छूने वाले, (२) विवक्षित अर्थके समान धर्म १. रङ्गाचार्यरेड्डी, प्रभा : अत्राहू: प्रेमचन्द्रशर्माण:—लक्षणे 'नाम'-पदं च 'वस्तु'-परं, न तु 'सञ्ज्ञा' मात्रपरं बोध्यम् । तेन 'तरुण्याऽऽलिङ्गितः कण्ठे नितम्बस्थलमाश्रितः । गुरूणां सन्निधानेऽपि कः कूजति मुहुर्मुहुः ? ॥' अत्र 'सजल-कलश'-रूप-वस्तुनि वक्तव्ये प्रथमं नानाऽर्थकल्पनान् नामान्तरिता । एवं 'य एवादौ स एवान्ते मध्ये भवति मध्यमः । अस्यार्थं यो न जानाति, तन्मुखे तं ददाम्यहम् ॥' इत्यादावपि अत्र 'यवसः' प्रतिपाद्य इति । इस उदाहरणमें 'यः', में सर्वनामरूप नानार्थकी कल्पना होती है । उसके बाद नाम शब्दमें उसके घटक वर्णोंके आदि, अन्त और मध्य स्थानोंकी विचित्रतासे व्यामोह उत्पन्न किया गया है । अतः सङ्ख्याताके समान प्रहेलिकाका स्थान- कथनवैचित्र्यमूलक नूतन प्रकार है ।

३।१०३] ४. प्रहेलिकाके भेद १२६ (११) समान-शब्दोपन्यस्त-शब्द-पर्याय-साधिता ।¹ (१२) सम्मूढा नाम, या साक्षान्निर्दिष्टार्थापि मूढये ॥ १०३ ॥ (११) शब्दके उपकल्पित पर्यायसे सिद्ध की हुई समान-शब्दा होती है । (१२) सम्मूढा नामक वह होती है, जो सीधे-सीधे (अभिधासे) निर्दिष्ट अर्थ वाली होते हुए भी व्यामोह उत्पन्न करती है ।। १०३ ।। (गुण) वाले पदार्थको छूने वाले, शब्दके कारण वैसी विवक्षितके समान अन्य अर्थका अभिधान करने वाली वाणी जो प्रयुक्त होती है; (क) इस अर्थका पर्यवसान (निभृतता) विवक्षित अर्थमें होता है; अथवा (ख) तुल्यधर्मस्पर्शी वाणीके कारण निभृत (निगूढ गृहीतकी अपेक्षासे अन्य) अर्थ जिसमें अभिधेय है, वह इस प्रकारकी पहेली 'निभृता' कही जाती है ।² 'तुल्य-धर्म स्पृशा गिरा' अंशकी इन दोनों व्याख्याओंमें तत्त्वतः कोई अन्तर नहीं है : (१) प्रथम व्या- ख्यामें धर्मके द्वारा धर्मीका ग्रहण निष्पन्न होता है; (२) द्वितीयमें बहुव्रीहिसे धर्मीका सीधे ग्रहण होता है । 'निभृतान्यार्था' की दो व्याख्याओंमें विधि- मुखता और निषेधमुखताका अन्तर है : (क) 'निभृत' का अर्थ प्रथम व्याख्यामें 'व्यवस्थित', 'निष्ठित' है; (ख) द्वितीय व्याख्यामें 'अप्रकट', 'निगूढ' है । वादिजङ्घालदेवने 'निभृत-गोपित' ही कहा है । उदाहरण ११७वें श्लोकमें है ।। १०२ ।। (११) समान-शब्दा — जो उक्ति विवक्षित शब्दके उपन्यस्त = कल्पित (घुमा-फिराकर बनाये गये) पर्याय (समानार्थक) शब्दोंसे साधित (ग्रथित) होती है, वह 'समान-शब्दा' प्रहेलिका कहलाती है । यहाँ 'पर्याय' शब्द अपने १. रत्नश्री : 'उपन्यस्त-पर्यायार्थ-प्रसाधिता' इत्यपि पाठः । २. रत्नश्री : या दर्शितान्यार्था, निभृतो व्यवस्थितो वाऽन्यार्थोऽभिधेयं यस्या- मिति निभृतान्यार्थाऽभिधेयान्तरात् । कथम् ? (१) तुल्यं समानमुभयत्र वृत्तेः, धर्ममर्थरूपं, तन्निमित्तीकृत्य प्रवृत्तेः, स्पृशतीति तुल्यधर्मस्पृक् । (२) तुल्यो वा विवक्षितेनार्थेन सदृशो धर्मो गुणोऽस्येति तुल्यधर्माणमर्थं स्पृशतीति तुल्यधर्मस्पृक् । तया (क) तुल्यधर्मस्पृशा गिरा शब्देन हेतुना तादृशी गीः प्रयुज्यते, या विवक्षितसदृशमर्थान्तरमभिधाना, तत्रैव विव- क्षितेऽर्थे निष्ठाऽस्येति । (ख) यद्वा तुल्यधर्मस्पृशा गिरा कारणेन निभृतोऽ- प्रकटोऽन्यो गृहीतार्थापेक्षयाऽर्थोऽभिधेयं यस्यामिति योज्यम् । सा तादृशी प्रहेलिका निभृताऽऽख्यायते ।

१३० काव्यादर्श [ ३।१०३ रूढ ‘अल्पान्तरसमानार्थक प्रसिद्ध वाचक शब्द’ अर्थमें प्रयुक्त नहीं है । इस व्याख्यामें ‘उपन्यस्त’ शब्द ‘पर्याय’ का विशेषण है । वादीजीने ‘उपन्यस्त’ को ‘शब्द’ का विशेषण बनाकर अर्थ यों किया है : उपन्यस्त (प्रयुक्त) शब्दके पर्याय (समानार्थक रूढ शब्द) के द्वारा सम्पादित अर्थ वाली प्रहेलिका ‘समान-शब्दा’ कहलाती है ।¹ इस व्याख्यामें पर्याय शब्द उपन्यस्त शब्दसे कल्पित होता है, साक्षात् प्रयुक्त नहीं होता । रत्नश्रीज्ञानकी व्याख्यामें कल्पना- बाहुल्य है । संस्कृतमें कल्पित पर्यायोंका प्रयोग आम बात है । ‘हस्तिनापुर’ को ‘नागसाह्वयपुर’ कहना, ‘भ्रमर’ को ‘द्विरेफ’ कहना एवं ‘चक्रवाक’ को ‘रथाङ्गनामा’ कहना, इसी प्रकारका कल्पित पर्याय है । पर ये सब अभि- व्यक्तियाँ दुरूह न होनेसे व्यामोहकारी नहीं हैं, क्योंकि किसी स्तरपर इनमें अर्थान्तर-समानार्थता है । ‘प्रकृष्ट बालों वाला’ कहना ‘प्रवाल’ (मूँगे) का पर्याय उसी प्रकार नहीं है, जैसे ‘दिल लेने वाली’ कहना ‘दिल्ली’ का सही पर्याय नहीं है, कल्पित पर्याय है । ऐसे कल्पित पर्यायोंसे साधित उक्ति श्रोताको अवश्य उलझनमें डालती है । अतः वह ‘प्रहेलिका’ नामक चित्रालङ्कार है । ‘समान शब्द’ का अर्थ ‘पर्याय’ होता है । इस प्रकारके कल्पित समान शब्दके प्रयोगके कारण यह प्रहेलिकाप्रकार ‘समान-शब्दा’ कहलाता है । रत्नश्रीमें लक्षणांशका पाठान्तर उपन्यस्त-पर्यायार्थ-प्रसाधिता’ बताया है : उपन्यस्त अर्थके अनुगम (प्रतीति) से कल्पित, उस अर्थको प्रकाशित करनेके कारण पर्यायरूप शब्दान्तरके अर्थमें प्रसाधित प्रहेलिका ‘समानशब्दा कहलाती है ।² अर्थको छुपाकर कहनेके कारण यह अर्थ-गूढा है । उदाहरणार्थ ११८वाँ श्लोक देखें । (१२) सम्मूढा — सीधे-सीधे अभिधासे अर्थका निर्देश (कथन) की हुई होते हुए भी जो उक्ति अभिव्यक्तिकी अस्पष्टताके कारण श्रोताको भ्रममें डालती है, वह ‘सम्मूढा कहलाती है । साक्षात् निर्देश न होनेपर व्यामोह १. रत्नश्री : उपन्यस्तेन = तदर्थानुसारेण कल्पितेन, शब्दस्य विवक्षितत्वा- वाचकत्वेन प्रसिद्धस्य तदर्थप्रकाशनात् पर्यायेण = शब्दान्तरेण साधिता । वादिटीका : सा समानशब्दा नाम यस्यामुपन्यस्तो यः शब्दः, तस्य यः पर्यायः, तेन साधितः = सम्पादितोऽर्थः । २. रत्नश्री : ‘उपन्यस्त-पर्यायार्थ-प्रसाधिता’ इत्यपि पाठः । तत्र उपन्यस्तार्था- नुगमकल्पितस्य, तदर्थ-प्रकाशनात् पर्यायस्य = शब्दान्तरस्य, अर्थे प्रसाधिता = ‘उपन्यस्तपर्यायार्थ-प्रसाधिता’ इति व्याख्येयम् ।

३।१०४] ४. प्रहेलिकाके भेदोंके लक्षण १३१ (१३) योग-मालाऽऽत्मकं नाम यस्याः, सा पारिहारिकी । (१४) एकच्छन्नाऽऽश्रितं व्यज्य यस्यामाश्रयगोपनम् ॥ १०४ ॥ (१३) जिस (पहेली) का नाम (सञ्ज्ञापद) सम्बन्धोंकी मालाके रूपमें होता है, वह पारिहारिकी (प्रसिद्ध नामका परिहार करके सम्बन्धोंके अभि- धानसे निष्पन्न) होती है । (१४) एकच्छन्ना वह है, जिसमें आधेयको व्यक्त करके आधारको छुपाया जाता है ॥ १०४ ॥ स्वाभाविक है, पर निर्देश करनेपर व्यामोह होना उक्तिकी विशिष्टता है । इसी विशेषता (अतिशय) को आचार्यने ‘अपि’से कहा है ।१ व्यामोहका कारण अस्पष्ट अभिधान है । अतः यह भेद अर्थगूढ है । उदाहरण ११६वें श्लोकमें है ॥ १०३ ॥ (१३) पारिहारिकी—जिस प्रहेलिकाके सञ्ज्ञा शब्द सम्बन्धोंकी मालाके रूपमें हों, वह प्रहेलिका प्रसिद्ध सञ्ज्ञा पदका परिहार करनेके कारण ‘पारि- हारिकी’ कहलाती है । इस प्रहेलिकामें वस्तुका अभिधान सीधे स्पष्ट वाचक शब्दोंसे न करके, वाचकोंका प्रयोग बचाते हुए, सम्बन्धोंके अभिधानसे परम्परया किया जाता है । अतः यह भी अर्थ-गूढा है । उदाहरण १२०वें श्लोकमें है । (१४) एकच्छन्ना—आश्रयाश्रयिभाव सम्बन्ध द्विष्ठ होता है । जब आश्रितके धर्म (द्रव्य, गुण और क्रिया) का तो अभिधान किया जाये, किन्तु इनके आश्रय (आधार धर्मी) को छुपाया जाये,२ तब एकको छुपानेके कारण ‘एकच्छन्ना’ प्रहेलिकाभेद निष्पन्न होता हैं । यह आश्रयरूप अर्थके निगूहनके कारण अर्थगूढा है । धर्मोंके कथनसे धर्मीकी कल्पनामें कुछ चमत्कार होता है; आश्रयको कहनेसे धर्म स्वतः उक्त हो जाते हैं; अतः व्यामोहकत्व आश्रय- गोपनमें ही है, आश्रितगोपनमें नहीं । इस भेदको ‘एकच्छन्ना’ कहना तो तभी उचित होता, जब दो सम्बन्धियों में किसीके भी गोपनसे व्यामोह होता । इसलिये इसे ‘धर्मिच्छन्ना’ कहना अधिक उचित है । सम्भवतः, अगले ‘उभयच्छन्ना’ भेदमें भेदकके रूपमें सङ्- ख्या (उभय) का प्रयोग विवक्षित होनेसे आचार्यने इस भेदमें भी उसे ही भेदक मानकर सञ्ज्ञा बनाई है । उदाहरण १२१वें श्लोकमें देंगे ॥ १०४ ॥ १. रत्नश्री : अतिशये ‘अपि’-शब्दः । २. वादिटीका : एकच्छन्ना नाम सा, यस्यामाश्रितं नाम धर्म द्रव्य-गुण-कर्म- लक्षणमभिव्यज्य प्रकाश्य तद्धर्माधारस्याश्रयस्य धर्मिणो गोपनम् ।

१३२ काव्यादर्श [३।१०५-१०६ (१५) सा भवेदुभयच्छन्ना, यस्यामुभय-गोपनम् । (१६) सङ्कीर्णा नाम सा, यस्यां नाना-लक्षण सङ्करः ॥ १०५ ॥ एताः षोडश निर्दिष्टाः पूर्वाचार्यैः प्रहेलिकाः । दुष्ट-प्रहेलिकाश्चान्यास्तैरेधोताश्चतुर्दश ॥ १०६ ॥ (१५) वह (पहेली) उभयच्छन्ना है, जिसमें दोनों (आश्रित और आश्रय) को छुपाया जाता है । (१६) सङ्कीर्णा नामक वह होती है, जिसमें एकाधिक पहेलियोंके लक्षणों का सङ्कर (उपकार्योपकारक भावसे तथा तुल्यबलतासे) होता है ॥ १०५ ॥ पिछले आचार्योंने ये सोलह पहेलियां बताई हैं । उन्होंने चौदह दोषयुक्त पहेलियाँ भी पढ़ी (दी) हैं ॥ १०६ ॥ (१५) उभयच्छन्ना—जिस उक्तिमें आश्रित धर्म द्रव्य, गुण और क्रियाका भी गोपन किया जाये, और आश्रयका भी, वहाँ दोनोंके गोपनके कारण 'उभयच्छन्ना' प्रहेलिका होती है । यह भी अर्थगूढा है । १२२वें श्लोकमें उदाहरण है । (१६) सङ्कीर्णा—जिस उक्तिमें नाना (अलग-अलग) लक्षणों (प्रहेलिका- घटक) तत्त्वोंका सङ्कर (सम्मिश्रण) होता है, वह पहेली 'सङ्कीर्णा' होती है । आचार्यने 'सङ्कर' के अर्थमें 'संसृष्टि' शब्दका प्रयोग (२।३५७-३५८) में किया है । उनके मतमें ये दोनों पर्याय हैं । अतः यहाँ (i) अङ्गाङ्गि- भाव संसृष्टि और (ii) समकक्षभाव संसृष्टि दोनों अभीष्ट है । अङ्गाङ्गि- भावसंसृष्टि समकक्ष संसृष्टिकी अपेक्षा दुष्कर होती है । आचार्यने १२३वें श्लोकमें सङ्कीर्णाका जो उदाहरण दिया है, वहाँ दोनों प्रकारकी प्रहेलिकाएँ अङ्गाङ्गिभावसम्बन्धसे परस्पर सङ्कीर्ण हैं । पूर्वार्धोक्त नामान्तरिता अङ्ग है और उत्तरार्धोक्त वञ्चिता वाक्यपर्यवसायी होनेसे मुख्य है । इसकी शब्द- गूढता या अर्थ-गूढता सङ्करकी विषय प्रहेलिकाओंके स्वरूपपर निर्भर करती है ॥ १०५ ॥ ४. प्रहेलिकाओंका उपसंहार : प्रहेलिकाओंके सोलह भेदोंके लक्षण बतानेके बाद आचार्यने इनका उपसंहार अगले १०६वें श्लोकमें किया है । दण्डीका कहना है कि ये १६ प्रकारकी प्रहेलिकायें पिछले आचार्यों ने बताई हैं । भामहने पूर्वाचार्य रामशर्मा तथा उनके ग्रन्थ 'अच्युतोत्तर' का नाम दिया है । पर भामहने प्रहेलिकाको व्याख्यागम्य बनाने वाला यमक-

३।१०७ ] ४. प्रहेलिकाओंका उपसंहार १३३ दोषानपरिसङ्ख्येयान् मन्यमाना वयं पुनः । साध्वीरेवाभिधास्यामस्ता दुष्टा, यास्त्वलक्षणाः ॥ १०७ ॥ किन्तु दोषोंको अनादरणीय मानते हुए हम निर्दोष (पहेलियाँ) ही कहेंगे । दोषयुक्त वे होती हैं, जो तो उनके लक्षणसे रहित हैं ॥ १०७ ॥ व्यपदेशित्वका जो तत्त्व आवश्यक बताया है, वह पूर्वाचार्यानुसारिणी इन षोडशविध प्रहेलिकाओंमें तनिक भी नहीं है । इस आधारपर यह कहना कदाचित् अनुचित न होगा कि दण्डीकी प्रहेलिकाओंके निरूपक पूर्वाचार्योंमें रामशर्मा सम्मिलित नहीं हैं । दण्डीने अवन्तिसुन्दरीकथामें अपने समयके बुधों में केरलके एक रामशर्माका उल्लेख किया है । यदि अच्युतोत्तरके लेखक यही रामशर्मा हैं, तो हो सकता है कि काव्यादर्शके प्रणयन तक उसकी रचना न हो पाई हो । इसी कारण दण्डीने उनके चिन्तनका उल्लेख यहाँ न करके अपने समयमें चर्चामें आ चुकी निर्दोष और सदोष पहेलियोंका उल्लेख किया है । आचार्य रत्नश्रीज्ञानका 'पूर्वाचार्यै रामशर्मादिभिः' कथन भामहके उल्लेख पर, अथवा अन्य सुनी-सुनाई बातोंपर, आधारित प्रतीत होता है । उन्हीं पूर्वाचार्योंने इनके अतिरिक्त १४ दोषयुक्त पहेलियाँ बताई हैं ॥ १०६ ॥ प्रहेलिकाओंको दुष्ट बनाने वाले ये दोष किस प्रकारके हैं, यह सङ्केत न आचार्य दण्डीने किया है, और न किसी अन्य आचार्यने ही किया है । आचार्य दण्डीने १०७वें श्लोकमें मात्र इतना कहा है कि जिन पहेलियोंपर उनके लक्षण पूरी तरह नहीं घटते, वे दुष्ट पहेलियाँ हैं । पदसन्धिके कारण सम्पन्न (१) समागता नामक पहेलीमें दोषकी सम्भावना नहीं है । अतः वह तो शुद्ध ही रहेगी । शेष चौदह असङ्कीर्ण प्रहेलिकाओंकी प्रस्तुतिमें किसी लक्षणगत त्रुटिके कारण वे चौदह प्रहेलिकायें दोषयुक्त होंगी । रत्नश्रीज्ञानने आचार्यके इस कथनको यों प्रस्तुत किया है : उन (प्रहेलिकाओं) के लक्षणके विरोधके १. रत्नश्री ३।१०६ : तल्लक्षणविरोधाद् दुष्टा हेयाश्च ताः प्रहेलिकाश्चेति दुष्टप्रहेलिकाः । ००० अत एव समागतादिविलक्षणत्वादन्‍याश्चतुर्दश तैः पूर्वाचार्यैरधीता = निर्दिष्टा इति । १०७ : 'कथं तर्हि दुष्टप्रहेलिका ज्ञायन्ते, यथा वर्ज्येरन् ? न हि दुष्टतयाऽज्ञातानां परिहारः सम्भवति ।' इत्याशङ्क्य तत्प्रत्युपायमाह - 'याः = प्रहेलिकाः, 'तु'-शब्दोऽर्थान्तरविव- क्षायाम्, यथोक्तलक्षणविरहान्न विद्यते लक्षणमासामित्यलक्षणाः, ताः स्वयमेव दुष्टा ज्ञायन्ते; प्रतिनियतलक्षणव्युत्पत्तेरतल्लक्षणानां तदाभासता- प्रतिपत्तेः । किं तासां प्रपञ्चप्रयासेन ?' इति ।

१३४ काव्यादर्श [३।१०७ कारण वे दोषयुक्त और हेय हो जाती हैं। दोषयुक्त होनेके कारण ये ‘समागता’ आदिसे विलक्षण (भिन्न प्रकारकी) हैं। उनके निश्चित लक्षणके न होनेके कारण ये प्रहेलिकाभास हैं, प्रहेलिकायें नहीं । अतः इनका विस्तार बतानेका प्रयास आवश्यक है । इस व्याख्यामें ‘अलक्षणाः’ में ‘नञ्’ का अर्थ ‘विरोध’ रत्नश्रीज्ञानको अभिप्रेत है । किन्तु वादीजीने ‘नञ्’ को ‘अभाव’ अर्थ में बताया है : अलक्षणाः = लक्षणवर्जिताः । रङ्गाचार्य रेड्डीजीने भी इसी प्रकार ‘नञ्’ को ‘शून्य’ अर्थमें बताया है ।१ पर यदि ये प्रहेलिकाके लक्षणसे ‘वर्जित’ या ‘शून्य’ ही हैं, तो प्रहेलिका ही कैसे हैं ? जब प्रहेलिकायें ही नहीं हैं, तो दुष्ट कैसे होंगीं ? इसलिये रत्नश्रीज्ञानकी व्याख्या ही उचित है । अतः निष्कर्ष यही है कि जिस भी प्रकारकी पहेलीका लक्षण अव्याप्ति, अतिव्याप्ति या असम्भवमें से अन्यतम दोषसे युक्त होगा, वह भले प्रहेलिकाका पूरा आनन्द न दे सके, प्रहेलिकाका आभास अवश्य देगी । अतः ऐसी पहेली ‘दुष्ट’ पहेली कहलाती है । (क) पहेलियोंके ये दोष पहेलियोंको हेय बना देनेके कारण कुछ गिने जानेके, आदर दिये जानेके, योग्य नहीं हैं । (ख) या ‘वे केवल १४ ही हैं, यह नहीं कहा जा सकता । पूर्वाचार्योने १४ बताये हैं । हमारी समझसे वे अनगिनत हैं । इसलिये उनके प्रपञ्चमें पड़ना अनावश्यक है । अतः आचार्य दण्डीका कथन है कि वे साधु (लक्षणसम्पन्न) पहेलियोंके ही उदाहरण देंगे ।२ परन्तु आचार्य यदि प्रहेलिकाओंके दोषोंके कुछ प्रकारोंका निरूपण कर देते, तो अच्छा तो होता ही, दोषप्रकरणकी समुचित प्रस्तावना भी इससे हो जाती । उन्होंने काव्यशरीरके साधु स्वरूपका निरूपण उसके समस्त शोभाकारक १. प्रभा ३।१०७ : ‘यास्त्वलक्षणाः’—समागतादिषोडश प्रहेलिका लक्षण- शून्याः, ता दुष्टा बोद्धव्याः । रेड्डीजीने इससे पूर्व १०६ की व्याख्यामें च्युताक्षरादिको ‘दुष्ट सदोष प्रहेलिका’ कहा है । पर यह रुद्रटसे प्रारब्ध समूची परम्पराके विरुद्ध है । च्युताक्षरादि चित्रालङ्कारके अन्तर्गत निर्दोष अभिधान-प्रकार हैं । विशेषार्थ आगे व्याख्या देखें । २. रत्नश्री ३।१०७ : (क) दोषाः प्रहेलिकासम्भविनो हेयाः, प्रहेलिका-दोषा अपरिसङ्ख्येयाः । न लक्षणतो न लक्ष्यतो गुणवदादरेणाप्रतिपाद्यान् मन्यमानाः पश्यन्तः साध्वीरेव प्रहेलिका अभिधास्यामः ।...यद्वा (ख) प्रहेलिकादोषा अपरापरदोषसम्भवेन ‘चतुर्दश’ इति इयत्तयाऽपरि- सङ्ख्येयाः । ततश्चातिप्रसङ्गान्नोच्यन्ते । इत्यभिप्रायेणोक्तं ‘दोषान्०’ इत्यादि ।

३१[०७] ४. प्रहेलिकाओंका इतिहास १३५ धर्मोंको बताकर करनेके बाद अगले प्रकरणमें काव्यशरीरके दोषोंका निरूपण किया है, तो जैसे इससे अध्येताका कल्याण ही हुआ है, वैसे ही, प्रहेलिकाओंके साधु प्रकारके निरूपणके पश्चात् वे दुष्ट प्रहेलिकाओंका भी दिङ्मात्र प्रदर्शित कर देते, तो अध्येताका उपकार ही होता । लगता है कि आचार्य दण्डी यहाँ परिश्रमसे कतरा गये । ४. प्रहेलिकाओंका इतिहास : आचार्य दण्डीके अनुसार प्रहेलिकाका उपयोग परव्यामोहन है; वह शब्दके द्वारा सम्भव नहीं है, अपितु अर्थसे ही सम्भव है । शब्दकी गूढता भी अर्थको व्यामोहकारी बनायेगी । यही कारण है कि आचार्यने पदसन्धिसे सम्पन्न (१) समागताको भी 'गूढार्था' बताया है । इसलिये प्रहेलिकाएँ आचार्य दण्डीके मतमें अर्थालङ्कार हैं । शब्दालङ्कार यमक आदिके प्रकरणमें तो दुष्कर चित्र अलङ्कार होनेसे दुष्कर चित्रमार्ग प्रकरणमें दी हैं, शब्दालङ्कार होनेके कारण नहीं । परवर्ती आचार्योंमें उद्भट तो यमकपर ही मौन हैं । वामन भी प्रहे- लिकाओंके विषयमें मौन हैं । इन दोनों आचार्योंने दुष्कर चित्रमार्गका उल्लेख नहीं किया है । आचार्य रुद्रटने इस प्रसङ्गमें चित्रमार्गके विषयको आचार्य दण्डीसे आगे बढ़ाया है : उन्होंने इसके (१) मात्राच्युतक, (२) बिन्दुच्युतक, (३) प्रहेलिका, (४) कारकगूढ, (५) क्रियागूढ, (६) प्रश्नोत्तर भेद बताकर 'आदि' शब्दसे अन्य चित्रालङ्कारोंकी दिशा उद्घाटित रखी है । इसके अतिरिक्त दण्डिप्रोक्त परव्यामोहनको रुद्रटने उतना महत्त्व नहीं दिया, अपितु दण्डी द्वारा बताये एक अन्य उपयोग क्रीडापर ही बल दिया है । उनकी दृष्टि में कदाचित् परव्यामोहनका साध्य होना उचित नहीं है । अपितु उस साधन होना चाहिये क्रीडाका, मनोविनोदका । यहाँ भी यह बात ध्यान देने योग्य है कि रुद्रटने भी अर्थके कारण चमत्कार उत्पन्न करने वाले इन अलङ्कारोंको चित्रमार्गका विषय होनेसे ही यहाँ दिया है, शब्दालङ्कार होनेसे नहीं । काव्यालङ्कारके पञ्चम अध्यायका विषय चित्रनिरूपण है ।१ चित्रमार्गके अन्तर्गत कुछ शब्दालङ्कार हैं । जैसे चक्रबन्धसे लेकर सर्वतोभद्रबन्ध तकके चित्रबन्ध (५।२-२३) । (१-२) मात्राच्युतक आदिमें मात्रा (स्वर) और बिन्दु (अनुस्वार, नासिक्य वर्ण) के च्युत होनेसे अर्थभेद हो जाता है, १. भङ्ग्यन्तरकृत-तत्क्रम-वर्ण-निमित्तानि वस्तुरूपाणि । साङ्गानि विचित्राणि च रच्यन्ते यत्र, तच्चित्रम् ।। काव्यालङ्कार ५।१ इत्थं स्थितस्यास्य दिशं निशम्य शब्दार्थवित् क्षोदित चित्रवृत्तः । आलोच्य लक्ष्यं च महाकवीनां चित्रं विचित्रं सुकविर्विदध्यात् ।। ३३

१३६ काव्यादर्श [३।१०७ जिससे श्रोता व्यामूढ हो जाता है । इन दोनों चित्रालङ्कारोंमें अर्थभेदका निमित्त स्वर एवम् अनुस्वार शब्द (वर्ण) हैं । अतः इन्हें शब्दार्थालङ्कार कहना उचित है । (३) रुद्रटने प्रहेलिकाके दो भेद बताये हैं : (क) पदारूढ होनेसे स्पष्ट एवं निगूढ होनेसे प्रच्छन्न अर्थ वाली, (ख) अव्याहृतार्था (अनु- क्त अर्थ वाली) ।¹ इस विवरणसे स्पष्ट है कि यह अर्थालङ्कार है । व्या- मोहकारी होनेसे चित्र (विस्मयजनक) है । रुद्रटने चित्रबन्धोंकी दुष्कर, सुकरके रूपमें कल्पना नहीं की है । महाराज भोजने प्रहेलिकाके स्वरूपनिरूपणमें दण्डीकी दृष्टि न अपनाकर रुद्रटके निरूपणको व्यवस्थित किया है : उन्होंने (१) प्रहेलिकाका प्रश्नरूपमें होना आवश्यक माना; (२) रुद्रटके मात्रा-बिन्दुच्युतकोंका समाहार प्रहेलिका में किया; (३) मात्रा और बिन्दुको अक्षरमात्र (वर्णमात्र) का उपलक्षक माना; (४) च्युतिके विपरीत वर्णदानका नवीन समावेश किया; (५) अक्षरोंका आकारविशेष (मुष्टि) के रूपमें विन्यास बताकर मुरजादि बन्धका प्रहेलिकामें सम्मिश्रण किया; (६) केवल अनुस्वार, विसर्ग आदिका विन्यास करके तथा स्वरव्यञ्जनोंका प्रयोग न करके निष्पन्न बिन्दुमती प्रहेलिकाकी उद्भावना की । ये पाँचों प्रकारकी प्रहेलिकाएँ शब्दमूलक होनेसे शब्दालङ्कार हैं। (७) अर्थके कारण व्यामोह वाली अर्थवती (छठी) प्रहेलिकाके भेदोपभेद भोजने नहीं दिये हैं।² दण्डीकी प्रहेलिकाएँ (१) समागता, (३) व्युत्क्रान्ता जैसी कुछेकको छोड़कर प्रायेण अर्थवती ही हैं। इससे यह स्पष्ट है कि भोजने दण्डी की दिशामें चिन्तन न करके रुद्रटकी दृष्टिको आधार बनाकर उसे अपनी स्वतन्त्र दृष्टिसे व्यवस्थित करके प्रहेलिकाको नये रूपमें देखा है । भोजने रुद्रटके क्रिया-कारकगूढ भेदोंको चार और प्रकारोंका उपलक्षक मानकर यों प्रस्तुत किया है : (१) क्रिया, (२) कारक, (३) शेष सम्बन्ध, (४) पद, (५) अभिप्राय, (६) वस्तु (द्रव्य) के गोपनसे छह प्रकारके गूढ- बन्ध निष्पन्न होते हैं ।³ गूढबन्धोंकी प्रथम उद्भावना रुद्रटने ही की है । पर रुद्रटके मतमें ये चित्रबन्धके अन्तर्गत आते हैं । जबकि भोजने इनका तथा १. मात्रा-बिन्दु-च्यवनादन्यार्थत्वेन तच्च्युते नाम । स्पष्ट-प्रच्छन्नार्था प्रहेलिकाऽव्याहृतार्था च ॥ काव्याल० ५।२५ २. प्रहेलिका = सकृत्प्रश्नः साऽपि षोढा च्युताक्षरा । दत्ताक्षरोभयं, मुष्टिर्बिन्दुमत्यर्थवत्यपि ॥ सरस्वती० २।१३३ ३. क्रियाकारकसम्बन्धे पदाभिप्रायवस्तुभिः । गोपितैः षड्विधं प्राहुर्गूढं गूढार्थवेदिनः ॥ सरस्वती० २।१३५

३।१०७ ] ४. प्रहेलिकाओंका इतिहास १३७ प्रहेलिकाओंका निरूपण चित्र बन्धोंके प्रकरणकी समाप्तिके बाद किया है । १ भोजने दण्डीकी (१) समागता पहेलीको पहेली न मानकर शेषसम्बन्धगूढ- बन्ध अलङ्कार माना है । २ तत्त्वतः यदि देखा जाये, तो इन षड्विध गूढबन्धों का प्रयोजन परव्यामोहन तथा क्रीडा ही है । अतः ये 'प्रहेलिका' कहलानेके अधिकारी हैं । पर दण्डिद्वारा प्रस्तुत पूर्वाचार्योंके प्रहेलिकालक्षणोंकी आधार- भूत दृष्टिसे इन गूढबन्धोंकी दृष्टिमें अन्तर है । पूर्वाचार्योंकी १५ प्रहेलिकाओं की आधारभूत दृष्टिको अन्य दृष्टिका उपलक्षक यदि मान लिया जाये, तो ये भेद अर्थवती (गूढार्था) प्रहेलिकाके भेद माने जा सकते हैं । तथा इन्हें दण्डी की १५ प्रहेलिकाओंसे अतिरिक्त प्रहेलिकाएँ माना जा सकता है । कलिकालसर्वज्ञ आचार्य हेमचन्द्रने (१) दण्डीके तृतीय परिच्छेदके प्रहेलि- काविषयोंको दण्डीकी दृष्टिके अनुकरणसे सादृश्य और आश्चर्यहेतुताके कारण चित्रालङ्कारमें तो माना ही है, (२) रुद्रटका अनुकरण करके च्युत, गूढका समावेश स्पष्टतः चित्रमें किया (३) और भोजका समन्वय करनेको प्रश्नोत्तर, प्रहेलिका और दुर्वाचक (दुःश्रव)'का भी चित्रमें ही समावेश किया है । ४ किन्तु १. दुष्करत्वात् कठोरत्वाद्, दुर्बोधत्वाद् विनाऽवधेः । दिङ्मात्रं दर्शितं चित्रे शेषमूह्यं महात्मभिः ।। सरस्वती० २।१३० २. सरस्वती० २।३६८ : सम्बन्धगूढं यथा—'न मयागोरसा०' (काव्यादर्श ३।१०८) । अत्र 'न मे आगोरसाभिज्ञ' चेत' इति सम्बन्धपदस्य 'मया' इति तृतीयाभ्रान्त्या गोपितत्वादिदं सम्बन्धगूढम् । ३. कामसूत्र १।३।१६ पर जयमङ्गलने ३० दुर्वाचकयोगा कलाकी व्याख्यामें काव्यादर्शके उल्लेखसे एक श्लोक उद्धृत करके उसकी व्याख्या की है । पर दण्डीके काव्यादर्शमें न दुर्वाचक बन्ध उपलब्ध है, और न जयमङ्गलोद्धृत- व्याख्यात श्लोक । इसी प्रकार ३३ काव्यसमस्यापूरण कलाकी व्याख्यामें भी काव्यादर्शके नामसे एक श्लोक उद्धृत करके उसकी व्याख्या की है । पर काव्यादर्शके उपलब्ध भागमें न समस्यापूर्ति उपलब्ध है और न यह उदाहरण । जयमङ्गलके कथनसे अनुमान किया जा सकता है कि काव्या- दर्शके अब अनुपलब्ध कलापरिच्छेद (३।१७१ में उक्त) में ये दोनों कलायें रही होंगी । ४. काव्यानुशासन, ५म अध्याय, पृष्ठ २५७ : स्वर-व्यञ्जन-स्थान-गत्याकार- नियम-च्युत-गूढादि चित्रम् । स्वरादीनां नियमः, च्युतगूढादिश्च चित्रं, सादृश्यादाश्चर्यहेतुत्वाद् वा चित्रम् । पृष्ठ २७२ : 'गूढादि' इत्यादिपदेन प्रश्नोत्तर-प्रहेलिका-दुर्वाचकादि-परिग्रहः ।

१३८ काव्यादर्श [ ३।१०८ (१) न मया गो-रसाभिज्ञं चेतः कस्मात् प्रकुप्यसि ? अस्थान-रुदितैरेतैरैरलमालोहितेक्षणे ॥ १०८ ॥ (१) हे कुछ-कुछ रक्तिम नयनों वाली (प्रिये), नहीं मैंने गोरस (दूध, दही, छाछ आदि) से परिचित मन (धारण किया है) । क्यों इतनी कुपित हो रही हो ? यह बिना बातके रोना-धोना मत करो ॥ १०८ ॥ हेमचन्द्रने प्रहेलिकाओंको च्युत, गूढ आदिसे पृथक् रखकर प्राचीन परम्पराका अनुगमन किया है, आचार्य भोजका नहीं ॥ १०७ ॥ (१) समागता प्रहेलिका इस उक्ति के यथाधृत पाठको 'मया गोरसाभिज्ञं' के रूपमें लेनेसे उपर्युक्त असङ्गत अर्थकी प्रतीतिके कारण श्रोता उलझनमें पड़ जाता है कि मानवती प्रिया और उसके सम्मुख मनुहार करते दीन खड़े प्रियके बीच ये 'गो-रस' (दूध, दही आदि) कहाँसे आ गया ? सिर खुजाकर सोचनेपर यदि उसे व्याकरणका अच्छा अभ्यास है, तो 'मे + आगो-रसाभिज्ञं' सन्धिविच्छेद समझ आ जायेगा कि अयादिसन्धिसे प्राप्त यकारका शाकल्यसम्मत लोप¹ कविने नहीं किया है । तब उसके ज्ञानचक्षु उन्मीलित होंगे : मेरा चित्त अपराध (अन्य स्त्रीगमन आदि) करनेमें आनन्दकी अनुभूतिका अभिज्ञ नहीं है, अर्थात् मैंने कोई अपराध नहीं किया है; तब प्रिये तुम काहे को नाराज़ हुईं ? इस प्रकार यहाँ 'मे + आगो०' पदोंमें सन्धि (शब्दधर्म) के कारण पदान्तरकी तथा उसके द्वारा अविवक्षित अर्थकी प्रतीति होनेसे श्रोताको व्या- मोह हो जाता है । दो पदोंके समागम (सन्धानके) कारण यह सब होनेसे यह 'समागता' प्रहेलिका है । यह शब्दके गोपनसे निष्पन्न होनेसे शब्द-गूढा है । रचनामें असुकर तथा अवबोधमें दुर्बोध होनेसे यह दुष्कर है और वैचित्र्ययुक्त होनेसे चित्र है । सन्धियुक्त शब्दप्रयोगसे इस शोभाके उत्पन्न होनेसे यह शब्दालङ्कार है । भोजके मतमें इस प्रकारकी सन्धिसे शेष सम्बन्ध ('मे') का गोपन हो जाता है और कर्तृ सम्बन्ध 'मया' (कर्तरि तृतीयान्त) की भ्रान्ति होती है । अतः यहाँ सम्बन्धगूढ बन्ध है । भोजके अनुसार यह प्रहेलिका नहीं है । यह सम्बन्ध अर्थके रूपमें है । अतः दण्डीने इसे 'पदसन्धिके कारण गूढार्था' कहा है । व्यामोहका कारण असाधारण (अव्यवहित पूर्ववर्ती) कारण अर्थका गोपन है । उसका कारण पदसन्धिसे सम्बन्ध अर्थका गोपन या सम्बन्धिपदका गोपन है । इस प्रकार पदसन्धि प्रहेलिकाका आधार है ॥ १०८ ॥ १. अष्टाध्यायी ६।१।७८ : एचोऽयवायावः । ८।३।१९ : लोपः शाकल्यस्य ।

३।१०६-११०] ४. प्रहेलिकाके भेदोंके उदाहरण १३६ (२) कुब्जामासेवमानस्य यथा ते वर्धते रतिः । नैवं निर्विशतो नारीरमरस्त्री-विडम्बिनीः ॥ १०६ ॥ (३) दण्डे चुम्बति पद्मिन्या हंसः कर्कश-कण्टके । मुखं वल्गु-रवं कुर्वंस्तुण्डेनाङ्गानि घट्टयन् ॥ ११० ॥ (२) कुब्जा (कुबड़ी) का भोग करते हुए तुम्हारा आनन्द जैसे बढ़ता है, वैसे देवताओंकी स्त्रियोंकी विडम्बना करने वाली (अप्सराओंके समान सुन्दर) रमणियोंका भोग करते हुए नहीं (बढ़ता) ॥ १०६ ॥ (३) नालमें चूम रहा पद्मिनीके हंस कठोर काँटों वालेमें, मुखको सुन्दर बोली वाला करता हुआ, चोंचसे अङ्गोंको टकराता हुआ ॥ ११० ॥ (२) वञ्चिता—यहाँ 'कुब्जा' शब्दके प्रयोगसे आपाततः असङ्गत अर्थ प्रतीत होता है : अप्सरा जैसी सुन्दर रमणी तो अच्छी न लगे, और कुबड़ी मन मोहे, यह भी कोई बात है ! इससे शङ्का होती है कि 'कुब्जा' शब्द अपने प्रसिद्ध अर्थ (कुबड़ी) से भिन्न किसी अर्थमें होगा । तब ध्यान जाता है कि कहीं 'कान्यकुब्ज' अपरनाम 'महोदया' नामक नगरीको, अथवा कान्यकुब्जकी किसी स्त्रीको, ही सत्यभामाको सत्या, भामा¹ आदि कहनेके समान पूर्वपद- लोप करके 'कुब्जा' शब्दसे तो नहीं कहा है : कान्यकुब्ज नगरी (राजधानी) अथवा कान्यकुब्ज देशकी स्त्रीका उपभोग करते हुए तुम्हें जैसे निरन्तर वर्ध- मान आनन्द मिलता है, वैसे अप्सरासदृश सुन्दर रमणियोंके भोगसे नहीं मिलता । राजाकी पत्नीके रूपमें पृथ्वी अथवा राजधानीकी कल्पना कवि- समयमें प्रसिद्ध है । इस प्रयोगमें कुब्जासे विवक्षित नगरीका अथवा कान्यकुब्ज की स्त्रीका अन्य नगरियोंसे या स्त्रियोंसे अतिशय व्यक्त होता है । यहाँ 'कुबड़ी' अर्थमें प्रसिद्ध 'कुब्जा' शब्दका प्रयोग विवक्षित 'कान्य- कुब्जा' (कन्नोज, अथवा कन्नौजिया स्त्री) के अर्थमें करके श्रोताको छला गया है, भुलावेमें डाला गया है । अविवक्षितार्थक 'कुब्जा' शब्दसे विवक्षितार्थ 'कान्यकुब्जा' को छुपानेके कारण यह अर्थगूढ प्रयोग व्यामोहकारी हो गया है ॥ १०६ ॥ (३) व्युत्क्रान्ता—प्रकृत (११०वें) श्लोकमें विवक्षित अन्वय है : वल्गु- रवं कुर्वन्, कर्कश-कण्टके दण्डे अङ्गानि घट्टयन्, हंसः तुण्डेन पद्मिन्या मुखं चुम्बति । पर श्लोकमें प्रदत्त पदविन्याससे व्यामोहकारी और ही अर्थ प्रकट १. सिद्धान्तकौमुदी, स्वाथिकाः, वार्तिक : विनाऽपि प्रत्ययं पूर्वोत्तरपदयोर्वा लोपो वाच्यः । देवदत्तो, दत्तो, देवः । सत्यभामा, भामा, सत्या ।

१४० काव्यादर्श [३।१११ (४) खातयः कनि काले ते स्फातयः स्फीत१-वल्गवः । चन्द्रे साक्षाद् भवन्त्यत्र वायवो२ मम चारिणः ॥ १११ ॥ (४) हे कन्ये (कनि), तुम्हारे आह्लादकारी चरणमें (काले) शोभायमान, मनोहरतामे बजते हुए अथवा चञ्चल घुँघरू (खातयः) अनुभवमें आ रहे हैं । इस स्थितिमें मेरी हवा अस्थिर हो (खिसक) रही है ॥ १११ ॥ होता है । इसका कारण पदोंका अतिव्यवहित प्रयोग है । इससे विवक्षित अर्थके अभिधानमें बाधा आती है ॥ ११० ॥ (४) प्रमथिता—'खातयः कनि, काले ते०' (१११) में 'ते', 'मम' और 'स्फीत' को छोड़कर शेष सभी शब्द दुर्बोधार्थक हैं : 'खातयः' पद 'खाति' पुं० प्रथमा, ब०व० है । यह शब्द प्रसिद्ध कोषोंमें उपलब्ध नहीं है, न प्रयोगमें ही है । अपितु 'खस्य आकाशस्यायं खः शब्दः, तस्य अतिः सततप्राप्तिर्येषु; ते खातयः' व्युत्पत्तिसे किङ्किणी, नूपुर, नेवर, घुँघरू घर्घरिका (भोज) अर्थमें कविको इष्ट है । कनि कन्यार्थक वैदिक 'कनी'३ का सम्बोधन ए०व० है । काले पद काल्यते क्षिप्यते इति कालः पदम्, तस्मिन् चरणे' अर्थमें है । यह दक्षिणकी चारों भाषाओंमें 'काल' या 'कालु' के रूपमें इस अर्थमें उपलब्ध है । संस्कृतमें इस अर्थमें प्रयुक्त नहीं है ।४ स्फातयः पद 'स्फायी ओप्यायी वृद्धौ' (भ्वादि०) १. यह रत्नश्रीसम्मत पाठ है । वादि, तरुण टीकाओंमें धृत व्याख्यात और सरस्वतीकण्ठाभरण १।१२८में उद्धृत श्लोकमें धृत और रत्नदर्पणमे व्याख्यात पाठ 'स्फाटं' है । २. रत्नश्री, सरस्वतीक०, रत्नदर्पणमें 'वायवो' है । वादीटीका और तरुण- टीकामें 'तायवो' धृत एवं व्याख्यात है । 'चारिणः' केवल रत्नश्रीमें है । अन्य पूर्वोक्त सब स्थलोंमें 'धारिणः' है । ३. 'पुनस्तदा बृहति यत् कनाया दुहितुरा अनुभृतमनर्वा' (ऋ० १०।६१।५) आदि (१०,११,२१) में 'कन्या' अर्थमें 'कना' का तथा 'जारः कनीनां, पतिर्जनीनाम्' (ऋ० १।६६।४), 'पतमकृणुतं कनीनाम्' (ऋ० १।११६ १०) आदि (ऋ०१।१५२।४, १६३।८; २।१५।७, ५।३।२) में 'कनी' का प्रयोग है । यह लौकिक संस्कृतमें प्रचलित नहीं है । 'कन्या' में धृत है । ४. 'कल गतौ सङ्ख्याने च' (चु०) 'नुदति, क्षिपतीत्येतावात्मने, कालयत्यपि' (आख्यातचन्द्रिका २।३।८६) से 'कर्मण्यण्' (अष्टा० ३।२।१) से निष्पन्न यह शब्द तेलुगुमे 'कालु', कन्नड, तमिल और मलयालममें 'काल' रूपमें 'चरण' अर्थमें प्रसिद्ध है । रत्नदर्पण : कालश्चरणः कर्णाटदेशभाषा- नुसारात् । 'कर्णाटदेश'से 'दक्षिण भारत' इष्ट है ।