काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary
महाकवि दण्डी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१४० काव्यादर्श [३।१११ (४) खातयः कनि काले ते स्फातयः स्फीत१-वल्गवः । चन्द्रे साक्षाद् भवन्त्यत्र वायवो२ मम चारिणः ॥ १११ ॥ (४) हे कन्ये (कनि), तुम्हारे आह्लादकारी चरणमें (काले) शोभायमान, मनोहरतामे बजते हुए अथवा चञ्चल घुँघरू (खातयः) अनुभवमें आ रहे हैं । इस स्थितिमें मेरी हवा अस्थिर हो (खिसक) रही है ॥ १११ ॥ होता है । इसका कारण पदोंका अतिव्यवहित प्रयोग है । इससे विवक्षित अर्थके अभिधानमें बाधा आती है ॥ ११० ॥ (४) प्रमथिता—'खातयः कनि, काले ते०' (१११) में 'ते', 'मम' और 'स्फीत' को छोड़कर शेष सभी शब्द दुर्बोधार्थक हैं : 'खातयः' पद 'खाति' पुं० प्रथमा, ब०व० है । यह शब्द प्रसिद्ध कोषोंमें उपलब्ध नहीं है, न प्रयोगमें ही है । अपितु 'खस्य आकाशस्यायं खः शब्दः, तस्य अतिः सततप्राप्तिर्येषु; ते खातयः' व्युत्पत्तिसे किङ्किणी, नूपुर, नेवर, घुँघरू घर्घरिका (भोज) अर्थमें कविको इष्ट है । कनि कन्यार्थक वैदिक 'कनी'३ का सम्बोधन ए०व० है । काले पद काल्यते क्षिप्यते इति कालः पदम्, तस्मिन् चरणे' अर्थमें है । यह दक्षिणकी चारों भाषाओंमें 'काल' या 'कालु' के रूपमें इस अर्थमें उपलब्ध है । संस्कृतमें इस अर्थमें प्रयुक्त नहीं है ।४ स्फातयः पद 'स्फायी ओप्यायी वृद्धौ' (भ्वादि०) १. यह रत्नश्रीसम्मत पाठ है । वादि, तरुण टीकाओंमें धृत व्याख्यात और सरस्वतीकण्ठाभरण १।१२८में उद्धृत श्लोकमें धृत और रत्नदर्पणमे व्याख्यात पाठ 'स्फाटं' है । २. रत्नश्री, सरस्वतीक०, रत्नदर्पणमें 'वायवो' है । वादीटीका और तरुण- टीकामें 'तायवो' धृत एवं व्याख्यात है । 'चारिणः' केवल रत्नश्रीमें है । अन्य पूर्वोक्त सब स्थलोंमें 'धारिणः' है । ३. 'पुनस्तदा बृहति यत् कनाया दुहितुरा अनुभृतमनर्वा' (ऋ० १०।६१।५) आदि (१०,११,२१) में 'कन्या' अर्थमें 'कना' का तथा 'जारः कनीनां, पतिर्जनीनाम्' (ऋ० १।६६।४), 'पतमकृणुतं कनीनाम्' (ऋ० १।११६ १०) आदि (ऋ०१।१५२।४, १६३।८; २।१५।७, ५।३।२) में 'कनी' का प्रयोग है । यह लौकिक संस्कृतमें प्रचलित नहीं है । 'कन्या' में धृत है । ४. 'कल गतौ सङ्ख्याने च' (चु०) 'नुदति, क्षिपतीत्येतावात्मने, कालयत्यपि' (आख्यातचन्द्रिका २।३।८६) से 'कर्मण्यण्' (अष्टा० ३।२।१) से निष्पन्न यह शब्द तेलुगुमे 'कालु', कन्नड, तमिल और मलयालममें 'काल' रूपमें 'चरण' अर्थमें प्रसिद्ध है । रत्नदर्पण : कालश्चरणः कर्णाटदेशभाषा- नुसारात् । 'कर्णाटदेश'से 'दक्षिण भारत' इष्ट है ।