भारतकोश
काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary

महाकवि दण्डी द्वारा

DevanagariHindipublished270 पृष्ठ

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३।१०६-११०] ४. प्रहेलिकाके भेदोंके उदाहरण १३६ (२) कुब्जामासेवमानस्य यथा ते वर्धते रतिः । नैवं निर्विशतो नारीरमरस्त्री-विडम्बिनीः ॥ १०६ ॥ (३) दण्डे चुम्बति पद्मिन्या हंसः कर्कश-कण्टके । मुखं वल्गु-रवं कुर्वंस्तुण्डेनाङ्गानि घट्टयन् ॥ ११० ॥ (२) कुब्जा (कुबड़ी) का भोग करते हुए तुम्हारा आनन्द जैसे बढ़ता है, वैसे देवताओंकी स्त्रियोंकी विडम्बना करने वाली (अप्सराओंके समान सुन्दर) रमणियोंका भोग करते हुए नहीं (बढ़ता) ॥ १०६ ॥ (३) नालमें चूम रहा पद्मिनीके हंस कठोर काँटों वालेमें, मुखको सुन्दर बोली वाला करता हुआ, चोंचसे अङ्गोंको टकराता हुआ ॥ ११० ॥ (२) वञ्चिता—यहाँ 'कुब्जा' शब्दके प्रयोगसे आपाततः असङ्गत अर्थ प्रतीत होता है : अप्सरा जैसी सुन्दर रमणी तो अच्छी न लगे, और कुबड़ी मन मोहे, यह भी कोई बात है ! इससे शङ्का होती है कि 'कुब्जा' शब्द अपने प्रसिद्ध अर्थ (कुबड़ी) से भिन्न किसी अर्थमें होगा । तब ध्यान जाता है कि कहीं 'कान्यकुब्ज' अपरनाम 'महोदया' नामक नगरीको, अथवा कान्यकुब्जकी किसी स्त्रीको, ही सत्यभामाको सत्या, भामा¹ आदि कहनेके समान पूर्वपद- लोप करके 'कुब्जा' शब्दसे तो नहीं कहा है : कान्यकुब्ज नगरी (राजधानी) अथवा कान्यकुब्ज देशकी स्त्रीका उपभोग करते हुए तुम्हें जैसे निरन्तर वर्ध- मान आनन्द मिलता है, वैसे अप्सरासदृश सुन्दर रमणियोंके भोगसे नहीं मिलता । राजाकी पत्नीके रूपमें पृथ्वी अथवा राजधानीकी कल्पना कवि- समयमें प्रसिद्ध है । इस प्रयोगमें कुब्जासे विवक्षित नगरीका अथवा कान्यकुब्ज की स्त्रीका अन्य नगरियोंसे या स्त्रियोंसे अतिशय व्यक्त होता है । यहाँ 'कुबड़ी' अर्थमें प्रसिद्ध 'कुब्जा' शब्दका प्रयोग विवक्षित 'कान्य- कुब्जा' (कन्नोज, अथवा कन्नौजिया स्त्री) के अर्थमें करके श्रोताको छला गया है, भुलावेमें डाला गया है । अविवक्षितार्थक 'कुब्जा' शब्दसे विवक्षितार्थ 'कान्यकुब्जा' को छुपानेके कारण यह अर्थगूढ प्रयोग व्यामोहकारी हो गया है ॥ १०६ ॥ (३) व्युत्क्रान्ता—प्रकृत (११०वें) श्लोकमें विवक्षित अन्वय है : वल्गु- रवं कुर्वन्, कर्कश-कण्टके दण्डे अङ्गानि घट्टयन्, हंसः तुण्डेन पद्मिन्या मुखं चुम्बति । पर श्लोकमें प्रदत्त पदविन्याससे व्यामोहकारी और ही अर्थ प्रकट १. सिद्धान्तकौमुदी, स्वाथिकाः, वार्तिक : विनाऽपि प्रत्ययं पूर्वोत्तरपदयोर्वा लोपो वाच्यः । देवदत्तो, दत्तो, देवः । सत्यभामा, भामा, सत्या ।