भारतकोश
काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary

महाकवि दण्डी द्वारा

DevanagariHindipublished270 पृष्ठ

पृष्ठ 161, कुल 270 में से

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पृष्ठ 161

१३८ काव्यादर्श [ ३।१०८ (१) न मया गो-रसाभिज्ञं चेतः कस्मात् प्रकुप्यसि ? अस्थान-रुदितैरेतैरैरलमालोहितेक्षणे ॥ १०८ ॥ (१) हे कुछ-कुछ रक्तिम नयनों वाली (प्रिये), नहीं मैंने गोरस (दूध, दही, छाछ आदि) से परिचित मन (धारण किया है) । क्यों इतनी कुपित हो रही हो ? यह बिना बातके रोना-धोना मत करो ॥ १०८ ॥ हेमचन्द्रने प्रहेलिकाओंको च्युत, गूढ आदिसे पृथक् रखकर प्राचीन परम्पराका अनुगमन किया है, आचार्य भोजका नहीं ॥ १०७ ॥ (१) समागता प्रहेलिका इस उक्ति के यथाधृत पाठको 'मया गोरसाभिज्ञं' के रूपमें लेनेसे उपर्युक्त असङ्गत अर्थकी प्रतीतिके कारण श्रोता उलझनमें पड़ जाता है कि मानवती प्रिया और उसके सम्मुख मनुहार करते दीन खड़े प्रियके बीच ये 'गो-रस' (दूध, दही आदि) कहाँसे आ गया ? सिर खुजाकर सोचनेपर यदि उसे व्याकरणका अच्छा अभ्यास है, तो 'मे + आगो-रसाभिज्ञं' सन्धिविच्छेद समझ आ जायेगा कि अयादिसन्धिसे प्राप्त यकारका शाकल्यसम्मत लोप¹ कविने नहीं किया है । तब उसके ज्ञानचक्षु उन्मीलित होंगे : मेरा चित्त अपराध (अन्य स्त्रीगमन आदि) करनेमें आनन्दकी अनुभूतिका अभिज्ञ नहीं है, अर्थात् मैंने कोई अपराध नहीं किया है; तब प्रिये तुम काहे को नाराज़ हुईं ? इस प्रकार यहाँ 'मे + आगो०' पदोंमें सन्धि (शब्दधर्म) के कारण पदान्तरकी तथा उसके द्वारा अविवक्षित अर्थकी प्रतीति होनेसे श्रोताको व्या- मोह हो जाता है । दो पदोंके समागम (सन्धानके) कारण यह सब होनेसे यह 'समागता' प्रहेलिका है । यह शब्दके गोपनसे निष्पन्न होनेसे शब्द-गूढा है । रचनामें असुकर तथा अवबोधमें दुर्बोध होनेसे यह दुष्कर है और वैचित्र्ययुक्त होनेसे चित्र है । सन्धियुक्त शब्दप्रयोगसे इस शोभाके उत्पन्न होनेसे यह शब्दालङ्कार है । भोजके मतमें इस प्रकारकी सन्धिसे शेष सम्बन्ध ('मे') का गोपन हो जाता है और कर्तृ सम्बन्ध 'मया' (कर्तरि तृतीयान्त) की भ्रान्ति होती है । अतः यहाँ सम्बन्धगूढ बन्ध है । भोजके अनुसार यह प्रहेलिका नहीं है । यह सम्बन्ध अर्थके रूपमें है । अतः दण्डीने इसे 'पदसन्धिके कारण गूढार्था' कहा है । व्यामोहका कारण असाधारण (अव्यवहित पूर्ववर्ती) कारण अर्थका गोपन है । उसका कारण पदसन्धिसे सम्बन्ध अर्थका गोपन या सम्बन्धिपदका गोपन है । इस प्रकार पदसन्धि प्रहेलिकाका आधार है ॥ १०८ ॥ १. अष्टाध्यायी ६।१।७८ : एचोऽयवायावः । ८।३।१९ : लोपः शाकल्यस्य ।

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