काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary
महाकवि दण्डी द्वारा
पृष्ठ 160, कुल 270 में से
संदर्भ में पढ़ें३।१०७ ] ४. प्रहेलिकाओंका इतिहास १३७ प्रहेलिकाओंका निरूपण चित्र बन्धोंके प्रकरणकी समाप्तिके बाद किया है । १ भोजने दण्डीकी (१) समागता पहेलीको पहेली न मानकर शेषसम्बन्धगूढ- बन्ध अलङ्कार माना है । २ तत्त्वतः यदि देखा जाये, तो इन षड्विध गूढबन्धों का प्रयोजन परव्यामोहन तथा क्रीडा ही है । अतः ये 'प्रहेलिका' कहलानेके अधिकारी हैं । पर दण्डिद्वारा प्रस्तुत पूर्वाचार्योंके प्रहेलिकालक्षणोंकी आधार- भूत दृष्टिसे इन गूढबन्धोंकी दृष्टिमें अन्तर है । पूर्वाचार्योंकी १५ प्रहेलिकाओं की आधारभूत दृष्टिको अन्य दृष्टिका उपलक्षक यदि मान लिया जाये, तो ये भेद अर्थवती (गूढार्था) प्रहेलिकाके भेद माने जा सकते हैं । तथा इन्हें दण्डी की १५ प्रहेलिकाओंसे अतिरिक्त प्रहेलिकाएँ माना जा सकता है । कलिकालसर्वज्ञ आचार्य हेमचन्द्रने (१) दण्डीके तृतीय परिच्छेदके प्रहेलि- काविषयोंको दण्डीकी दृष्टिके अनुकरणसे सादृश्य और आश्चर्यहेतुताके कारण चित्रालङ्कारमें तो माना ही है, (२) रुद्रटका अनुकरण करके च्युत, गूढका समावेश स्पष्टतः चित्रमें किया (३) और भोजका समन्वय करनेको प्रश्नोत्तर, प्रहेलिका और दुर्वाचक (दुःश्रव)'का भी चित्रमें ही समावेश किया है । ४ किन्तु १. दुष्करत्वात् कठोरत्वाद्, दुर्बोधत्वाद् विनाऽवधेः । दिङ्मात्रं दर्शितं चित्रे शेषमूह्यं महात्मभिः ।। सरस्वती० २।१३० २. सरस्वती० २।३६८ : सम्बन्धगूढं यथा—'न मयागोरसा०' (काव्यादर्श ३।१०८) । अत्र 'न मे आगोरसाभिज्ञ' चेत' इति सम्बन्धपदस्य 'मया' इति तृतीयाभ्रान्त्या गोपितत्वादिदं सम्बन्धगूढम् । ३. कामसूत्र १।३।१६ पर जयमङ्गलने ३० दुर्वाचकयोगा कलाकी व्याख्यामें काव्यादर्शके उल्लेखसे एक श्लोक उद्धृत करके उसकी व्याख्या की है । पर दण्डीके काव्यादर्शमें न दुर्वाचक बन्ध उपलब्ध है, और न जयमङ्गलोद्धृत- व्याख्यात श्लोक । इसी प्रकार ३३ काव्यसमस्यापूरण कलाकी व्याख्यामें भी काव्यादर्शके नामसे एक श्लोक उद्धृत करके उसकी व्याख्या की है । पर काव्यादर्शके उपलब्ध भागमें न समस्यापूर्ति उपलब्ध है और न यह उदाहरण । जयमङ्गलके कथनसे अनुमान किया जा सकता है कि काव्या- दर्शके अब अनुपलब्ध कलापरिच्छेद (३।१७१ में उक्त) में ये दोनों कलायें रही होंगी । ४. काव्यानुशासन, ५म अध्याय, पृष्ठ २५७ : स्वर-व्यञ्जन-स्थान-गत्याकार- नियम-च्युत-गूढादि चित्रम् । स्वरादीनां नियमः, च्युतगूढादिश्च चित्रं, सादृश्यादाश्चर्यहेतुत्वाद् वा चित्रम् । पृष्ठ २७२ : 'गूढादि' इत्यादिपदेन प्रश्नोत्तर-प्रहेलिका-दुर्वाचकादि-परिग्रहः ।