भारतकोश
काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary

महाकवि दण्डी द्वारा

DevanagariHindipublished270 पृष्ठ

पृष्ठ 159, कुल 270 में से

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पृष्ठ 159

१३६ काव्यादर्श [३।१०७ जिससे श्रोता व्यामूढ हो जाता है । इन दोनों चित्रालङ्कारोंमें अर्थभेदका निमित्त स्वर एवम् अनुस्वार शब्द (वर्ण) हैं । अतः इन्हें शब्दार्थालङ्कार कहना उचित है । (३) रुद्रटने प्रहेलिकाके दो भेद बताये हैं : (क) पदारूढ होनेसे स्पष्ट एवं निगूढ होनेसे प्रच्छन्न अर्थ वाली, (ख) अव्याहृतार्था (अनु- क्त अर्थ वाली) ।¹ इस विवरणसे स्पष्ट है कि यह अर्थालङ्कार है । व्या- मोहकारी होनेसे चित्र (विस्मयजनक) है । रुद्रटने चित्रबन्धोंकी दुष्कर, सुकरके रूपमें कल्पना नहीं की है । महाराज भोजने प्रहेलिकाके स्वरूपनिरूपणमें दण्डीकी दृष्टि न अपनाकर रुद्रटके निरूपणको व्यवस्थित किया है : उन्होंने (१) प्रहेलिकाका प्रश्नरूपमें होना आवश्यक माना; (२) रुद्रटके मात्रा-बिन्दुच्युतकोंका समाहार प्रहेलिका में किया; (३) मात्रा और बिन्दुको अक्षरमात्र (वर्णमात्र) का उपलक्षक माना; (४) च्युतिके विपरीत वर्णदानका नवीन समावेश किया; (५) अक्षरोंका आकारविशेष (मुष्टि) के रूपमें विन्यास बताकर मुरजादि बन्धका प्रहेलिकामें सम्मिश्रण किया; (६) केवल अनुस्वार, विसर्ग आदिका विन्यास करके तथा स्वरव्यञ्जनोंका प्रयोग न करके निष्पन्न बिन्दुमती प्रहेलिकाकी उद्भावना की । ये पाँचों प्रकारकी प्रहेलिकाएँ शब्दमूलक होनेसे शब्दालङ्कार हैं। (७) अर्थके कारण व्यामोह वाली अर्थवती (छठी) प्रहेलिकाके भेदोपभेद भोजने नहीं दिये हैं।² दण्डीकी प्रहेलिकाएँ (१) समागता, (३) व्युत्क्रान्ता जैसी कुछेकको छोड़कर प्रायेण अर्थवती ही हैं। इससे यह स्पष्ट है कि भोजने दण्डी की दिशामें चिन्तन न करके रुद्रटकी दृष्टिको आधार बनाकर उसे अपनी स्वतन्त्र दृष्टिसे व्यवस्थित करके प्रहेलिकाको नये रूपमें देखा है । भोजने रुद्रटके क्रिया-कारकगूढ भेदोंको चार और प्रकारोंका उपलक्षक मानकर यों प्रस्तुत किया है : (१) क्रिया, (२) कारक, (३) शेष सम्बन्ध, (४) पद, (५) अभिप्राय, (६) वस्तु (द्रव्य) के गोपनसे छह प्रकारके गूढ- बन्ध निष्पन्न होते हैं ।³ गूढबन्धोंकी प्रथम उद्भावना रुद्रटने ही की है । पर रुद्रटके मतमें ये चित्रबन्धके अन्तर्गत आते हैं । जबकि भोजने इनका तथा १. मात्रा-बिन्दु-च्यवनादन्यार्थत्वेन तच्च्युते नाम । स्पष्ट-प्रच्छन्नार्था प्रहेलिकाऽव्याहृतार्था च ॥ काव्याल० ५।२५ २. प्रहेलिका = सकृत्प्रश्नः साऽपि षोढा च्युताक्षरा । दत्ताक्षरोभयं, मुष्टिर्बिन्दुमत्यर्थवत्यपि ॥ सरस्वती० २।१३३ ३. क्रियाकारकसम्बन्धे पदाभिप्रायवस्तुभिः । गोपितैः षड्विधं प्राहुर्गूढं गूढार्थवेदिनः ॥ सरस्वती० २।१३५

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