भारतकोश
काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary

महाकवि दण्डी द्वारा

DevanagariHindipublished270 पृष्ठ

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पृष्ठ 158

३१[०७] ४. प्रहेलिकाओंका इतिहास १३५ धर्मोंको बताकर करनेके बाद अगले प्रकरणमें काव्यशरीरके दोषोंका निरूपण किया है, तो जैसे इससे अध्येताका कल्याण ही हुआ है, वैसे ही, प्रहेलिकाओंके साधु प्रकारके निरूपणके पश्चात् वे दुष्ट प्रहेलिकाओंका भी दिङ्मात्र प्रदर्शित कर देते, तो अध्येताका उपकार ही होता । लगता है कि आचार्य दण्डी यहाँ परिश्रमसे कतरा गये । ४. प्रहेलिकाओंका इतिहास : आचार्य दण्डीके अनुसार प्रहेलिकाका उपयोग परव्यामोहन है; वह शब्दके द्वारा सम्भव नहीं है, अपितु अर्थसे ही सम्भव है । शब्दकी गूढता भी अर्थको व्यामोहकारी बनायेगी । यही कारण है कि आचार्यने पदसन्धिसे सम्पन्न (१) समागताको भी 'गूढार्था' बताया है । इसलिये प्रहेलिकाएँ आचार्य दण्डीके मतमें अर्थालङ्कार हैं । शब्दालङ्कार यमक आदिके प्रकरणमें तो दुष्कर चित्र अलङ्कार होनेसे दुष्कर चित्रमार्ग प्रकरणमें दी हैं, शब्दालङ्कार होनेके कारण नहीं । परवर्ती आचार्योंमें उद्भट तो यमकपर ही मौन हैं । वामन भी प्रहे- लिकाओंके विषयमें मौन हैं । इन दोनों आचार्योंने दुष्कर चित्रमार्गका उल्लेख नहीं किया है । आचार्य रुद्रटने इस प्रसङ्गमें चित्रमार्गके विषयको आचार्य दण्डीसे आगे बढ़ाया है : उन्होंने इसके (१) मात्राच्युतक, (२) बिन्दुच्युतक, (३) प्रहेलिका, (४) कारकगूढ, (५) क्रियागूढ, (६) प्रश्नोत्तर भेद बताकर 'आदि' शब्दसे अन्य चित्रालङ्कारोंकी दिशा उद्घाटित रखी है । इसके अतिरिक्त दण्डिप्रोक्त परव्यामोहनको रुद्रटने उतना महत्त्व नहीं दिया, अपितु दण्डी द्वारा बताये एक अन्य उपयोग क्रीडापर ही बल दिया है । उनकी दृष्टि में कदाचित् परव्यामोहनका साध्य होना उचित नहीं है । अपितु उस साधन होना चाहिये क्रीडाका, मनोविनोदका । यहाँ भी यह बात ध्यान देने योग्य है कि रुद्रटने भी अर्थके कारण चमत्कार उत्पन्न करने वाले इन अलङ्कारोंको चित्रमार्गका विषय होनेसे ही यहाँ दिया है, शब्दालङ्कार होनेसे नहीं । काव्यालङ्कारके पञ्चम अध्यायका विषय चित्रनिरूपण है ।१ चित्रमार्गके अन्तर्गत कुछ शब्दालङ्कार हैं । जैसे चक्रबन्धसे लेकर सर्वतोभद्रबन्ध तकके चित्रबन्ध (५।२-२३) । (१-२) मात्राच्युतक आदिमें मात्रा (स्वर) और बिन्दु (अनुस्वार, नासिक्य वर्ण) के च्युत होनेसे अर्थभेद हो जाता है, १. भङ्ग्यन्तरकृत-तत्क्रम-वर्ण-निमित्तानि वस्तुरूपाणि । साङ्गानि विचित्राणि च रच्यन्ते यत्र, तच्चित्रम् ।। काव्यालङ्कार ५।१ इत्थं स्थितस्यास्य दिशं निशम्य शब्दार्थवित् क्षोदित चित्रवृत्तः । आलोच्य लक्ष्यं च महाकवीनां चित्रं विचित्रं सुकविर्विदध्यात् ।। ३३