भारतकोश
काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary

महाकवि दण्डी द्वारा

DevanagariHindipublished270 पृष्ठ

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पृष्ठ 157

१३४ काव्यादर्श [३।१०७ कारण वे दोषयुक्त और हेय हो जाती हैं। दोषयुक्त होनेके कारण ये ‘समागता’ आदिसे विलक्षण (भिन्न प्रकारकी) हैं। उनके निश्चित लक्षणके न होनेके कारण ये प्रहेलिकाभास हैं, प्रहेलिकायें नहीं । अतः इनका विस्तार बतानेका प्रयास आवश्यक है । इस व्याख्यामें ‘अलक्षणाः’ में ‘नञ्’ का अर्थ ‘विरोध’ रत्नश्रीज्ञानको अभिप्रेत है । किन्तु वादीजीने ‘नञ्’ को ‘अभाव’ अर्थ में बताया है : अलक्षणाः = लक्षणवर्जिताः । रङ्गाचार्य रेड्डीजीने भी इसी प्रकार ‘नञ्’ को ‘शून्य’ अर्थमें बताया है ।१ पर यदि ये प्रहेलिकाके लक्षणसे ‘वर्जित’ या ‘शून्य’ ही हैं, तो प्रहेलिका ही कैसे हैं ? जब प्रहेलिकायें ही नहीं हैं, तो दुष्ट कैसे होंगीं ? इसलिये रत्नश्रीज्ञानकी व्याख्या ही उचित है । अतः निष्कर्ष यही है कि जिस भी प्रकारकी पहेलीका लक्षण अव्याप्ति, अतिव्याप्ति या असम्भवमें से अन्यतम दोषसे युक्त होगा, वह भले प्रहेलिकाका पूरा आनन्द न दे सके, प्रहेलिकाका आभास अवश्य देगी । अतः ऐसी पहेली ‘दुष्ट’ पहेली कहलाती है । (क) पहेलियोंके ये दोष पहेलियोंको हेय बना देनेके कारण कुछ गिने जानेके, आदर दिये जानेके, योग्य नहीं हैं । (ख) या ‘वे केवल १४ ही हैं, यह नहीं कहा जा सकता । पूर्वाचार्योने १४ बताये हैं । हमारी समझसे वे अनगिनत हैं । इसलिये उनके प्रपञ्चमें पड़ना अनावश्यक है । अतः आचार्य दण्डीका कथन है कि वे साधु (लक्षणसम्पन्न) पहेलियोंके ही उदाहरण देंगे ।२ परन्तु आचार्य यदि प्रहेलिकाओंके दोषोंके कुछ प्रकारोंका निरूपण कर देते, तो अच्छा तो होता ही, दोषप्रकरणकी समुचित प्रस्तावना भी इससे हो जाती । उन्होंने काव्यशरीरके साधु स्वरूपका निरूपण उसके समस्त शोभाकारक १. प्रभा ३।१०७ : ‘यास्त्वलक्षणाः’—समागतादिषोडश प्रहेलिका लक्षण- शून्याः, ता दुष्टा बोद्धव्याः । रेड्डीजीने इससे पूर्व १०६ की व्याख्यामें च्युताक्षरादिको ‘दुष्ट सदोष प्रहेलिका’ कहा है । पर यह रुद्रटसे प्रारब्ध समूची परम्पराके विरुद्ध है । च्युताक्षरादि चित्रालङ्कारके अन्तर्गत निर्दोष अभिधान-प्रकार हैं । विशेषार्थ आगे व्याख्या देखें । २. रत्नश्री ३।१०७ : (क) दोषाः प्रहेलिकासम्भविनो हेयाः, प्रहेलिका-दोषा अपरिसङ्ख्येयाः । न लक्षणतो न लक्ष्यतो गुणवदादरेणाप्रतिपाद्यान् मन्यमानाः पश्यन्तः साध्वीरेव प्रहेलिका अभिधास्यामः ।...यद्वा (ख) प्रहेलिकादोषा अपरापरदोषसम्भवेन ‘चतुर्दश’ इति इयत्तयाऽपरि- सङ्ख्येयाः । ततश्चातिप्रसङ्गान्नोच्यन्ते । इत्यभिप्रायेणोक्तं ‘दोषान्०’ इत्यादि ।