काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary
महाकवि दण्डी द्वारा
३।१०७ ] ४. प्रहेलिकाओंका इतिहास १३७ प्रहेलिकाओंका निरूपण चित्र बन्धोंके प्रकरणकी समाप्तिके बाद किया है । १ भोजने दण्डीकी (१) समागता पहेलीको पहेली न मानकर शेषसम्बन्धगूढ- बन्ध अलङ्कार माना है । २ तत्त्वतः यदि देखा जाये, तो इन षड्विध गूढबन्धों का प्रयोजन परव्यामोहन तथा क्रीडा ही है । अतः ये 'प्रहेलिका' कहलानेके अधिकारी हैं । पर दण्डिद्वारा प्रस्तुत पूर्वाचार्योंके प्रहेलिकालक्षणोंकी आधार- भूत दृष्टिसे इन गूढबन्धोंकी दृष्टिमें अन्तर है । पूर्वाचार्योंकी १५ प्रहेलिकाओं की आधारभूत दृष्टिको अन्य दृष्टिका उपलक्षक यदि मान लिया जाये, तो ये भेद अर्थवती (गूढार्था) प्रहेलिकाके भेद माने जा सकते हैं । तथा इन्हें दण्डी की १५ प्रहेलिकाओंसे अतिरिक्त प्रहेलिकाएँ माना जा सकता है । कलिकालसर्वज्ञ आचार्य हेमचन्द्रने (१) दण्डीके तृतीय परिच्छेदके प्रहेलि- काविषयोंको दण्डीकी दृष्टिके अनुकरणसे सादृश्य और आश्चर्यहेतुताके कारण चित्रालङ्कारमें तो माना ही है, (२) रुद्रटका अनुकरण करके च्युत, गूढका समावेश स्पष्टतः चित्रमें किया (३) और भोजका समन्वय करनेको प्रश्नोत्तर, प्रहेलिका और दुर्वाचक (दुःश्रव)'का भी चित्रमें ही समावेश किया है । ४ किन्तु १. दुष्करत्वात् कठोरत्वाद्, दुर्बोधत्वाद् विनाऽवधेः । दिङ्मात्रं दर्शितं चित्रे शेषमूह्यं महात्मभिः ।। सरस्वती० २।१३० २. सरस्वती० २।३६८ : सम्बन्धगूढं यथा—'न मयागोरसा०' (काव्यादर्श ३।१०८) । अत्र 'न मे आगोरसाभिज्ञ' चेत' इति सम्बन्धपदस्य 'मया' इति तृतीयाभ्रान्त्या गोपितत्वादिदं सम्बन्धगूढम् । ३. कामसूत्र १।३।१६ पर जयमङ्गलने ३० दुर्वाचकयोगा कलाकी व्याख्यामें काव्यादर्शके उल्लेखसे एक श्लोक उद्धृत करके उसकी व्याख्या की है । पर दण्डीके काव्यादर्शमें न दुर्वाचक बन्ध उपलब्ध है, और न जयमङ्गलोद्धृत- व्याख्यात श्लोक । इसी प्रकार ३३ काव्यसमस्यापूरण कलाकी व्याख्यामें भी काव्यादर्शके नामसे एक श्लोक उद्धृत करके उसकी व्याख्या की है । पर काव्यादर्शके उपलब्ध भागमें न समस्यापूर्ति उपलब्ध है और न यह उदाहरण । जयमङ्गलके कथनसे अनुमान किया जा सकता है कि काव्या- दर्शके अब अनुपलब्ध कलापरिच्छेद (३।१७१ में उक्त) में ये दोनों कलायें रही होंगी । ४. काव्यानुशासन, ५म अध्याय, पृष्ठ २५७ : स्वर-व्यञ्जन-स्थान-गत्याकार- नियम-च्युत-गूढादि चित्रम् । स्वरादीनां नियमः, च्युतगूढादिश्च चित्रं, सादृश्यादाश्चर्यहेतुत्वाद् वा चित्रम् । पृष्ठ २७२ : 'गूढादि' इत्यादिपदेन प्रश्नोत्तर-प्रहेलिका-दुर्वाचकादि-परिग्रहः ।
१३८ काव्यादर्श [ ३।१०८ (१) न मया गो-रसाभिज्ञं चेतः कस्मात् प्रकुप्यसि ? अस्थान-रुदितैरेतैरैरलमालोहितेक्षणे ॥ १०८ ॥ (१) हे कुछ-कुछ रक्तिम नयनों वाली (प्रिये), नहीं मैंने गोरस (दूध, दही, छाछ आदि) से परिचित मन (धारण किया है) । क्यों इतनी कुपित हो रही हो ? यह बिना बातके रोना-धोना मत करो ॥ १०८ ॥ हेमचन्द्रने प्रहेलिकाओंको च्युत, गूढ आदिसे पृथक् रखकर प्राचीन परम्पराका अनुगमन किया है, आचार्य भोजका नहीं ॥ १०७ ॥ (१) समागता प्रहेलिका इस उक्ति के यथाधृत पाठको 'मया गोरसाभिज्ञं' के रूपमें लेनेसे उपर्युक्त असङ्गत अर्थकी प्रतीतिके कारण श्रोता उलझनमें पड़ जाता है कि मानवती प्रिया और उसके सम्मुख मनुहार करते दीन खड़े प्रियके बीच ये 'गो-रस' (दूध, दही आदि) कहाँसे आ गया ? सिर खुजाकर सोचनेपर यदि उसे व्याकरणका अच्छा अभ्यास है, तो 'मे + आगो-रसाभिज्ञं' सन्धिविच्छेद समझ आ जायेगा कि अयादिसन्धिसे प्राप्त यकारका शाकल्यसम्मत लोप¹ कविने नहीं किया है । तब उसके ज्ञानचक्षु उन्मीलित होंगे : मेरा चित्त अपराध (अन्य स्त्रीगमन आदि) करनेमें आनन्दकी अनुभूतिका अभिज्ञ नहीं है, अर्थात् मैंने कोई अपराध नहीं किया है; तब प्रिये तुम काहे को नाराज़ हुईं ? इस प्रकार यहाँ 'मे + आगो०' पदोंमें सन्धि (शब्दधर्म) के कारण पदान्तरकी तथा उसके द्वारा अविवक्षित अर्थकी प्रतीति होनेसे श्रोताको व्या- मोह हो जाता है । दो पदोंके समागम (सन्धानके) कारण यह सब होनेसे यह 'समागता' प्रहेलिका है । यह शब्दके गोपनसे निष्पन्न होनेसे शब्द-गूढा है । रचनामें असुकर तथा अवबोधमें दुर्बोध होनेसे यह दुष्कर है और वैचित्र्ययुक्त होनेसे चित्र है । सन्धियुक्त शब्दप्रयोगसे इस शोभाके उत्पन्न होनेसे यह शब्दालङ्कार है । भोजके मतमें इस प्रकारकी सन्धिसे शेष सम्बन्ध ('मे') का गोपन हो जाता है और कर्तृ सम्बन्ध 'मया' (कर्तरि तृतीयान्त) की भ्रान्ति होती है । अतः यहाँ सम्बन्धगूढ बन्ध है । भोजके अनुसार यह प्रहेलिका नहीं है । यह सम्बन्ध अर्थके रूपमें है । अतः दण्डीने इसे 'पदसन्धिके कारण गूढार्था' कहा है । व्यामोहका कारण असाधारण (अव्यवहित पूर्ववर्ती) कारण अर्थका गोपन है । उसका कारण पदसन्धिसे सम्बन्ध अर्थका गोपन या सम्बन्धिपदका गोपन है । इस प्रकार पदसन्धि प्रहेलिकाका आधार है ॥ १०८ ॥ १. अष्टाध्यायी ६।१।७८ : एचोऽयवायावः । ८।३।१९ : लोपः शाकल्यस्य ।
३।१०६-११०] ४. प्रहेलिकाके भेदोंके उदाहरण १३६ (२) कुब्जामासेवमानस्य यथा ते वर्धते रतिः । नैवं निर्विशतो नारीरमरस्त्री-विडम्बिनीः ॥ १०६ ॥ (३) दण्डे चुम्बति पद्मिन्या हंसः कर्कश-कण्टके । मुखं वल्गु-रवं कुर्वंस्तुण्डेनाङ्गानि घट्टयन् ॥ ११० ॥ (२) कुब्जा (कुबड़ी) का भोग करते हुए तुम्हारा आनन्द जैसे बढ़ता है, वैसे देवताओंकी स्त्रियोंकी विडम्बना करने वाली (अप्सराओंके समान सुन्दर) रमणियोंका भोग करते हुए नहीं (बढ़ता) ॥ १०६ ॥ (३) नालमें चूम रहा पद्मिनीके हंस कठोर काँटों वालेमें, मुखको सुन्दर बोली वाला करता हुआ, चोंचसे अङ्गोंको टकराता हुआ ॥ ११० ॥ (२) वञ्चिता—यहाँ 'कुब्जा' शब्दके प्रयोगसे आपाततः असङ्गत अर्थ प्रतीत होता है : अप्सरा जैसी सुन्दर रमणी तो अच्छी न लगे, और कुबड़ी मन मोहे, यह भी कोई बात है ! इससे शङ्का होती है कि 'कुब्जा' शब्द अपने प्रसिद्ध अर्थ (कुबड़ी) से भिन्न किसी अर्थमें होगा । तब ध्यान जाता है कि कहीं 'कान्यकुब्ज' अपरनाम 'महोदया' नामक नगरीको, अथवा कान्यकुब्जकी किसी स्त्रीको, ही सत्यभामाको सत्या, भामा¹ आदि कहनेके समान पूर्वपद- लोप करके 'कुब्जा' शब्दसे तो नहीं कहा है : कान्यकुब्ज नगरी (राजधानी) अथवा कान्यकुब्ज देशकी स्त्रीका उपभोग करते हुए तुम्हें जैसे निरन्तर वर्ध- मान आनन्द मिलता है, वैसे अप्सरासदृश सुन्दर रमणियोंके भोगसे नहीं मिलता । राजाकी पत्नीके रूपमें पृथ्वी अथवा राजधानीकी कल्पना कवि- समयमें प्रसिद्ध है । इस प्रयोगमें कुब्जासे विवक्षित नगरीका अथवा कान्यकुब्ज की स्त्रीका अन्य नगरियोंसे या स्त्रियोंसे अतिशय व्यक्त होता है । यहाँ 'कुबड़ी' अर्थमें प्रसिद्ध 'कुब्जा' शब्दका प्रयोग विवक्षित 'कान्य- कुब्जा' (कन्नोज, अथवा कन्नौजिया स्त्री) के अर्थमें करके श्रोताको छला गया है, भुलावेमें डाला गया है । अविवक्षितार्थक 'कुब्जा' शब्दसे विवक्षितार्थ 'कान्यकुब्जा' को छुपानेके कारण यह अर्थगूढ प्रयोग व्यामोहकारी हो गया है ॥ १०६ ॥ (३) व्युत्क्रान्ता—प्रकृत (११०वें) श्लोकमें विवक्षित अन्वय है : वल्गु- रवं कुर्वन्, कर्कश-कण्टके दण्डे अङ्गानि घट्टयन्, हंसः तुण्डेन पद्मिन्या मुखं चुम्बति । पर श्लोकमें प्रदत्त पदविन्याससे व्यामोहकारी और ही अर्थ प्रकट १. सिद्धान्तकौमुदी, स्वाथिकाः, वार्तिक : विनाऽपि प्रत्ययं पूर्वोत्तरपदयोर्वा लोपो वाच्यः । देवदत्तो, दत्तो, देवः । सत्यभामा, भामा, सत्या ।
१४० काव्यादर्श [३।१११ (४) खातयः कनि काले ते स्फातयः स्फीत१-वल्गवः । चन्द्रे साक्षाद् भवन्त्यत्र वायवो२ मम चारिणः ॥ १११ ॥ (४) हे कन्ये (कनि), तुम्हारे आह्लादकारी चरणमें (काले) शोभायमान, मनोहरतामे बजते हुए अथवा चञ्चल घुँघरू (खातयः) अनुभवमें आ रहे हैं । इस स्थितिमें मेरी हवा अस्थिर हो (खिसक) रही है ॥ १११ ॥ होता है । इसका कारण पदोंका अतिव्यवहित प्रयोग है । इससे विवक्षित अर्थके अभिधानमें बाधा आती है ॥ ११० ॥ (४) प्रमथिता—'खातयः कनि, काले ते०' (१११) में 'ते', 'मम' और 'स्फीत' को छोड़कर शेष सभी शब्द दुर्बोधार्थक हैं : 'खातयः' पद 'खाति' पुं० प्रथमा, ब०व० है । यह शब्द प्रसिद्ध कोषोंमें उपलब्ध नहीं है, न प्रयोगमें ही है । अपितु 'खस्य आकाशस्यायं खः शब्दः, तस्य अतिः सततप्राप्तिर्येषु; ते खातयः' व्युत्पत्तिसे किङ्किणी, नूपुर, नेवर, घुँघरू घर्घरिका (भोज) अर्थमें कविको इष्ट है । कनि कन्यार्थक वैदिक 'कनी'३ का सम्बोधन ए०व० है । काले पद काल्यते क्षिप्यते इति कालः पदम्, तस्मिन् चरणे' अर्थमें है । यह दक्षिणकी चारों भाषाओंमें 'काल' या 'कालु' के रूपमें इस अर्थमें उपलब्ध है । संस्कृतमें इस अर्थमें प्रयुक्त नहीं है ।४ स्फातयः पद 'स्फायी ओप्यायी वृद्धौ' (भ्वादि०) १. यह रत्नश्रीसम्मत पाठ है । वादि, तरुण टीकाओंमें धृत व्याख्यात और सरस्वतीकण्ठाभरण १।१२८में उद्धृत श्लोकमें धृत और रत्नदर्पणमे व्याख्यात पाठ 'स्फाटं' है । २. रत्नश्री, सरस्वतीक०, रत्नदर्पणमें 'वायवो' है । वादीटीका और तरुण- टीकामें 'तायवो' धृत एवं व्याख्यात है । 'चारिणः' केवल रत्नश्रीमें है । अन्य पूर्वोक्त सब स्थलोंमें 'धारिणः' है । ३. 'पुनस्तदा बृहति यत् कनाया दुहितुरा अनुभृतमनर्वा' (ऋ० १०।६१।५) आदि (१०,११,२१) में 'कन्या' अर्थमें 'कना' का तथा 'जारः कनीनां, पतिर्जनीनाम्' (ऋ० १।६६।४), 'पतमकृणुतं कनीनाम्' (ऋ० १।११६ १०) आदि (ऋ०१।१५२।४, १६३।८; २।१५।७, ५।३।२) में 'कनी' का प्रयोग है । यह लौकिक संस्कृतमें प्रचलित नहीं है । 'कन्या' में धृत है । ४. 'कल गतौ सङ्ख्याने च' (चु०) 'नुदति, क्षिपतीत्येतावात्मने, कालयत्यपि' (आख्यातचन्द्रिका २।३।८६) से 'कर्मण्यण्' (अष्टा० ३।२।१) से निष्पन्न यह शब्द तेलुगुमे 'कालु', कन्नड, तमिल और मलयालममें 'काल' रूपमें 'चरण' अर्थमें प्रसिद्ध है । रत्नदर्पण : कालश्चरणः कर्णाटदेशभाषा- नुसारात् । 'कर्णाटदेश'से 'दक्षिण भारत' इष्ट है ।
३।११२] ४. प्रहेलिकाके भेदोंके उदाहरण १४१ (५) अत्रोद्याने मया दृष्टा वल्लरी¹ पञ्च-पल्लवा । पल्लवे-पल्लवे चार्द्रा यस्याः कुसुम-मञ्जरी ॥ ११२ ॥ (५) इस बगियामें देखी मैंने पाँचपतिया (एक) लतर पत्ते-पत्तेमें कुसुममञ्जरी है जिसके पानीदार ॥ ११२ ॥ से क्तिन्से निष्पन्न 'स्फीताः' पद 'वृद्धाः' अर्थमें निष्पन्न है ।² रत्नश्रीसे अन्यत्र उपलब्ध स्फार्ह शब्द टीकाकारोंके अनुसार 'मधुर', 'मनोहर' अर्थमें है ।³ पर प्रसिद्ध नहीं है । 'वल्गु' शब्द 'सुन्दर' अर्थमें तो प्रसिद्ध हैं, पर 'आवाज' अर्थमें प्रसिद्ध नहीं है । चन्द्र 'चन्द्रमा' अर्थमें रूढ है । पर यौगिक 'आह्लादक अर्थमें प्रसिद्ध नहीं है । घुँघरुओंकी मधुर ध्वनिका अनुभव श्रवणसे और स्फातिसे लभ्य आकारवृद्धिका अनुभव आँखसे होता है । इन दोनोंको इकट्ठे 'साक्षाद् भवन्ति'से प्रकट किया है । पर यह अभिव्यक्तिप्रकार प्रसिद्ध नहीं है । 'प्राण' अर्थमें 'वायु' का प्रयोग भी दुर्बोध है । तायु का प्रयोग तो और भी दुर्बोध है । चारिणः (√चर्+णिनि) का 'अस्थिर' अर्थमें प्रयोग तो उतना दुर्बोध नही है, पर रत्नश्रीतर स्थलोंमें धृन्-उद्धृत व्याख्यात धारिणः पद 'धृङ् अवस्थाने (तुदादि) के विपरीत है । यहाँ इस अर्थमें प्रयोग व्याख्यागम्य है : प्राणोंका स्वभाव सदा चलते रहना है; वे टिक गये हैं, अर्थात् चलना बन्द कर दिये हैं; इस प्रकार प्राण अस्थिर (अपने स्वभावसे विचलित) हो गये हैं । यह प्रक्रिया भी सुबोध नहीं है । इस प्रकारकी दुर्बोधार्थ पदावली श्रोताको सिर खुजानेको बाध्य करनेको पर्याप्त है । इस प्रकारकी पदावली यद्यपि रूढिच्युति दोषसे युक्त प्रतीत होती है । तथापि परव्यामोहन प्रयोजनमें तात्पर्य होनेसे यहाँ यह दोष नहीं, अपितु गुण बन जाती है⁴ ॥ १११ ॥ (५) समान-रूपा—'अत्रोद्याने मया दृष्टा०' (११२) में कविने ऐसे पदोंका प्रयोग किया है जिनके मुख्यार्थसे तो किसी लताका वर्णन है, पर विवक्षित १. तिरुहुति-सं० के मूलपाठमें तथा तरुणटीकामें 'मञ्जरी' पाठ है : अत्रो- द्याने पञ्चपल्लवा मञ्जरी किसलय-मञ्जरी दृष्टा । २. अमरकोष ३।२।६ : स्फातिर्वृद्धौ । ३. वादितीका : स्फार्हो मधुरः । रत्नदर्पण : मनोहरः । तरुणटीका : स्फा- र्हंवल्गवः स्फीतशब्दाः । ४. यत्तु रूढिच्युतत्वेन प्रोक्तमन्यार्थसञ्जितम् । प्रहेलिकादिषु प्रायो गुणत्वं तस्य युज्यते ॥ सरस्वती० १।६४
१४२ काव्यादर्श [३।११३ (६) सुराः सुरालये स्वैरं भ्रमन्ति दशनाचिषा । मज्जन्त इव मत्तास्ते सौरे सरसि सम्प्रति ॥ ११३ ॥ (६) शराब खींचने वाले वे अब मस्त हुए सुरामय तालाबमें दन्तकान्तिसे डूबतेसे मदिरागारमें स्वच्छन्दतासे घूमते हैं ॥ ११३ ॥ अर्थ उसके गौण आरोपसे किसी सुन्दरीकी भुजाका वर्णन है : इस (प्रकृत रमणीके शरीर रूपी) उद्यानमें मैंने पाँच (अंगुलीरूपी) कोंपलों वाली (भुजलता) देखी है। इसके प्रत्येक (अंगुलिरूपी) पल्लवमें स्निग्ध (पानीदार, चमकीली नखरूपी) कुसुम-मञ्जरी है। इस प्रकार समानरूप वाले गौणार्थक पदोंसे ग्रथित यह प्रहेलिका 'समान-रूपा' है । 'वल्लरी' शब्द अमरकोषके अनुसार 'मञ्जरी' अर्थमें है । सम्भवतः इसी कारण तरुणवाचस्पतिने 'वल्लरी' के स्थानमे 'मञ्जरी' पाठकी व्याख्या 'किसलय-मञ्जरी' की है । पर 'वल्लरी' का प्रयोग इसी √वल्ल् से निष्पन्न 'वल्ली' (बेल, लता) अर्थमें कवियोंने किया है ।१ यहाँ भी वही अर्थ अभिप्रेत है : मञ्जरीके पत्ते नहीं होते, किसलयोंपर मञ्जरीका आरोप विचित्र है; मञ्जरीमें पुनः कुसुममञ्जरी भी नहीं होती; 'लता'में यह सब सम्भव है । वादी जङ्घालदेवने वल्लरीसे नारीकी देहलता अर्थ लिया है । उस देहलताके 'दो हाथ, दो पाँव और अधरोष्ठ', ये पाँच पल्लव हैं । इनमें हाथ- पाँवकी अंगुलियाँ कुसुम हैं, उनके कान्तिमान् नख मञ्जरियाँ हैं । अधरोष्ठ कुसुमके दन्तप्रभा मञ्जरी है । रत्नश्रीज्ञानने भी 'वल्लरी'से 'स्त्री'को ही लिया है । पर 'पल्लव' से 'अंगुलियाँ' और 'कुसुममञ्जरी'से 'नख' लिये हैं । वादी जीकी व्याख्या अधिक मनोरम है ॥ ११२ ॥ (६) परुषा — 'सुराः सुरालये स्वैरं' (११३) में ओंठोंसे जाम लगाये मदमस्त सुराविक्रेताओंके अपने शराबखानेमें घूमनेका वर्णन लोकमें अप्रसिद्ध किन्तु व्याकरणकी लाठीसे हाँके हुए (शास्त्रमात्रसिद्ध सुरां कुर्वन्तीति सुराः, सुरा + णिच् + अच् सुराः, पुं०, प्र०, ब० व०,२ सुराया इदं सौरं, तस्मिन् सौरे) शब्दोंसे किया है । होंठोंसे लगाये जाममें दाँतोंकी परछाँई पड़ती है, तो लगता है जैसे वे उस जाममें डुबकी लगा रहे हैं ॥ ११३ ॥ १. तनुरभिलषितं क्लमच्छलेन व्यवृणुत वेल्लितबाहुवल्लरीका ॥ माघ ७।७२ २. 'तत्करोति, तदाचष्टे' (वार्तिक) से णिच् तथा 'नन्दि-ग्रहि-पचादिभ्यो ल्युणिन्यचः' (अष्टा० ३।१।१३४) से अच् होता है ।
३।११४] ४. प्रहेलिकाके भेदोंके उदाहरण १४३ (७) नासिक्य-मध्या, परितश्चतुर्वर्णविभूषिता । अस्ति काचित् पुरी यस्यामष्टवर्णाद्वया नृपाः ॥ ११४ ॥ (७) बीचमें नासिकासे उच्चरित वर्ण वाली, दोनों ओर चार (दो-दो) वर्णोंसे सुशोभित कोई नगरी है, जिसमें आठ वर्णोंसे युक्त नाम वाले राजा हैं ॥ ११४ ॥ (७) सङ्ख्याता — 'नासिक्यमध्या परितश्०' (११४) में किसी राजधानी का वर्णन उसके नाम और शासकोंके नामका निर्देश सङ्ख्या शब्दोंके प्रयोगसे करके किया है । तमिलनाडुकी नगरी काञ्ची है । इसके मध्यमें नासिक्य वर्ण 'ञ्' है । दोनों ओर मिलाकर चार वर्ण — ञ्' के पहले 'का' (क् + आ) और बादमें 'ची' (च् + ई) – हैं । इसके राजाओंके नाममें आठ वर्ण हैं । रत्नश्री- ज्ञान और तरुण वाचस्पतिने इससे 'पल्लवाः' (विसर्गसहित आठ वर्ण) का ग्रहण किया है । प्रेमचन्द्र तर्कवागीश तथा जीवानन्द विद्यासागरने 'पुण्ड्रक' वंशके राजाओंका ग्रहण किया है । उन्होंने 'पल्लवाः'में विसर्ग (प्रथमा- बहुवचनमें लभ्य) का वर्णोंमें ग्रहण इनके अयोग-वाह होनेसे नहीं किया है ।¹ इतिहासके अनुसार ४थीसे ६वीं शती तक काञ्ची पल्लवोंकी राजधानी रही है ।² रही बात अयोगवाहों ('अ' आदि स्वरोंके योग = सम्बन्धके वाहकों) को वर्ण माननेकी, शौनक और पाणिनिने अनुस्वार, विसर्ग, उसके भेदों जिह्वामूलीय, उपध्मानीयको वर्ण माना है ।³ पल्लवोंके लिये अष्टवर्णाः योगका प्रयोग सिंहविष्णु पल्लवके पुत्र 'मत्त- विलास', 'विचित्रचित्त' के नामोंसे भी प्रसिद्ध महेन्द्रवर्मा पल्लव (५६० ई० से ६३० ई०) के मामन्दूर शिलालेखमें भी मिलता है । अतः शब्दोपात्त तथा न्यायोपात्त होनेसे 'पल्लवाः' ही 'अष्टवर्णाद्वय नृप' हैं, 'पुण्ड्रक' नहीं । पुण्ड्रकोंका काञ्चीसे सम्बन्ध नहीं रहा है । वे तो प्राचीन कालमें प्रेमचन्द्र तर्क- बागीशके देश बंगालसे सम्बद्ध रहे हैं । यहाँ सङ्ख्याके प्रयोगसे व्यामोह उत्पन्न किया गया है । दण्डीके इस भेद १. प्रभा : तत्र 'पल्लवा' इत्यत्र वर्णगणनायां विसर्जनीयस्यायोगवाहत्वेन गणनमनुचितमिति तेषामभिप्रायः स्यात् । २. नीलकण्ठ शास्त्री, ए हिस्ट्री आफ साउथ इण्डिया, अष्टम अध्याय । ३. ऋक्प्रातिशाख्य १।६ : सर्वः शेषो व्यञ्जनान्येव । १।३८-३६ भी देखें । त्रिषष्टिश्चतुःषष्टिर्वा वर्णाः शम्भुमते मताः । पाणिनीयशिक्षा ३ अनुस्वारो विसर्गश्च ≍ क ≍ पौ चापि पराश्रितौ ॥ ५
१४४ काव्यादर्श [३।११५-११६ (८) गिरा स्खलन्त्या नम्रेण शिरसा दीनया दृशा । तिष्ठन्तमपि सोत्कम्पं वृद्धे, मां नानुकम्पसे ॥ ११५ ॥ (६) आदौ राजेत्यधीराक्षि, पार्थिवः कोऽपि गीयते । सनातनश्च, नैवासौ राजा, नैव सनातनः ॥ ११६ ॥ (८) लड़खड़ाती वाणीसे, झुके सिरसे, दीन दृष्टिसे, कँपकँपाते खड़े हुए भी मुझपर अरी बुढ़िया, तू कृपा क्यों नहीं करती ? ॥ ११५ ॥ (६) हे चञ्चल चितवन वाली, कोई पार्थिव आदिमें 'राजा' के रूपमें कहा जाता है, और सनातन भी (कहा जाता है) । (किन्तु) वह न ही 'राजा' है, न ही 'सनातन' है ॥ ११६ ॥ को उपलक्षक माना जा सकता है वर्णोंके स्थाननिर्देशसे व्यामोहकारी प्रहे- लिकाका¹ ॥ ११४ ॥ (८) प्रकल्पिता — प्रकृत उदाहरण (श्लोक ११५) में इस प्रकारसे कथन किया गया है कि उससे विवक्षित अर्थसे भिन्न अर्थका आभास होता है । विवक्षित अर्थ है : कोई दरिद्र अपनी दीन अवस्थाका वर्णन करता हुआ लक्ष्मीको (क) पुराण पुरुषोत्तमकी वधू² होनेसे वृद्धा, अथवा (ख) वृद्धि- स्वभावा होनेसे 'वृद्धा' शब्दसे अथवा (ग) 'वृद्धि' (समृद्धि) शब्दसे सम्बोधित करके उससे शिकायत करता है कि वह उसपर दया क्यों नहीं करती ? परन्तु इससे भिन्न अर्थ यह आभासित होता है कि कामका मारा कोई बुढऊ (छोकरा नहीं डोकरा) किसी बुढ़िया (छोकरी नहीं डोकरी) से प्रेमकी भिक्षा माँग रहा है । अतः यह प्रकल्पिता है ॥ ११५ ॥ (६) नामान्तरिता — प्रकृत (११६वें) श्लोकमें पार्थिवको पहले 'राजा' १. य एवादौ, स एवान्ते, मध्ये भवति मध्यमः । अस्यार्थं यो न जानाति, तन्मुखे तं ददाम्यहम् ॥ यहाँ 'जो ही आदिमें है, वही अन्तमें है, बीचमें बीच वाला है । जो इसका अर्थ नहीं जानता, उसके मुँहमें उसे देता हूँ ।' कथन व्यामोहकारी है । समाधान है : 'य' ही आदि में है, 'स' ही अन्तमें है, और 'एवादौ' तथा 'एवान्ते' के बीच वाला 'व' बीचमें है : यवस । जो इत्तीसी बात नहीं जानता, उस अज्ञानी पशुके मुँहमें मैं उसे ('यवस', 'घास') देता हूँ । २. पुंसः पुराणादाच्छिद्य श्रीस्त्वया परिभुज्यते । काव्यादर्श २।३४३
३।११७] ४. प्रहेलिकाके भेदोंके उदाहरण १४५ (१०) हृत-द्रव्यं जनं त्यक्त्वा धनवन्तं व्रजन्ति काः । नाना-भङ्गि-शताकृष्ट-लोका ? वेश्या न दुर्धराः ॥ ११७ ॥ (१०) नाना प्रकारके हाव-भावोंके सैकड़ों प्रकारोंसे लोगोंको आकृष्ट करने वाली कौन ले लिये गये द्रव्य (धन) वाले लोगोंको छोड़कर धनवान्के पास जाती हैं ? काबूमें आनेमें कठिन वेश्याएँ नहीं ॥ ११७ ॥
और 'सनातन' कहकर फिर उसका निषेध किया है। इससे श्रोताकी बुद्धि भ्रान्त हो जाती है। उसका समाधान निम्न प्रकारसे होगा : 'पार्थिव' से यहाँ 'पृथिवीपति' अर्थ अभिप्रेत नहीं है, अपितु 'वृक्ष' अभीष्ट है ।१ कोई वृक्ष ऐसा है, जो आरम्भमें तो 'राजा' है, और वह (स) नहीं (न) अतन ('तन' शब्दसे रहित) है (स न अतनः च न), अर्थात् 'अतन' है : राजन् + अतन = राजातन है । यह 'राजातन' वृक्ष है, न राजा (भूमिपति) है, और न 'सनातन' (नित्य) है। कोषोंके अनुसार क्षीरिका अपरनाम पियाल, खीरणी वृक्षको मीठे फलों के कारण राजभोग्य होनेसे 'राजादन' कहते हैं । दक्षिणकी भाषाओंमें वर्गोंके प्रथम तीन वर्ण एक-दूसरेके स्थानमें प्रयुक्त हो जाते हैं। अतः दक्षिणमें इसे 'राजातन' भी कहते हैं । यह वर्तनी संस्कृतमें भी स्वीकृत हो गई थी ।२ इसी 'राजातन' वृक्षके नाममें नाना अर्थोंकी विधि और निषेधके रूपमें कल्पना इस उक्तिमें की गई है। अतः यहाँ 'नामान्तरिता' प्रहेलिका है ॥ ११६ ॥ (१०) निभृता--प्रकृत ११७वें श्लोकमें कविने जो उक्ति प्रस्तुत की है, वह श्रोताको अर्थके कारण व्यामोहकारी है। क्योंकि इसमें आपाततः प्रतीत होने वाले वेश्याके धर्मोंके समान धर्म वाले पदार्थको छुपाकर कहा है । रत्नश्रीज्ञान, वादी जङ्घाल देव और तरुण वाचस्पतिने उक्त धर्मोंकी समानता श्रीसे मानी है : स्थावर, जङ्गम गज, रत्न, भूमि, धन-धान्य आदि नाना प्रकार वाली लक्ष्मी नष्ट-द्रव्य मनुष्यको छोड़कर धनवानको चली १. 'पार्थिव' की दो व्युत्पत्तियाँ हैं : (१) पृथिव्या विकारः, 'पृथिव्या वाञौ' (वार्तिक ४।१।८५); (२) पृथिव्या ईश्वरः, 'सर्वभूमि-पृथिवीभ्यामणञौ' (अष्टा० ५।१।४१), 'तस्येश्वरः' (४२)। पार्थिवो नृपतौ, भूमिविकारे पार्थिवोऽन्यवत् (विश्वकोष) । २. 'राजादनं प्रसरको राजातनः' इति वाचस्पतिः (अमरकोष २।४।३५ पर र(माश्रमी) ।
१४६ काव्यादर्श [३।११८-११९ (११) जित-प्रकृष्ट-केशाख्यो यस्तवाभूमि-साह्वयः । असौ मामुत्कमधिकं करोति कलभाषिणि ॥ ११८ ॥ (१२) शयनीये परावृत्य शयितौ कामिनौ रुषा । तथैव शयितौ रागात् स्वैरं मुखमचुम्बताम् ॥ ११९ ॥ (११) हे मधुवयनि, तुम्हारा जो प्रकृष्ट (उत्कृष्ट) केश नाम वालेको जीतने वाला है, तथा जो भूमिरहित नाम वाला है, वह मुझे बहुत उत्कण्ठा- युक्त (बेचैन करता है) ॥ ११८ ॥ (१२) क्रोधके कारण पलट करके (एक दूसरेकी ओर पीठ करके) सोये हुए प्रेम करने वाले दोनों उसी प्रकार सोये हुए वे स्वच्छन्दतासे मुँह चूमने लगे ॥ ११९ ॥ जाती हैं। वे अपनी नाना प्रकारकी वैभवमय भङ्गियों (भावों) से असङ्ख्य लोगोंको आकृष्ट करती हैं। पर उन्हें रोक पाना कठिन होता है। इस प्रकार श्री वेश्या नहीं हैं, किन्तु वेश्याके समानधर्मा हैं । इस अर्थमें क्लिष्ट कल्पना नहीं करनी पड़ती। प्रेमचन्द्र तर्कवागीश, रङ्गाचार्य रेड्डी, जीवानन्द विद्या- सागर और डा० धर्मेन्द्रकुमार गुप्त आदिने समाधान नदीपरक अर्थसे माना है : नाना प्रकारकी सैकड़ों लहरोंसे लोगोंको लील लेने वाली 'क' (जल) वाली, दुर्निवार (नदियाँ), द्रव्य (द्रु = वृक्षके विकार शाखा, तना आदि) का हरण कर लिये गये जनयुक्त मैदानी भूभागको छोड़कर धनवान् (रत्नाकर) के प्रति गमन करती हैं। इस व्याख्यामें क्लिष्टता अधिक है ॥ ११७ ॥ (११) समान-शब्दा—प्रकृत ११८वें श्लोकमें प्रसिद्ध 'प्रबाल' को 'प्र + बाल' में तोड़कर 'प्रकृष्ट (प्र) केश (बाल') से कल्पित पर्यायसे कहा है : जो प्रवाल (मूँगे अथवा कोंपल) से उत्कृष्ट है। 'भूमि' शब्द 'धरा' का पर्याय है। अतः 'अभूमि = अ-धर नाम वाला (अधरोष्ठ)' इस प्रकार, पर्याय- कल्पना की गई है। सुन्दरीके प्रवालके समान रक्तवर्ण अधरकी प्रशंसाको इस प्रकार कल्पित पर्यायके द्वारा घुमाफिराकर कहनेसे यहाँ समान-शब्दा प्रहेलिका है ॥ ११८ ॥ (१२) सम्मूढा—प्रकृत ११९वें श्लोकमें कविने 'उसी प्रकार सोये हुए प्रेमी-प्रेमिका मुँह चूमने लगे,' कहकर भी व्यामोहको बनाये रखा है : जैसे सोये हुए थे, वैसे ही सोये हुए वे मुँह कैसे चूम सकते हैं ? 'तथैव' का अर्थ है १. 'बवयोरभेदः' धारणाके कारण 'वाल = बाल' अभीष्ट है ।
३।१२०] ४. प्रहेलिकाके भेद १४७ (१३) विजितान्न-भव-द्वेषि-गुरु-पाद-हतो जनः । हिमापहामित्र-धरैर्व्याप्तं व्योमाऽभिनन्दति ? ॥ १२० ॥ (१३) पक्षी द्वारा जीते हुए अन्न (भक्षणीय पदार्थ) वालेसे जनमने वाले को द्वेष करने वालेके पाँवोंसे हत (लतियाया हुआ) आदमी बर्फको नष्ट करने वालेके शत्रुको धारण करने वालोंसे व्याप्त आकाशका अभिनन्दन करता है ॥ १२० ॥ 'वैसे ही' । श्लोकके पूर्वार्धमें 'शयितौ' की पूर्वक्रिया 'परावृत्य' दी है । 'तथैव' से 'परावृत्य' का ही परामर्श है : पीठफेरकर सोये हुओने जब वैसे ही (परा- वर्तन) किया, तो उनके मुँह अपने आप आमने-सामने हो गये, और राग के कारण स्वैर (आवेशपूर्ण) चुम्बन सम्भव हो गया । इस प्रकार यहाँ 'तथैव' से साक्षात् निर्देश होते हुए भी अर्थके विषयमें सम्मोह बना रहता है । अतः यह सम्मूढा प्रहेलिका है ।² शयितौ पद शीङ् स्वप्ने (अदादि०) से अकर्मक होनेके कारण कर्तृवाक्य में 'क्त' से निष्पन्न 'शयित' का एकशेष है : शयितश्च शयिता च ।³ कामिनौ —कामोऽनुरागोऽस्त्यस्येति कामी । कामी च कामिनी चेति कामिनौ (एक- शेष । १।१६ ॥ (१३) पारिहारिकी — प्रकृत १२०वें श्लोकमें 'ग्रीष्मके सूर्यकी किरणोंसे १. 'हिमापहा...व्योम' को भामहने 'अवाचकत्व' दोषके उदाहरणके रूपमें प्रस्तुत किया है । और भोजने समूचे श्लोकको 'क्लिष्ट' नामक पददोषके उदाहरणके रूपमें : 'हिमापहामित्रधरैर्व्याप्तं व्योमेत्यवाचकम् । साक्षाद्रूढं वाच्येऽर्थे नाभिधानं प्रतीयते ॥ काव्याल० १।४१ दूरे यस्र्यार्थसंवित्तिः क्लिष्टं नेष्टं हि तत् सताम् । सरस्वती० १।११ 'विजितात्म...नन्दति ।।' अत्र...व्यवहितार्थप्रत्ययं क्लिष्टमेतत् । २. दण्डीको इस भावकी प्रेरणा कदाचित् अमरुशतकके निम्न श्लोकसे मिली है : एकस्मिञ्शयने पराङ्मुखतया वीतोत्तरं ताम्यतो- रन्योन्यस्य हृदि स्थितेऽप्यनुनये संरक्षतोगौरवम् । दम्पत्योः शनकैरपाङ्गवलनामिश्रीभवच्चक्षुषोर् भग्नौ मानकलिः सहासरभसंव्यावृत्तकण्ठग्रहम् ॥ २१ ३. अष्टा० ३।४।७२ : गत्यर्थाकर्मक-श्लिष-शीङ्-स्थाऽऽस-वस-जन-रुह-जीर्यति- भ्यश्च । १।२।६४ : सरूपाणामेकशेष एकविभक्तौ । ६७ : पुमान् स्त्रिया ।
१४८ काव्यादर्श [३।१२० सन्तप्त मनुष्य मेघाच्छादित आकाशका अभिनन्दन करता है।' इस अर्थको ऐसे पदोंसे कहा है, जो सम्बन्धोंकी परम्परासे सूर्य और मेघोंका अभिधान करते हैं : वैदिक संहिताओंमें उल्लेख है कि श्येन (बाज) देवराज इन्द्रके लिये सोम लाता है ।१ इतिहास-पुराणमें इस कथाका रूप बदल गया : गरुड देवराज इन्द्रसे अमृतकलश जीत लाये२ । इसी कथाके आधारपर दण्डीने 'वि = पक्षीने जिसका अन्न जीत लिया है, वह 'वि-जितान्न = इन्द्र' कहा है। उससे भव = जन्म है अर्जुनका । उसका द्वेषी = शत्रु कर्ण है । उसका गुरु—पिता सूर्य है । इस प्रकार 'सूर्य' अर्थको नाना सम्बन्धोंके योगसे बताया है । इसी प्रकार हिम—बर्फका अपह विनाशक अग्नि है । उसका अमित्र—शत्रु जल है । धर उसे मेघ धारण करते हैं । इस तरह 'मेघैः' या 'जलधरैः' कहनेके लिये सम्बन्धोंकी लम्बी परम्पराका प्रयोग किया गया है । अतः वास्तविक सञ्ज्ञा- पदका परिहार करके व्यामोह करनेके कारण यहाँ 'पारिहारिकी' नामक प्रहे- लिका है ।। १२० ।। १. ऋ० ३।४३।७ : इन्द्र पिब वृषधूतस्य वृष्ण आ यं ते श्येन उशते जभार, ४।१८।१३: अधा मे श्येनो मध्वा जभार । २६।६ : ऋजीषी श्येनो ददमानो अंशुं पदावतः शकुनो मन्द्रं मदम् । सोमं भरद् दादृहाणो देवावान् दिवो अमुष्मादुत्तरादादाय ॥ २७।४ । ६।२०।६ : प्र श्येनो न मदिरमंशुमस्मै शिरो दासस्य नमुचेर्मथायन् । ८।८२।६ : यं ते श्येनः पदाभरत् तिरो रजांस्यस्पृतम् । पिबेदस्य त्वमीशिषे ।। काठकसं ३७।१४ में इन्द्र ही श्येन का रूप धारण करके शुष्ण नामक दानवके मुखसे अमृतको चुराकर लाये बताये हैं : असुरेषु तह्र्यं मृतमासीच्छुष्णे दानवे । तच्छुष्ण एवान्तरास्येऽ- बिभः ।...तस्येन्द्रः श्येनो भूत्वाऽऽस्यादमृतं निरमुष्णात् । २. वैदिक सुपर्ण और गरुत्मान् ऋग्वेदीय श्येनके ही पर्याय हैं । श्येन द्वारा सोमाहरणकी कथा ब्राह्मणोंमें सुपर्ण (गरुड) द्वारा सोमाहरणमें बदल गई थी : ऋजिप्य ईमिन्द्रावतो न भुज्युं श्येनो जभार बृहतो अधिष्णोः । अन्तः पतत् पतत्र्यस्य पर्णमध यामनि प्रसितस्य तद् वैः (ऋ० ४।२७।४) तुलना करें जैमिनीय ब्राह्मण १।३५५ : सोमं वै राजानं यत् सुपर्ण आज- हार । तस्य यत् पर्णमपतत्, स एव पर्णोऽभवत् । महाभारत आदिपर्व ३०।४०-४४ तथा ३२-३३ अध्याय देखें ।' समुत्पाटामृतं तत्र वैनतेयस्ततो बली । उत्पपात जवेनैव यन्त्रमुन्मथ्य वीर्यवान् ।। आदिपर्व ३३।१०
३।१२१-१२२] ४. प्रहेलिकाके भेद १४६ (१४) न स्पृशत्यायुधं जातु, न स्त्रीणां स्तन-मण्डलम् । अमनुष्यस्य कस्यापि हस्तोऽयं न किलाफलः ॥ १२१ ॥ (१५) केन कः कस्य सम्भूय, सर्वकार्येषु सन्निधिम् । लब्ध्वा, भोजन-काले तु यदि दृष्टो, निरस्यते ॥ १२२ ॥ (१४) न छूता शस्त्र कभी यह, न रमणीका स्तन-मण्डल (छूता है) । मानवसे अन्य किसी का हाथ यह, नहीं प्रसिद्ध है निष्फल ॥ १२१ ॥ (१५) किसके साथ कौन किसका मिलकर, सब कार्योंमें उपस्थिति पाकर (भी) अगर भोजनके समय दिख जाये, तो हटाया जाता है ? ॥ १२२ ॥ (१४) एकच्छन्ना—१२१वें श्लोकमें किसी वस्तुके हाथका तो वर्णन किया है, पर वह किसका है, यह छुपाया गया है। मनुष्यके हाथकी तीन ही सार्थकतायें हैं : (१) शूरवीर पुरुषका हाथ शस्त्र धारण करता है, (२) कामी पुरुषका हाथ कामिनी-कुच-मर्दनमें सार्थकता पाता है, और (३) दानीका हाथ दानमें । किसी पदार्थका यह हाथ इन तीनों ही गुणोंसे विधुर है, किंतु निष्फल नहीं है । ऐसा यह हाथ किसका है ? यह प्रश्न अनुत्तरित ही है । इस प्रकार (एक आश्रय, हस्तवान् ) का गोपन करनेसे यह एकच्छन्ना है । समाधान यह है : एरण्डको ‘गन्धर्व’ नामक मृगविशेषके हाथके समान आकार वाले पत्तोंसे युक्त होनेके कारण ‘गन्धर्व-हस्तक’ कहते हैं १। एरण्ड मनुष्येतर होनेसे अमनुष्य है । उसका हाथ (पत्र) आयुधस्पर्श, कामिनी-कुच-मण्डल-स्पर्श, दान नहीं करता । किंतु अतः इसमें फल होते हैं । अतः यह अफल नहीं है ॥ १२१ ॥ (१५) उभयच्छन्ना—१२२वें श्लोकमें किसी पदार्थके कार्योंका तो वर्णन किया है, पर वह क्या है, कहाँ, किसके आश्रित है, ये आश्रय और आश्रयी दोनों बातें छुपाई गई हैं । अतः उभयच्छन्ना पहेली है । समाधान यह है : क (शिर)२ के साथ (आश्रयाश्रयि भावसे) सम्बद्ध होकर स्थित ईश (विधाता) अर्थात् केश है । यह स्नान आदि सब माङ्गलिक और अमाङ्गलिक कार्योंमें वर्धन वपन आदिके रूपमें सन्निधि (विशिष्ट स्थान) पाता है । किन्तु भोजन के समय अगर एक भी बाल दिखलायी देता है, तो अमेध्य तथा अरुचिकर होनेके कारण उसे हटाना पड़ता है ॥ १२२ ॥ १. अमरकोष २।४।५०-५१ : अथ व्याघ्रपुच्छ-गन्धर्वहस्तकौ ॥ एरण्ड उरुबूकश्च । रामाश्रमी : गन्धर्वस्य मृगभेदस्य हस्त इव पत्रमस्य । २. अमर० ३।३।५ : मारुते वेधसि ब्रध्ने पुंसि कः, कं शिरोऽम्बुनोः ।
१५० काव्यादर्श [३।१२३-१२४ (१६) सहया सगजा सेना सभटेयं न चेज्जिता । अमातृकोऽयं मूढः स्यादक्षरज्ञस्तु नः सुतः ॥ १२३ ॥ सा नामान्तरिता-मिश्र-वञ्चिता-रूप-योगिनी । एवमेवेतरासामप्युन्नेयः सङ्कर-क्रमः ॥ १२४ ॥ (१६) घोड़ों सहित, गजों सहित, सैनिकों वाली यह सेना अगर नहीं विजय की, बिना माँ वाला यह मोहग्रस्त हो जाये, किन्तु जो अक्षरोंको जानने वाला (पढ़ा-लिखा) है, वह हमारा बेटा हो जाये ।। १२३ ।। वह उपर्युक्त प्रहेलिका (६)नामान्तरितासे मिली हुई (२)वञ्चिताके रूप (लक्षण)के योग वाली सङ्कीर्ण है । इसी प्रकार अन्य प्रहेलिकाओंके भी मिश्रण का प्रकार समझ लेना चाहिये ।। १२५ ।। (१६) सङ्कीर्णा—प्रकृत श्लोकमें चतुरङ्गिणी सेनाके तीन अङ्गों अश्व, गज, पत्ति (पैदल) का कथन करके इसे न जीत पाने वालेको अमातृक (बिना माँका) तथा मूढ बताया है । जो अक्षरोंका जानकार है, उसे कविका प्रिय पुत्र बताया है । यह कथन व्यामोहकारी है । इसका समाधान यह है : ह, य, ग, ज, इ, न, स, भ, ट, आ तथा अनुस्वार वर्णोंसे युक्त वर्णमाला१ (मातृका) अगर जीती नहीं है, उसका सम्यक् ज्ञान नहीं प्राप्त किया है, तो वह अमातृक = मातृका—(वर्णमाला)से रहित मनुष्य मूढ होता है । किन्तु जो अक्षरों (वर्णों) को जानता है, वह हमें बेटेके समान प्रिय है । इस उदाहरणकी सङ्गति अगले श्लोकमें की है ।। १२३ ।। सङ्कीर्ण प्रहेलिकाकी सङ्गति —यहाँ ‘अमातृकः’ नामपदमें (१) ‘न विद्यते माता यस्य, स’, (२) ‘न विद्यते मातृका वर्णमाला यस्य, सः’ के रूपमें नाना अर्थोंकी कल्पना तो है ही, ‘मातृका’ शब्द वर्णमाला अर्थमें निरूढ है और ‘माँ’ अर्थमें निगूढ है । हय, गज, सेना, भट शब्द अन्य अर्थोंमें रूढ हैं, किन्तु उनकी अन्य अर्थमें कल्पना करके श्रोताका प्रतारण किया गया है । नाममें अन्यार्थ- कल्पना तथा अन्यत्र रूढका अन्य अर्थमें प्रयोग एक दूसरेपर आधारित है : अन्यार्थकल्पना अङ्ग है, वञ्चना मुख्य है—अन्यार्थकल्पनाके द्वारा रूढसे अन्य अर्थमें प्रयोग किया गया है । अतः (६) नामान्तरितासे मिली हुई (२) वञ्चिताके रूपसे योग (सम्बन्ध) है । इस लिये यह सङ्कीर्ण है । १. इस उक्तिमें ग, ज, ट, न, भ वर्ण स्पर्शोंके पाँच वर्गोंके, य अन्तस्थोंका, स, ह ऊष्मोंके एवम् आ और इ स्वरोंके तथा अनुस्वार अयोग-वाहोंका प्रतिनिधि हैं ।
३।१२४] पाठपर विचार १५१ इसी प्रकार अन्य भेदोंका भी परस्पर मिश्रण हो सकता है । सुधीजन उन्हें प्रयोगोंमें स्वयम् अभ्यूहित करें । रत्नश्रीज्ञानने (१) समागता और (३) व्युत्क्रान्ताका, (५) समानरूपा और (११) समान-शब्दाका तथा (१३) पारिहारिकी और (८) प्रकल्पिताका सङ्कीर्ण भेद उदाहरणसे प्रस्तुत किया है ।¹ दोसे अधिक प्रहेलिकाओंका भी सङ्कर इस कथनसे उपलक्षित है । तिरुपतिसंस्करण तथा रेड्डीसंस्करणमें यहां कुछ श्लोक और दिये हैं, जिनसे तृतीय परिच्छेदकी समाप्ति तथा चतुर्थका आरम्भ सूचित होता है । तिरुपतिसंस्करणमें तो तीसरा और चौथा परिच्छेद पृथक्-पृथक् दिये भी हैं । किन्तु तीनों प्राचीन टीकाओंमें इन श्लोकोंके अस्तित्वसे परिचयका कोई चिह्न नहीं है । तरुणवाचस्पतिने प्रहेलिकाका उपसंहार १२४वें श्लोकपर बताया है । ये उपर्युक्त श्लोक यहां उन्हें उपलब्ध रहे होते, तो प्रहेलिकाके उपसंहार की उत्थानिका उन श्लोकोंके पूर्व दी होती । चतुर्थ परिच्छेदका प्रारम्भ भी पूर्व परिच्छेदोंकी शैलीमें ही वादीजीने मङ्गलाचरणसे, और तरुणवाचस्पतिजीने पूर्वापरसम्बन्धकथनके द्वारा किया होता । इससे प्रकट होता है कि तृतीय परिच्छेदकी समाप्ति के तथा चतुर्थके प्रारम्भके सूचक ये श्लोक इन लोगोंके समय तक काव्यादर्शका अंश नहीं बन पाये थे । कालान्तरमें प्रक्षिप्त हुए हैं । अतः काव्यादर्शके उपलब्ध अंशमें तीन परिच्छेद ही प्रमाणिक हैं । चार परिच्छेदोंमें विभाजन प्रामाणिक नहीं है । ३।१७१ में उक्त ‘कलापरिच्छेद’को आचार्य रत्नश्रीज्ञानने ‘चतुर्थः कला- परिच्छेदोऽस्य दण्डिनोऽस्ति । स त्विह न प्रवर्तते ।’ कहा है । इससे यह स्पष्ट है कि ग्रन्थका प्रकृत परिच्छेद सारा एक ही है । तृतीय-चतुर्थमें विभाजित नहीं है । ‘कलापरिच्छेद’ पर विचार उक्त स्थलमें देखें ।। १२४ ।। १. सुराप्रयोगे प्रसृता विप्राः शूद्रान्नभोजिनः । आम्नायाध्ययनं त्यक्त्वा युध्यन्तः पाप(माश्रिताः) ।। समागता-व्युत्क्रान्तयोः संकरः । विशालेऽत्र गिरौ दृष्टो गिरिनं सक्तनिर्झरः । यश्चार्क(पिशितासा)ख्यो दोलायेत प्रतिक्षणम् ।। समानरूपा-समान- शब्दयोरयं संकरः । लक्ष्मीधरपतेः कान्तं गता गङ्गाधराङ्गना । चन्द्रा(धारे) परीतापः कुतोऽयं मे तवोदये ।। पारिहारिकी-प्रकल्पितयोः संकरः ।
१५२ काव्यादर्श [३।१२५ अपार्थं¹ 'व्यर्थमेकार्थं² ⁴ससंशयमपक्रमम्³ । शब्दहीनं⁵ यतिभ्रष्टं⁶ भिन्नवृत्तं⁷ विसन्धिकम्⁸ । १२५ ॥ (१) अपार्थ, (२) व्यर्थ, (३) एकार्थ, (४) ससंशय, (५) अपक्रम, (६) शब्दहीन, (७) यतिभ्रष्ट, (८) भिन्नवृत्त, (६) विसन्धिक ॥ १२५ ॥ पकारस्य व्ययादेस्तु¹ मासस्यान्त्ये दले गुरौ । द्वादश्यां धनुषि ग्लावि प्रबोधिताः प्रहेलिकाः ॥ १ ॥ अनभ्रं² रचायप्संस्पृष्टं नभ एतदपर्तुकम् । न भाति रमणीचक्षुरकज्जलं यथोज्ज्वलम् ॥ २ ॥ षष्ठेऽह्न्यस्मिन्नगस्त्यस्य, तद्विगुणे नभः सुदि । सायाह्ने ख्यातुमारप्स्ये दश दोषान् बुधोदितान् ॥ १ ॥ दोषाकरस्तु चन्द्रोऽयं, दोषज्ञो धिषणो गुरुः । दोषैषा क्षणदा रम्या, वन्द्यो दोषो बुधादृतः ॥ २ ॥ अर्धनारीस्तनं पातुं कलयन्तौ सुतावुभौ । स्नपयन्ती गणेश्कन्दौ स्निग्धलोचनकान्तिभिः ॥ ३ ॥ अनुजे पक्षपातस्य शङ्कयाऽरुणितेक्षणम् । आमृशन्ती षडास्यं सा स्नेहाद्व्याद्युमा तु माम् ॥ ४ ॥ दोष : आचार्य दण्डीने काव्यादर्शका प्रारम्भ ही दोषोंकी हेयता बतानेसे किया था, यह प्रथम परिच्छेदके ६-८ श्लोकोंमें देख चुके हैं । गुणप्रकरणमें भी हम देख चुके हैं कि काव्यमें गुणवत्ता कई दोषोंके विपर्ययके फलस्वरूप ही आ पाती है । गुणत्वविघातक दोषोंका प्रतिपादन गुणप्रकरणमें आचार्य कर चुके हैं । वे दोष मार्गविशेषमें ही दोष हैं । दूसरे मार्गमें वही गुण हो जाते हैं । अतः उन विशेष दोषोंका निरूपण आचार्यने मार्गविभागके प्रकरण में किया है । द्वितीय परिच्छेदमें सर्वमार्गसाधारण शोभाकारक तत्त्वों उपमादि अर्थालङ्कारोंका निरूपण आचार्यने किया है । फिर तृतीय परिच्छेद में सुकर दुष्कर शब्दालङ्कारों यमक, चित्रबन्धों वर्णस्थाननियम तथा उभया- १. ज्योतिषमें पूर्व भावको अगले भावका 'व्यय' कहा जाता है । वर्णमाला में 'प' वर्णसे पूर्ववर्ण 'न' है । वह आदिमें है 'नभस्' शब्द के, जो श्रावण का वाचक है : श्रावणे तु स्यान्नभाः श्रावणिकश्च सः (अमरकोष १।४।१६) । नभः खं श्रावणो नभाः । श्रावण सुदि द्वादशी समाप्ति- तिथि है ।
३।१२६] ५. दोष : भरत-समस्त दस दोष १५३ देश-काल-कला-लोक-न्यायागम-विरोधि च । इति दोषा दशैवैते वर्ज्याः काव्येषु सूरिभिः ॥ १२६ ॥ (१०क) देश, (ख) काल, (ग) कला, (घ) लोक, (ङ) न्याय एवम् (च) शास्त्रसे विरोध रखना । ये दोष दस ही हैं । काव्योंमें बुद्धिमानोंको इनका परिहार करना चाहिये ।। १२५-१२६ ।। लङ्कारत्वकी ओर उन्मुख दुष्कर प्रहेलिकाका निरूपण करके काव्यमें, शोभा- कारक धर्मोंका निरूपण समाप्त किया है । अब शेष रह जाता है सर्वमार्ग- साधारण दोषोंका विवेचन । इसे आचार्यने तृतीय परिच्छेदके शेष भागमें (क) उद्देश (१२५-१२८) और (लक्षण १२८-१७८) की प्रक्रियासे करनेके बाद (ख) दोष की भी कुछ परिस्थितियोंमें गुणरूपता (१७६-१८५ में) बताकर (ग) काव्यादर्शके विषयका सिंहावलोकन (१८६-१८७ श्लोकोंमें) करके प्रकृत का उपसंहार किया है । 'दोष'के स्वरूपपर विचार मार्गविभागके प्रसङ्गमें प्रथम परिच्छेदमें ((पृष्ठ १०३, १०४, ११०, १२६-१३३, १३८-१४१ में) किया जा चुका है । अतः यहां पुनर्वचन अपेक्षित नहीं है । आचार्य भरतने निम्नलिखित दस काव्य-दोष बताये हैं : (१) गूढार्थ, (२) अर्थान्तर, (३) अर्थहीन, (४) भिन्नार्थ, (५) एकार्थ, (६) अभिप्लुतार्थ, (७) न्यायापेत, (८) विषम, (६) विसन्धि तथा (१०) शब्दच्युत ।१ इनमें से कुछ दोष परवर्ती आचार्योंने लिये हैं, कुछ नहीं । इसका निरूपण आगे किया जायेगा । (१) गूढार्थ दोष पर्याय (कल्पित) शब्दोंसे अभिधान करके रूढ शब्दको छुपानेसे होता है । दण्डी द्वारा प्रोक्त (१०) समानशब्दा प्रहेलिकामें यह दोष अर्थगूढताकी विवक्षाके कारण गुण (अलङ्कार) हो जाता है । दोष नहीं रहता । अन्यत्र दोष ही रहेगा । इसका प्रयोग प्रहेलिकामें हो चुका है, इस लिए आचार्य दण्डीने इसकी गणना दोषोंके इस प्रकरणमें नहीं की है । (२) अर्थान्तर दोष अवर्ण्य (अविवक्षित) का भी वर्णन होनेसे होता है ।२ दण्डीका ससंशय इसीके निकट का दोष है । (३) अर्थहीन दोष असम्बद्ध अथवा १. गूढार्थमर्थान्तरमर्थहीनं भिन्नार्थमेकार्थमभिप्लुतार्थम् । न्यायादपेतं विषमं विसन्धि शब्दच्युतं वै दश काव्यदोषाः ॥ ना०१६।८६ २. (१) पर्यायशब्दाभिहितं गूढार्थमभिसञ्जितम् । (२) अवर्ण्यं वर्ण्यते यत्र तदर्थान्तरमिष्यते ॥ नाटय० १६।६०
सावशेष (अपूर्ण) अर्थका अभिधान होता है । दण्डीका (१) अपार्थ इसीसे मिलता-जुलता दोष है । (४) भिन्नार्थ दोष भरतने दो प्रकारका बताया है : (क) असभ्य अथवा ग्राम्य ढंगसे अभिधानसे होता है । आचार्य दण्डी इसे सर्वमार्गसाधारण ग्राम्यताके नामसे प्रथम परिच्छेद (१।२६-१३३) में दे चुके हैं । (ख) विवक्षित अन्य अर्थका अन्य अर्थसे भेद न करना भी भिन्नार्थ दोष होता है ।¹ दण्डीका व्यर्थ एवं संशय इससे मिलता-जुलता दोष प्रतीत होता है । (५) एकार्थ दोष एक ही अर्थको पुनः कहनेसे होता है । दण्डीने इसे इसी नामसे दिया है । (६) अभिप्लुतार्थ दोष वहाँ होता है, जहाँ चारों पादोंके अर्थ वहीं सिमट जाएँ, इनमें परस्परसम्बन्ध न हो ।² दण्डीने इसे 'अपेतार्थ' नाम दिया है । (७) न्यायापेत दोष वहाँ होता है, जब कोई बात प्रत्यक्षादि प्रमाणोंके विपरीत कही जाये । दण्डीने इस दोषके छह अवान्तर भेद बताये हैं । (८) विषम वहाँ होता है, जहाँ छन्दमें कोई त्रुटि आ जाती है ।³ दण्डीने इसे दो दोषोंमें बाँटा है : (७) यतिभ्रष्ट, (८) भिन्नवृत्त । (६) विसन्धि दोष शब्दोंका उपश्लेषण (सन्धि) न होनेपर (सन्धियोग्य स्थलमें सन्धिभङ्ग होनेपर) होता है ।⁴ दण्डीने इसे दिया है । (१०) शब्दहीन दोष शब्दशास्त्रमें अप्रसिद्ध पदोंके प्रयोगसे होता है ।⁵ दण्डीने इसे भी दिया है । सन्धि शब्दशास्त्रका ही विषय है । अतः (६) विसन्धिका समावेश (१०) शब्दहीनमें ही उचित है । आचार्य अभिनवगुप्तने इस स्थलमें यह विचार किया है : (क) कुछ दोष नित्य हैं, जैसे अपशब्द; (ख) कुछ अनित्य हैं, जैसे ग्राम्य; हास्यादिमें वह इष्टतम होता है । इनमेंसे उत्तरोत्तर स्थूल हैं । जैसे गूढार्थ दोष गूढलेख, प्रहेलिका, पताकास्थानक आदिमें प्रयोज्य हैं; अर्थान्तर अनुवादमें, अर्थहीनादि
१. (३) अर्थहीनं त्वसम्बद्धं सावशेषार्थमेव च । (४) (क) भिन्नार्थमभिविज्ञेयमसम्यं ग्राम्यमेव च ।। नाट्य० १६।६० (ख) विवक्षितोऽन्य एवार्थो यत्रान्यार्थेन भिद्यते । भिन्नार्थं तदपि प्राहुः काव्यं काव्य-विचक्षणाः ।। ६१ २. (५) अविशेषाभिधानं यत् तदेकार्थमिति स्मृतम् । (६) अभिप्लुतार्थं विज्ञयं यत् पादेन समस्यते ।। नाट्य० १६।६२ ३. (७) न्यायादपेतं विज्ञेयं प्रमाणपरिवर्जितम् । (८) वृत्तभेदो भवेद् यत्र, विषमं नाम तद् भवेत् ।। नाट्य० १६।६३ ४. (६) अनुपश्लिष्टशब्दं यत् तद्विसन्धीति कीर्तितम् । (१०) शब्दहीनं च विज्ञेयमशब्दस्य च योजनात् ।। नाट्य० १६।६४
३।२७] ५. (११) प्रतिज्ञादिहानि दोषपर विचार १५५ "प्रतिज्ञा-हेतु दृष्टान्त हानिर्दोषो न, वेत्यसौ । विचारः कर्कशप्रायस्, तेनालीढेन किं फलम् ॥ १२७ ॥ (११) प्रतिज्ञा, हेतु (लिङ्ग) और दृष्टान्त (उदाहरण)की हानि (त्रुटि) दोष नहीं है, या है, इस प्रकारका यह विचार अधिकतासे कर्कश है। उसे चाटनेसे क्या लाभ ? ॥ १२७ ॥ हास्यमें; भिन्नार्थ जब श्रोता आदि वक्ता हों, तब; एकार्थ दूसरोंको अर्थबोध करानेमें, अभिप्लुतार्थ उन्मादादिमें, भिन्नवृत्त और विसन्धि अपने विषयमें प्रयोग करनेपर दोष नहीं रहते । अपशब्द सभी स्थितियोंमें दोष ही होता है । क्योंकि उससे कोई अर्थप्रतीति नहीं होती ॥ १२५-१२६ ॥ भरतके पश्चात्के काव्यलक्षणकार दस दोषोंके अतिरिक्त न्यायशास्त्रके अनुमिति प्रमाणके आवश्यक तीन अवयवों प्रतिज्ञा, हेतु एवम् दृष्टान्तमें उनके लक्षणकी सङ्गति पूरी तरह न होनेपर प्रतिज्ञाभास, हेत्वाभास एवं दृष्टान्ता- भासको काव्यमें भी दोष मानकर अपने ग्रन्थोंमें इनका निरूपण करना उचित मानते थे । प्रथमतः तो न्यायशास्त्रके इन दोषोंका स्वरूप समझना तर्ककर्कश है । कोमलमत्ति काव्यप्रेमियोंको वह उद्वेजक होगा । दूसरे, न्यायशास्त्रमें वह दोष है, तो काव्यमें वह दोष होगा, कि नहीं, इसपर भी मतभेद हो सकता है । अतः उस कर्कश तर्कदोषको यहाँ काव्यलक्षणके अध्येता मन मारकर आलेहन करें, तो इससे लाभ क्या ? कितनी तो परिस्थितियाँ काव्यमें उस दोषकी होंगी कि उसके ज्ञानके लिये बोझिल, कर्कश विषयका समावेश काव्य- लक्षणमें किया जाये ! अतः उसके निरूपणका क्षेत्र काव्यशास्त्र नहीं है । काव्यमें तो किस विषयका ज्ञान अपेक्षित नहीं होता ? काव्यलक्षण ग्रन्थमें उन सबका समाहार न सम्भव है, न अपेक्षित है और न उचित है । तत्तत् शास्त्रसे ही उसे प्राप्त करना उचित है । रोगीको कड़वी औषध मधुमें लपेटकर चटाई जाती है । पर न कवि रोगी है और न प्रतिज्ञाहान्यादिदोष कड़वी औषध है कि उसे चाटना आवश्यक हो । इस दोषका निरूपण भरतने नहीं किया है । पर इसका समावेश उनके न्यायापेतमें हो सकता है : न्यायसे लोकका स्वभावसिद्ध मार्ग भी अभीष्ट होता है, तो शास्त्र भी । वस्तुतः दण्डीका दसवाँ दोष देश, काल, कला, लोक, न्याय और आगमका विरोध भरतके न्यायापेतका ही विवरण है । यही कारण है कि उन्होंने उन्हें एक ही दोषके अवान्तर भेद माना है । इसीलिये उन्होंने (१२६ में) 'दशैव' ('दस ही') कहा है ।
१५६ काव्यादर्श [३।१२७ भामहके दोषनिरूपणमें दण्डीसे भेद केवल प्रतिज्ञादिहानि दोषको लेकर है । अन्यथा दोनों आचार्योंका शब्दविन्यास एक ही है ।१ ग्यारहवें दोषके बारेमें भामहका कहना है कि स्वादु काव्यरसमें मिले हुए शास्त्रका उपयोग भी कवि लोग कर दिया करते हैं : पहले मधु चाटे हुए रोगी कड़वी दवा पी लेते हैं । अतः काव्यशास्त्रमें अल्पबुद्धियोंको दुर्बोध होते हुए भी शास्त्रसम्मत पदार्थोंका सही स्वरूप और उसके दोष जानना अपेक्षित है ।२ भामहने इन दोषोंके ज्ञानके लिये अपेक्षित पदार्थका सङ्क्षिप्त शास्त्रीय विवेचन करनेके बाद उसके काव्यमें अपेक्षित स्वरूप और प्रतिज्ञाभास, हेत्वाभास एवं दृष्टान्ताभास दोषोंका निरूपण ५।३३-६० में किया है ।३ पूर्ववर्ती दस दोषोंका विवेचन काव्यालङ्कारके चतुर्थ अध्यायमें किया है । यहाँ दण्डीने भामहके ग्यारहवें दोषका खण्डन किया है, या भामहने ही दण्डीके निरूपणका उत्तर देनेको इतने विस्तारमें जाकर इन दोषोंको काव्य- शास्त्रमें उपयोगिता सिद्ध की है तथा पञ्चम अध्यायमें पृथक्से इस दोषका निरूपण किया है, यह बहुत स्पष्ट नहीं है । इनमेंसे एकने दूसरेका खण्डन १. अपार्थं...विरोधि च । प्रतिज्ञाहेतुदृष्टान्तहीनं दुष्टं च नेष्यते ॥ ४।१-२ २. प्रायेण दुर्बोधतया शास्त्राद् विभ्यत्यमेधसः । तदुपच्छन्दनायैष हेतुन्यायलवोच्चयः ॥ २ स्वादुकाव्यरसोन्मिश्रं शास्त्रमप्युपयुज्यते । प्रथमालीढमधवः पिबन्ति कटु भेषजम् ॥ ३ न स शब्दो, न तद् वाच्यं, न स न्यायो, न सा कला । जायते यन्न काव्याङ्गमहो भारो महान् कवेः ॥ ४ तुलनीय : न तच्छ्रुतं, न तच्छिल्पं, न सा विद्या, न सा कला । न स भोगो, न तत्कर्म यन्नाट्येऽस्मिन्न दृश्यते ॥ नाटच० १।११६ या विद्या, यानि शिल्पानि, या गतिर्, यच्च चेष्टितम् । लोकालोकस्य जगतस्तदस्मिन्नाटकाश्रये ॥ नाटच० ५।५६ नाट्यशास्त्र ७।६३; ८।३६; १३।६६-६७, ७४ भी देखें । ३. लक्ष्म प्रयोगदोषाणां भेदेनानेन वर्त्मना । सन्धाऽऽदिसाधनासिद्धं शास्त्रे तूदितमन्यथा ॥ काव्याल० ५।३२ तज्ज्ञैः काव्यप्रयोगेषु तत् प्रादुष्कृतमन्यथा । तत्र लोकाश्रयं काव्यमागमस्तत्त्वदर्शिनः ॥ ३३