भारतकोश
काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary

महाकवि दण्डी द्वारा

DevanagariHindipublished270 पृष्ठ

पृष्ठ 179, कुल 270 में से

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पृष्ठ 179

१५६ काव्यादर्श [३।१२७ भामहके दोषनिरूपणमें दण्डीसे भेद केवल प्रतिज्ञादिहानि दोषको लेकर है । अन्यथा दोनों आचार्योंका शब्दविन्यास एक ही है ।१ ग्यारहवें दोषके बारेमें भामहका कहना है कि स्वादु काव्यरसमें मिले हुए शास्त्रका उपयोग भी कवि लोग कर दिया करते हैं : पहले मधु चाटे हुए रोगी कड़वी दवा पी लेते हैं । अतः काव्यशास्त्रमें अल्पबुद्धियोंको दुर्बोध होते हुए भी शास्त्रसम्मत पदार्थोंका सही स्वरूप और उसके दोष जानना अपेक्षित है ।२ भामहने इन दोषोंके ज्ञानके लिये अपेक्षित पदार्थका सङ्क्षिप्त शास्त्रीय विवेचन करनेके बाद उसके काव्यमें अपेक्षित स्वरूप और प्रतिज्ञाभास, हेत्वाभास एवं दृष्टान्ताभास दोषोंका निरूपण ५।३३-६० में किया है ।३ पूर्ववर्ती दस दोषोंका विवेचन काव्यालङ्कारके चतुर्थ अध्यायमें किया है । यहाँ दण्डीने भामहके ग्यारहवें दोषका खण्डन किया है, या भामहने ही दण्डीके निरूपणका उत्तर देनेको इतने विस्तारमें जाकर इन दोषोंको काव्य- शास्त्रमें उपयोगिता सिद्ध की है तथा पञ्चम अध्यायमें पृथक्से इस दोषका निरूपण किया है, यह बहुत स्पष्ट नहीं है । इनमेंसे एकने दूसरेका खण्डन १. अपार्थं...विरोधि च । प्रतिज्ञाहेतुदृष्टान्तहीनं दुष्टं च नेष्यते ॥ ४।१-२ २. प्रायेण दुर्बोधतया शास्त्राद् विभ्यत्यमेधसः । तदुपच्छन्दनायैष हेतुन्यायलवोच्चयः ॥ २ स्वादुकाव्यरसोन्मिश्रं शास्त्रमप्युपयुज्यते । प्रथमालीढमधवः पिबन्ति कटु भेषजम् ॥ ३ न स शब्दो, न तद् वाच्यं, न स न्यायो, न सा कला । जायते यन्न काव्याङ्गमहो भारो महान् कवेः ॥ ४ तुलनीय : न तच्छ्रुतं, न तच्छिल्पं, न सा विद्या, न सा कला । न स भोगो, न तत्कर्म यन्नाट्येऽस्मिन्न दृश्यते ॥ नाटच० १।११६ या विद्या, यानि शिल्पानि, या गतिर्, यच्च चेष्टितम् । लोकालोकस्य जगतस्तदस्मिन्नाटकाश्रये ॥ नाटच० ५।५६ नाट्यशास्त्र ७।६३; ८।३६; १३।६६-६७, ७४ भी देखें । ३. लक्ष्म प्रयोगदोषाणां भेदेनानेन वर्त्मना । सन्धाऽऽदिसाधनासिद्धं शास्त्रे तूदितमन्यथा ॥ काव्याल० ५।३२ तज्ज्ञैः काव्यप्रयोगेषु तत् प्रादुष्कृतमन्यथा । तत्र लोकाश्रयं काव्यमागमस्तत्त्वदर्शिनः ॥ ३३