भारतकोश
काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary

महाकवि दण्डी द्वारा

DevanagariHindipublished270 पृष्ठ

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पृष्ठ 178

३।२७] ५. (११) प्रतिज्ञादिहानि दोषपर विचार १५५ "प्रतिज्ञा-हेतु दृष्टान्त हानिर्दोषो न, वेत्यसौ । विचारः कर्कशप्रायस्, तेनालीढेन किं फलम् ॥ १२७ ॥ (११) प्रतिज्ञा, हेतु (लिङ्ग) और दृष्टान्त (उदाहरण)की हानि (त्रुटि) दोष नहीं है, या है, इस प्रकारका यह विचार अधिकतासे कर्कश है। उसे चाटनेसे क्या लाभ ? ॥ १२७ ॥ हास्यमें; भिन्नार्थ जब श्रोता आदि वक्ता हों, तब; एकार्थ दूसरोंको अर्थबोध करानेमें, अभिप्लुतार्थ उन्मादादिमें, भिन्नवृत्त और विसन्धि अपने विषयमें प्रयोग करनेपर दोष नहीं रहते । अपशब्द सभी स्थितियोंमें दोष ही होता है । क्योंकि उससे कोई अर्थप्रतीति नहीं होती ॥ १२५-१२६ ॥ भरतके पश्चात्‌के काव्यलक्षणकार दस दोषोंके अतिरिक्त न्यायशास्त्रके अनुमिति प्रमाणके आवश्यक तीन अवयवों प्रतिज्ञा, हेतु एवम् दृष्टान्तमें उनके लक्षणकी सङ्गति पूरी तरह न होनेपर प्रतिज्ञाभास, हेत्वाभास एवं दृष्टान्ता- भासको काव्यमें भी दोष मानकर अपने ग्रन्थोंमें इनका निरूपण करना उचित मानते थे । प्रथमतः तो न्यायशास्त्रके इन दोषोंका स्वरूप समझना तर्ककर्कश है । कोमलमत्ति काव्यप्रेमियोंको वह उद्वेजक होगा । दूसरे, न्यायशास्त्रमें वह दोष है, तो काव्यमें वह दोष होगा, कि नहीं, इसपर भी मतभेद हो सकता है । अतः उस कर्कश तर्कदोषको यहाँ काव्यलक्षणके अध्येता मन मारकर आलेहन करें, तो इससे लाभ क्या ? कितनी तो परिस्थितियाँ काव्यमें उस दोषकी होंगी कि उसके ज्ञानके लिये बोझिल, कर्कश विषयका समावेश काव्य- लक्षणमें किया जाये ! अतः उसके निरूपणका क्षेत्र काव्यशास्त्र नहीं है । काव्यमें तो किस विषयका ज्ञान अपेक्षित नहीं होता ? काव्यलक्षण ग्रन्थमें उन सबका समाहार न सम्भव है, न अपेक्षित है और न उचित है । तत्तत् शास्त्रसे ही उसे प्राप्त करना उचित है । रोगीको कड़वी औषध मधुमें लपेटकर चटाई जाती है । पर न कवि रोगी है और न प्रतिज्ञाहान्यादिदोष कड़वी औषध है कि उसे चाटना आवश्यक हो । इस दोषका निरूपण भरतने नहीं किया है । पर इसका समावेश उनके न्यायापेतमें हो सकता है : न्यायसे लोकका स्वभावसिद्ध मार्ग भी अभीष्ट होता है, तो शास्त्र भी । वस्तुतः दण्डीका दसवाँ दोष देश, काल, कला, लोक, न्याय और आगमका विरोध भरतके न्यायापेतका ही विवरण है । यही कारण है कि उन्होंने उन्हें एक ही दोषके अवान्तर भेद माना है । इसीलिये उन्होंने (१२६ में) 'दशैव' ('दस ही') कहा है ।