भारतकोश
काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary

महाकवि दण्डी द्वारा

DevanagariHindipublished270 पृष्ठ

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पृष्ठ 177

सावशेष (अपूर्ण) अर्थका अभिधान होता है । दण्डीका (१) अपार्थ इसीसे मिलता-जुलता दोष है । (४) भिन्नार्थ दोष भरतने दो प्रकारका बताया है : (क) असभ्य अथवा ग्राम्य ढंगसे अभिधानसे होता है । आचार्य दण्डी इसे सर्वमार्गसाधारण ग्राम्यताके नामसे प्रथम परिच्छेद (१।२६-१३३) में दे चुके हैं । (ख) विवक्षित अन्य अर्थका अन्य अर्थसे भेद न करना भी भिन्नार्थ दोष होता है ।¹ दण्डीका व्यर्थ एवं संशय इससे मिलता-जुलता दोष प्रतीत होता है । (५) एकार्थ दोष एक ही अर्थको पुनः कहनेसे होता है । दण्डीने इसे इसी नामसे दिया है । (६) अभिप्लुतार्थ दोष वहाँ होता है, जहाँ चारों पादोंके अर्थ वहीं सिमट जाएँ, इनमें परस्परसम्बन्ध न हो ।² दण्डीने इसे 'अपेतार्थ' नाम दिया है । (७) न्यायापेत दोष वहाँ होता है, जब कोई बात प्रत्यक्षादि प्रमाणोंके विपरीत कही जाये । दण्डीने इस दोषके छह अवान्तर भेद बताये हैं । (८) विषम वहाँ होता है, जहाँ छन्दमें कोई त्रुटि आ जाती है ।³ दण्डीने इसे दो दोषोंमें बाँटा है : (७) यतिभ्रष्ट, (८) भिन्नवृत्त । (६) विसन्धि दोष शब्दोंका उपश्लेषण (सन्धि) न होनेपर (सन्धियोग्य स्थलमें सन्धिभङ्ग होनेपर) होता है ।⁴ दण्डीने इसे दिया है । (१०) शब्दहीन दोष शब्दशास्त्रमें अप्रसिद्ध पदोंके प्रयोगसे होता है ।⁵ दण्डीने इसे भी दिया है । सन्धि शब्दशास्त्रका ही विषय है । अतः (६) विसन्धिका समावेश (१०) शब्दहीनमें ही उचित है । आचार्य अभिनवगुप्तने इस स्थलमें यह विचार किया है : (क) कुछ दोष नित्य हैं, जैसे अपशब्द; (ख) कुछ अनित्य हैं, जैसे ग्राम्य; हास्यादिमें वह इष्टतम होता है । इनमेंसे उत्तरोत्तर स्थूल हैं । जैसे गूढार्थ दोष गूढलेख, प्रहेलिका, पताकास्थानक आदिमें प्रयोज्य हैं; अर्थान्तर अनुवादमें, अर्थहीनादि


१. (३) अर्थहीनं त्वसम्बद्धं सावशेषार्थमेव च । (४) (क) भिन्नार्थमभिविज्ञेयमसम्यं ग्राम्यमेव च ।। नाट्य० १६।६० (ख) विवक्षितोऽन्य एवार्थो यत्रान्यार्थेन भिद्यते । भिन्नार्थं तदपि प्राहुः काव्यं काव्य-विचक्षणाः ।। ६१ २. (५) अविशेषाभिधानं यत् तदेकार्थमिति स्मृतम् । (६) अभिप्लुतार्थं विज्ञयं यत् पादेन समस्यते ।। नाट्य० १६।६२ ३. (७) न्यायादपेतं विज्ञेयं प्रमाणपरिवर्जितम् । (८) वृत्तभेदो भवेद् यत्र, विषमं नाम तद् भवेत् ।। नाट्य० १६।६३ ४. (६) अनुपश्लिष्टशब्दं यत् तद्विसन्धीति कीर्तितम् । (१०) शब्दहीनं च विज्ञेयमशब्दस्य च योजनात् ।। नाट्य० १६।६४