भारतकोश
काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary

महाकवि दण्डी द्वारा

DevanagariHindipublished270 पृष्ठ

पृष्ठ 176, कुल 270 में से

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पृष्ठ 176

३।१२६] ५. दोष : भरत-समस्त दस दोष १५३ देश-काल-कला-लोक-न्यायागम-विरोधि च । इति दोषा दशैवैते वर्ज्याः काव्येषु सूरिभिः ॥ १२६ ॥ (१०क) देश, (ख) काल, (ग) कला, (घ) लोक, (ङ) न्याय एवम् (च) शास्त्रसे विरोध रखना । ये दोष दस ही हैं । काव्योंमें बुद्धिमानोंको इनका परिहार करना चाहिये ।। १२५-१२६ ।। लङ्कारत्वकी ओर उन्मुख दुष्कर प्रहेलिकाका निरूपण करके काव्यमें, शोभा- कारक धर्मोंका निरूपण समाप्त किया है । अब शेष रह जाता है सर्वमार्ग- साधारण दोषोंका विवेचन । इसे आचार्यने तृतीय परिच्छेदके शेष भागमें (क) उद्देश (१२५-१२८) और (लक्षण १२८-१७८) की प्रक्रियासे करनेके बाद (ख) दोष की भी कुछ परिस्थितियोंमें गुणरूपता (१७६-१८५ में) बताकर (ग) काव्यादर्शके विषयका सिंहावलोकन (१८६-१८७ श्लोकोंमें) करके प्रकृत का उपसंहार किया है । 'दोष'के स्वरूपपर विचार मार्गविभागके प्रसङ्गमें प्रथम परिच्छेदमें ((पृष्ठ १०३, १०४, ११०, १२६-१३३, १३८-१४१ में) किया जा चुका है । अतः यहां पुनर्वचन अपेक्षित नहीं है । आचार्य भरतने निम्नलिखित दस काव्य-दोष बताये हैं : (१) गूढार्थ, (२) अर्थान्तर, (३) अर्थहीन, (४) भिन्नार्थ, (५) एकार्थ, (६) अभिप्लुतार्थ, (७) न्यायापेत, (८) विषम, (६) विसन्धि तथा (१०) शब्दच्युत ।१ इनमें से कुछ दोष परवर्ती आचार्योंने लिये हैं, कुछ नहीं । इसका निरूपण आगे किया जायेगा । (१) गूढार्थ दोष पर्याय (कल्पित) शब्दोंसे अभिधान करके रूढ शब्दको छुपानेसे होता है । दण्डी द्वारा प्रोक्त (१०) समानशब्दा प्रहेलिकामें यह दोष अर्थगूढताकी विवक्षाके कारण गुण (अलङ्कार) हो जाता है । दोष नहीं रहता । अन्यत्र दोष ही रहेगा । इसका प्रयोग प्रहेलिकामें हो चुका है, इस लिए आचार्य दण्डीने इसकी गणना दोषोंके इस प्रकरणमें नहीं की है । (२) अर्थान्तर दोष अवर्ण्य (अविवक्षित) का भी वर्णन होनेसे होता है ।२ दण्डीका ससंशय इसीके निकट का दोष है । (३) अर्थहीन दोष असम्बद्ध अथवा १. गूढार्थमर्थान्तरमर्थहीनं भिन्नार्थमेकार्थमभिप्लुतार्थम् । न्यायादपेतं विषमं विसन्धि शब्दच्युतं वै दश काव्यदोषाः ॥ ना०१६।८६ २. (१) पर्यायशब्दाभिहितं गूढार्थमभिसञ्जितम् । (२) अवर्ण्यं वर्ण्यते यत्र तदर्थान्तरमिष्यते ॥ नाटय० १६।६०

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