काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary
महाकवि दण्डी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१५२ काव्यादर्श [३।१२५ अपार्थं¹ 'व्यर्थमेकार्थं² ⁴ससंशयमपक्रमम्³ । शब्दहीनं⁵ यतिभ्रष्टं⁶ भिन्नवृत्तं⁷ विसन्धिकम्⁸ । १२५ ॥ (१) अपार्थ, (२) व्यर्थ, (३) एकार्थ, (४) ससंशय, (५) अपक्रम, (६) शब्दहीन, (७) यतिभ्रष्ट, (८) भिन्नवृत्त, (६) विसन्धिक ॥ १२५ ॥ पकारस्य व्ययादेस्तु¹ मासस्यान्त्ये दले गुरौ । द्वादश्यां धनुषि ग्लावि प्रबोधिताः प्रहेलिकाः ॥ १ ॥ अनभ्रं² रचायप्संस्पृष्टं नभ एतदपर्तुकम् । न भाति रमणीचक्षुरकज्जलं यथोज्ज्वलम् ॥ २ ॥ षष्ठेऽह्न्यस्मिन्नगस्त्यस्य, तद्विगुणे नभः सुदि । सायाह्ने ख्यातुमारप्स्ये दश दोषान् बुधोदितान् ॥ १ ॥ दोषाकरस्तु चन्द्रोऽयं, दोषज्ञो धिषणो गुरुः । दोषैषा क्षणदा रम्या, वन्द्यो दोषो बुधादृतः ॥ २ ॥ अर्धनारीस्तनं पातुं कलयन्तौ सुतावुभौ । स्नपयन्ती गणेश्कन्दौ स्निग्धलोचनकान्तिभिः ॥ ३ ॥ अनुजे पक्षपातस्य शङ्कयाऽरुणितेक्षणम् । आमृशन्ती षडास्यं सा स्नेहाद्व्याद्युमा तु माम् ॥ ४ ॥ दोष : आचार्य दण्डीने काव्यादर्शका प्रारम्भ ही दोषोंकी हेयता बतानेसे किया था, यह प्रथम परिच्छेदके ६-८ श्लोकोंमें देख चुके हैं । गुणप्रकरणमें भी हम देख चुके हैं कि काव्यमें गुणवत्ता कई दोषोंके विपर्ययके फलस्वरूप ही आ पाती है । गुणत्वविघातक दोषोंका प्रतिपादन गुणप्रकरणमें आचार्य कर चुके हैं । वे दोष मार्गविशेषमें ही दोष हैं । दूसरे मार्गमें वही गुण हो जाते हैं । अतः उन विशेष दोषोंका निरूपण आचार्यने मार्गविभागके प्रकरण में किया है । द्वितीय परिच्छेदमें सर्वमार्गसाधारण शोभाकारक तत्त्वों उपमादि अर्थालङ्कारोंका निरूपण आचार्यने किया है । फिर तृतीय परिच्छेद में सुकर दुष्कर शब्दालङ्कारों यमक, चित्रबन्धों वर्णस्थाननियम तथा उभया- १. ज्योतिषमें पूर्व भावको अगले भावका 'व्यय' कहा जाता है । वर्णमाला में 'प' वर्णसे पूर्ववर्ण 'न' है । वह आदिमें है 'नभस्' शब्द के, जो श्रावण का वाचक है : श्रावणे तु स्यान्नभाः श्रावणिकश्च सः (अमरकोष १।४।१६) । नभः खं श्रावणो नभाः । श्रावण सुदि द्वादशी समाप्ति- तिथि है ।