काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary
महाकवि दण्डी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३।१२४] पाठपर विचार १५१ इसी प्रकार अन्य भेदोंका भी परस्पर मिश्रण हो सकता है । सुधीजन उन्हें प्रयोगोंमें स्वयम् अभ्यूहित करें । रत्नश्रीज्ञानने (१) समागता और (३) व्युत्क्रान्ताका, (५) समानरूपा और (११) समान-शब्दाका तथा (१३) पारिहारिकी और (८) प्रकल्पिताका सङ्कीर्ण भेद उदाहरणसे प्रस्तुत किया है ।¹ दोसे अधिक प्रहेलिकाओंका भी सङ्कर इस कथनसे उपलक्षित है । तिरुपतिसंस्करण तथा रेड्डीसंस्करणमें यहां कुछ श्लोक और दिये हैं, जिनसे तृतीय परिच्छेदकी समाप्ति तथा चतुर्थका आरम्भ सूचित होता है । तिरुपतिसंस्करणमें तो तीसरा और चौथा परिच्छेद पृथक्-पृथक् दिये भी हैं । किन्तु तीनों प्राचीन टीकाओंमें इन श्लोकोंके अस्तित्वसे परिचयका कोई चिह्न नहीं है । तरुणवाचस्पतिने प्रहेलिकाका उपसंहार १२४वें श्लोकपर बताया है । ये उपर्युक्त श्लोक यहां उन्हें उपलब्ध रहे होते, तो प्रहेलिकाके उपसंहार की उत्थानिका उन श्लोकोंके पूर्व दी होती । चतुर्थ परिच्छेदका प्रारम्भ भी पूर्व परिच्छेदोंकी शैलीमें ही वादीजीने मङ्गलाचरणसे, और तरुणवाचस्पतिजीने पूर्वापरसम्बन्धकथनके द्वारा किया होता । इससे प्रकट होता है कि तृतीय परिच्छेदकी समाप्ति के तथा चतुर्थके प्रारम्भके सूचक ये श्लोक इन लोगोंके समय तक काव्यादर्शका अंश नहीं बन पाये थे । कालान्तरमें प्रक्षिप्त हुए हैं । अतः काव्यादर्शके उपलब्ध अंशमें तीन परिच्छेद ही प्रमाणिक हैं । चार परिच्छेदोंमें विभाजन प्रामाणिक नहीं है । ३।१७१ में उक्त ‘कलापरिच्छेद’को आचार्य रत्नश्रीज्ञानने ‘चतुर्थः कला- परिच्छेदोऽस्य दण्डिनोऽस्ति । स त्विह न प्रवर्तते ।’ कहा है । इससे यह स्पष्ट है कि ग्रन्थका प्रकृत परिच्छेद सारा एक ही है । तृतीय-चतुर्थमें विभाजित नहीं है । ‘कलापरिच्छेद’ पर विचार उक्त स्थलमें देखें ।। १२४ ।। १. सुराप्रयोगे प्रसृता विप्राः शूद्रान्नभोजिनः । आम्नायाध्ययनं त्यक्त्वा युध्यन्तः पाप(माश्रिताः) ।। समागता-व्युत्क्रान्तयोः संकरः । विशालेऽत्र गिरौ दृष्टो गिरिनं सक्तनिर्झरः । यश्चार्क(पिशितासा)ख्यो दोलायेत प्रतिक्षणम् ।। समानरूपा-समान- शब्दयोरयं संकरः । लक्ष्मीधरपतेः कान्तं गता गङ्गाधराङ्गना । चन्द्रा(धारे) परीतापः कुतोऽयं मे तवोदये ।। पारिहारिकी-प्रकल्पितयोः संकरः ।