भारतकोश
काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary

महाकवि दण्डी द्वारा

DevanagariHindipublished270 पृष्ठ

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पृष्ठ 173

१५० काव्यादर्श [३।१२३-१२४ (१६) सहया सगजा सेना सभटेयं न चेज्जिता । अमातृकोऽयं मूढः स्यादक्षरज्ञस्तु नः सुतः ॥ १२३ ॥ सा नामान्तरिता-मिश्र-वञ्चिता-रूप-योगिनी । एवमेवेतरासामप्युन्नेयः सङ्कर-क्रमः ॥ १२४ ॥ (१६) घोड़ों सहित, गजों सहित, सैनिकों वाली यह सेना अगर नहीं विजय की, बिना माँ वाला यह मोहग्रस्त हो जाये, किन्तु जो अक्षरोंको जानने वाला (पढ़ा-लिखा) है, वह हमारा बेटा हो जाये ।। १२३ ।। वह उपर्युक्त प्रहेलिका (६)नामान्तरितासे मिली हुई (२)वञ्चिताके रूप (लक्षण)के योग वाली सङ्कीर्ण है । इसी प्रकार अन्य प्रहेलिकाओंके भी मिश्रण का प्रकार समझ लेना चाहिये ।। १२५ ।। (१६) सङ्कीर्णा—प्रकृत श्लोकमें चतुरङ्गिणी सेनाके तीन अङ्गों अश्व, गज, पत्ति (पैदल) का कथन करके इसे न जीत पाने वालेको अमातृक (बिना माँका) तथा मूढ बताया है । जो अक्षरोंका जानकार है, उसे कविका प्रिय पुत्र बताया है । यह कथन व्यामोहकारी है । इसका समाधान यह है : ह, य, ग, ज, इ, न, स, भ, ट, आ तथा अनुस्वार वर्णोंसे युक्त वर्णमाला१ (मातृका) अगर जीती नहीं है, उसका सम्यक् ज्ञान नहीं प्राप्त किया है, तो वह अमातृक = मातृका—(वर्णमाला)से रहित मनुष्य मूढ होता है । किन्तु जो अक्षरों (वर्णों) को जानता है, वह हमें बेटेके समान प्रिय है । इस उदाहरणकी सङ्गति अगले श्लोकमें की है ।। १२३ ।। सङ्कीर्ण प्रहेलिकाकी सङ्गति —यहाँ ‘अमातृकः’ नामपदमें (१) ‘न विद्यते माता यस्य, स’, (२) ‘न विद्यते मातृका वर्णमाला यस्य, सः’ के रूपमें नाना अर्थोंकी कल्पना तो है ही, ‘मातृका’ शब्द वर्णमाला अर्थमें निरूढ है और ‘माँ’ अर्थमें निगूढ है । हय, गज, सेना, भट शब्द अन्य अर्थोंमें रूढ हैं, किन्तु उनकी अन्य अर्थमें कल्पना करके श्रोताका प्रतारण किया गया है । नाममें अन्यार्थ- कल्पना तथा अन्यत्र रूढका अन्य अर्थमें प्रयोग एक दूसरेपर आधारित है : अन्यार्थकल्पना अङ्ग है, वञ्चना मुख्य है—अन्यार्थकल्पनाके द्वारा रूढसे अन्य अर्थमें प्रयोग किया गया है । अतः (६) नामान्तरितासे मिली हुई (२) वञ्चिताके रूपसे योग (सम्बन्ध) है । इस लिये यह सङ्कीर्ण है । १. इस उक्तिमें ग, ज, ट, न, भ वर्ण स्पर्शोंके पाँच वर्गोंके, य अन्तस्थोंका, स, ह ऊष्मोंके एवम् आ और इ स्वरोंके तथा अनुस्वार अयोग-वाहोंका प्रतिनिधि हैं ।