भारतकोश
काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary

महाकवि दण्डी द्वारा

DevanagariHindipublished270 पृष्ठ

पृष्ठ 172, कुल 270 में से

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पृष्ठ 172

३।१२१-१२२] ४. प्रहेलिकाके भेद १४६ (१४) न स्पृशत्यायुधं जातु, न स्त्रीणां स्तन-मण्डलम् । अमनुष्यस्य कस्यापि हस्तोऽयं न किलाफलः ॥ १२१ ॥ (१५) केन कः कस्य सम्भूय, सर्वकार्येषु सन्निधिम् । लब्ध्वा, भोजन-काले तु यदि दृष्टो, निरस्यते ॥ १२२ ॥ (१४) न छूता शस्त्र कभी यह, न रमणीका स्तन-मण्डल (छूता है) । मानवसे अन्य किसी का हाथ यह, नहीं प्रसिद्ध है निष्फल ॥ १२१ ॥ (१५) किसके साथ कौन किसका मिलकर, सब कार्योंमें उपस्थिति पाकर (भी) अगर भोजनके समय दिख जाये, तो हटाया जाता है ? ॥ १२२ ॥ (१४) एकच्छन्ना—१२१वें श्लोकमें किसी वस्तुके हाथका तो वर्णन किया है, पर वह किसका है, यह छुपाया गया है। मनुष्यके हाथकी तीन ही सार्थकतायें हैं : (१) शूरवीर पुरुषका हाथ शस्त्र धारण करता है, (२) कामी पुरुषका हाथ कामिनी-कुच-मर्दनमें सार्थकता पाता है, और (३) दानीका हाथ दानमें । किसी पदार्थका यह हाथ इन तीनों ही गुणोंसे विधुर है, किंतु निष्फल नहीं है । ऐसा यह हाथ किसका है ? यह प्रश्न अनुत्तरित ही है । इस प्रकार (एक आश्रय, हस्तवान् ) का गोपन करनेसे यह एकच्छन्ना है । समाधान यह है : एरण्डको ‘गन्धर्व’ नामक मृगविशेषके हाथके समान आकार वाले पत्तोंसे युक्त होनेके कारण ‘गन्धर्व-हस्तक’ कहते हैं १। एरण्ड मनुष्येतर होनेसे अमनुष्य है । उसका हाथ (पत्र) आयुधस्पर्श, कामिनी-कुच-मण्डल-स्पर्श, दान नहीं करता । किंतु अतः इसमें फल होते हैं । अतः यह अफल नहीं है ॥ १२१ ॥ (१५) उभयच्छन्ना—१२२वें श्लोकमें किसी पदार्थके कार्योंका तो वर्णन किया है, पर वह क्या है, कहाँ, किसके आश्रित है, ये आश्रय और आश्रयी दोनों बातें छुपाई गई हैं । अतः उभयच्छन्ना पहेली है । समाधान यह है : क (शिर)२ के साथ (आश्रयाश्रयि भावसे) सम्बद्ध होकर स्थित ईश (विधाता) अर्थात् केश है । यह स्नान आदि सब माङ्गलिक और अमाङ्गलिक कार्योंमें वर्धन वपन आदिके रूपमें सन्निधि (विशिष्ट स्थान) पाता है । किन्तु भोजन के समय अगर एक भी बाल दिखलायी देता है, तो अमेध्य तथा अरुचिकर होनेके कारण उसे हटाना पड़ता है ॥ १२२ ॥ १. अमरकोष २।४।५०-५१ : अथ व्याघ्रपुच्छ-गन्धर्वहस्तकौ ॥ एरण्ड उरुबूकश्च । रामाश्रमी : गन्धर्वस्य मृगभेदस्य हस्त इव पत्रमस्य । २. अमर० ३।३।५ : मारुते वेधसि ब्रध्ने पुंसि कः, कं शिरोऽम्बुनोः ।

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