काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary
महाकवि दण्डी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३।११४] ४. प्रहेलिकाके भेदोंके उदाहरण १४३ (७) नासिक्य-मध्या, परितश्चतुर्वर्णविभूषिता । अस्ति काचित् पुरी यस्यामष्टवर्णाद्वया नृपाः ॥ ११४ ॥ (७) बीचमें नासिकासे उच्चरित वर्ण वाली, दोनों ओर चार (दो-दो) वर्णोंसे सुशोभित कोई नगरी है, जिसमें आठ वर्णोंसे युक्त नाम वाले राजा हैं ॥ ११४ ॥ (७) सङ्ख्याता — 'नासिक्यमध्या परितश्०' (११४) में किसी राजधानी का वर्णन उसके नाम और शासकोंके नामका निर्देश सङ्ख्या शब्दोंके प्रयोगसे करके किया है । तमिलनाडुकी नगरी काञ्ची है । इसके मध्यमें नासिक्य वर्ण 'ञ्' है । दोनों ओर मिलाकर चार वर्ण — ञ्' के पहले 'का' (क् + आ) और बादमें 'ची' (च् + ई) – हैं । इसके राजाओंके नाममें आठ वर्ण हैं । रत्नश्री- ज्ञान और तरुण वाचस्पतिने इससे 'पल्लवाः' (विसर्गसहित आठ वर्ण) का ग्रहण किया है । प्रेमचन्द्र तर्कवागीश तथा जीवानन्द विद्यासागरने 'पुण्ड्रक' वंशके राजाओंका ग्रहण किया है । उन्होंने 'पल्लवाः'में विसर्ग (प्रथमा- बहुवचनमें लभ्य) का वर्णोंमें ग्रहण इनके अयोग-वाह होनेसे नहीं किया है ।¹ इतिहासके अनुसार ४थीसे ६वीं शती तक काञ्ची पल्लवोंकी राजधानी रही है ।² रही बात अयोगवाहों ('अ' आदि स्वरोंके योग = सम्बन्धके वाहकों) को वर्ण माननेकी, शौनक और पाणिनिने अनुस्वार, विसर्ग, उसके भेदों जिह्वामूलीय, उपध्मानीयको वर्ण माना है ।³ पल्लवोंके लिये अष्टवर्णाः योगका प्रयोग सिंहविष्णु पल्लवके पुत्र 'मत्त- विलास', 'विचित्रचित्त' के नामोंसे भी प्रसिद्ध महेन्द्रवर्मा पल्लव (५६० ई० से ६३० ई०) के मामन्दूर शिलालेखमें भी मिलता है । अतः शब्दोपात्त तथा न्यायोपात्त होनेसे 'पल्लवाः' ही 'अष्टवर्णाद्वय नृप' हैं, 'पुण्ड्रक' नहीं । पुण्ड्रकोंका काञ्चीसे सम्बन्ध नहीं रहा है । वे तो प्राचीन कालमें प्रेमचन्द्र तर्क- बागीशके देश बंगालसे सम्बद्ध रहे हैं । यहाँ सङ्ख्याके प्रयोगसे व्यामोह उत्पन्न किया गया है । दण्डीके इस भेद १. प्रभा : तत्र 'पल्लवा' इत्यत्र वर्णगणनायां विसर्जनीयस्यायोगवाहत्वेन गणनमनुचितमिति तेषामभिप्रायः स्यात् । २. नीलकण्ठ शास्त्री, ए हिस्ट्री आफ साउथ इण्डिया, अष्टम अध्याय । ३. ऋक्प्रातिशाख्य १।६ : सर्वः शेषो व्यञ्जनान्येव । १।३८-३६ भी देखें । त्रिषष्टिश्चतुःषष्टिर्वा वर्णाः शम्भुमते मताः । पाणिनीयशिक्षा ३ अनुस्वारो विसर्गश्च ≍ क ≍ पौ चापि पराश्रितौ ॥ ५