भारतकोश
काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary

महाकवि दण्डी द्वारा

DevanagariHindipublished270 पृष्ठ

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पृष्ठ 165

१४२ काव्यादर्श [३।११३ (६) सुराः सुरालये स्वैरं भ्रमन्ति दशनाचिषा । मज्जन्त इव मत्तास्ते सौरे सरसि सम्प्रति ॥ ११३ ॥ (६) शराब खींचने वाले वे अब मस्त हुए सुरामय तालाबमें दन्तकान्तिसे डूबतेसे मदिरागारमें स्वच्छन्दतासे घूमते हैं ॥ ११३ ॥ अर्थ उसके गौण आरोपसे किसी सुन्दरीकी भुजाका वर्णन है : इस (प्रकृत रमणीके शरीर रूपी) उद्यानमें मैंने पाँच (अंगुलीरूपी) कोंपलों वाली (भुजलता) देखी है। इसके प्रत्येक (अंगुलिरूपी) पल्लवमें स्निग्ध (पानीदार, चमकीली नखरूपी) कुसुम-मञ्जरी है। इस प्रकार समानरूप वाले गौणार्थक पदोंसे ग्रथित यह प्रहेलिका 'समान-रूपा' है । 'वल्लरी' शब्द अमरकोषके अनुसार 'मञ्जरी' अर्थमें है । सम्भवतः इसी कारण तरुणवाचस्पतिने 'वल्लरी' के स्थानमे 'मञ्जरी' पाठकी व्याख्या 'किसलय-मञ्जरी' की है । पर 'वल्लरी' का प्रयोग इसी √वल्ल् से निष्पन्न 'वल्ली' (बेल, लता) अर्थमें कवियोंने किया है ।१ यहाँ भी वही अर्थ अभिप्रेत है : मञ्जरीके पत्ते नहीं होते, किसलयोंपर मञ्जरीका आरोप विचित्र है; मञ्जरीमें पुनः कुसुममञ्जरी भी नहीं होती; 'लता'में यह सब सम्भव है । वादी जङ्घालदेवने वल्लरीसे नारीकी देहलता अर्थ लिया है । उस देहलताके 'दो हाथ, दो पाँव और अधरोष्ठ', ये पाँच पल्लव हैं । इनमें हाथ- पाँवकी अंगुलियाँ कुसुम हैं, उनके कान्तिमान् नख मञ्जरियाँ हैं । अधरोष्ठ कुसुमके दन्तप्रभा मञ्जरी है । रत्नश्रीज्ञानने भी 'वल्लरी'से 'स्त्री'को ही लिया है । पर 'पल्लव' से 'अंगुलियाँ' और 'कुसुममञ्जरी'से 'नख' लिये हैं । वादी जीकी व्याख्या अधिक मनोरम है ॥ ११२ ॥ (६) परुषा — 'सुराः सुरालये स्वैरं' (११३) में ओंठोंसे जाम लगाये मदमस्त सुराविक्रेताओंके अपने शराबखानेमें घूमनेका वर्णन लोकमें अप्रसिद्ध किन्तु व्याकरणकी लाठीसे हाँके हुए (शास्त्रमात्रसिद्ध सुरां कुर्वन्तीति सुराः, सुरा + णिच् + अच् सुराः, पुं०, प्र०, ब० व०,२ सुराया इदं सौरं, तस्मिन् सौरे) शब्दोंसे किया है । होंठोंसे लगाये जाममें दाँतोंकी परछाँई पड़ती है, तो लगता है जैसे वे उस जाममें डुबकी लगा रहे हैं ॥ ११३ ॥ १. तनुरभिलषितं क्लमच्छलेन व्यवृणुत वेल्लितबाहुवल्लरीका ॥ माघ ७।७२ २. 'तत्करोति, तदाचष्टे' (वार्तिक) से णिच् तथा 'नन्दि-ग्रहि-पचादिभ्यो ल्युणिन्यचः' (अष्टा० ३।१।१३४) से अच् होता है ।