भारतकोश
काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary

महाकवि दण्डी द्वारा

DevanagariHindipublished270 पृष्ठ

पृष्ठ 164, कुल 270 में से

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३।११२] ४. प्रहेलिकाके भेदोंके उदाहरण १४१ (५) अत्रोद्याने मया दृष्टा वल्लरी¹ पञ्च-पल्लवा । पल्लवे-पल्लवे चार्द्रा यस्याः कुसुम-मञ्जरी ॥ ११२ ॥ (५) इस बगियामें देखी मैंने पाँचपतिया (एक) लतर पत्ते-पत्तेमें कुसुममञ्जरी है जिसके पानीदार ॥ ११२ ॥ से क्तिन्से निष्पन्न 'स्फीताः' पद 'वृद्धाः' अर्थमें निष्पन्न है ।² रत्नश्रीसे अन्यत्र उपलब्ध स्फार्ह शब्द टीकाकारोंके अनुसार 'मधुर', 'मनोहर' अर्थमें है ।³ पर प्रसिद्ध नहीं है । 'वल्गु' शब्द 'सुन्दर' अर्थमें तो प्रसिद्ध हैं, पर 'आवाज' अर्थमें प्रसिद्ध नहीं है । चन्द्र 'चन्द्रमा' अर्थमें रूढ है । पर यौगिक 'आह्लादक अर्थमें प्रसिद्ध नहीं है । घुँघरुओंकी मधुर ध्वनिका अनुभव श्रवणसे और स्फातिसे लभ्य आकारवृद्धिका अनुभव आँखसे होता है । इन दोनोंको इकट्ठे 'साक्षाद् भवन्ति'से प्रकट किया है । पर यह अभिव्यक्तिप्रकार प्रसिद्ध नहीं है । 'प्राण' अर्थमें 'वायु' का प्रयोग भी दुर्बोध है । तायु का प्रयोग तो और भी दुर्बोध है । चारिणः (√चर्+णिनि) का 'अस्थिर' अर्थमें प्रयोग तो उतना दुर्बोध नही है, पर रत्नश्रीतर स्थलोंमें धृन्-उद्धृत व्याख्यात धारिणः पद 'धृङ् अवस्थाने (तुदादि) के विपरीत है । यहाँ इस अर्थमें प्रयोग व्याख्यागम्य है : प्राणोंका स्वभाव सदा चलते रहना है; वे टिक गये हैं, अर्थात् चलना बन्द कर दिये हैं; इस प्रकार प्राण अस्थिर (अपने स्वभावसे विचलित) हो गये हैं । यह प्रक्रिया भी सुबोध नहीं है । इस प्रकारकी दुर्बोधार्थ पदावली श्रोताको सिर खुजानेको बाध्य करनेको पर्याप्त है । इस प्रकारकी पदावली यद्यपि रूढिच्युति दोषसे युक्त प्रतीत होती है । तथापि परव्यामोहन प्रयोजनमें तात्पर्य होनेसे यहाँ यह दोष नहीं, अपितु गुण बन जाती है⁴ ॥ १११ ॥ (५) समान-रूपा—'अत्रोद्याने मया दृष्टा०' (११२) में कविने ऐसे पदोंका प्रयोग किया है जिनके मुख्यार्थसे तो किसी लताका वर्णन है, पर विवक्षित १. तिरुहुति-सं० के मूलपाठमें तथा तरुणटीकामें 'मञ्जरी' पाठ है : अत्रो- द्याने पञ्चपल्लवा मञ्जरी किसलय-मञ्जरी दृष्टा । २. अमरकोष ३।२।६ : स्फातिर्वृद्धौ । ३. वादितीका : स्फार्हो मधुरः । रत्नदर्पण : मनोहरः । तरुणटीका : स्फा- र्हंवल्गवः स्फीतशब्दाः । ४. यत्तु रूढिच्युतत्वेन प्रोक्तमन्यार्थसञ्जितम् । प्रहेलिकादिषु प्रायो गुणत्वं तस्य युज्यते ॥ सरस्वती० १।६४

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