भारतकोश
काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary

महाकवि दण्डी द्वारा

DevanagariHindipublished270 पृष्ठ

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पृष्ठ 169

१४६ काव्यादर्श [३।११८-११९ (११) जित-प्रकृष्ट-केशाख्यो यस्तवाभूमि-साह्वयः । असौ मामुत्कमधिकं करोति कलभाषिणि ॥ ११८ ॥ (१२) शयनीये परावृत्य शयितौ कामिनौ रुषा । तथैव शयितौ रागात् स्वैरं मुखमचुम्बताम् ॥ ११९ ॥ (११) हे मधुवयनि, तुम्हारा जो प्रकृष्ट (उत्कृष्ट) केश नाम वालेको जीतने वाला है, तथा जो भूमिरहित नाम वाला है, वह मुझे बहुत उत्कण्ठा- युक्त (बेचैन करता है) ॥ ११८ ॥ (१२) क्रोधके कारण पलट करके (एक दूसरेकी ओर पीठ करके) सोये हुए प्रेम करने वाले दोनों उसी प्रकार सोये हुए वे स्वच्छन्दतासे मुँह चूमने लगे ॥ ११९ ॥ जाती हैं। वे अपनी नाना प्रकारकी वैभवमय भङ्गियों (भावों) से असङ्ख्य लोगोंको आकृष्ट करती हैं। पर उन्हें रोक पाना कठिन होता है। इस प्रकार श्री वेश्या नहीं हैं, किन्तु वेश्याके समानधर्मा हैं । इस अर्थमें क्लिष्ट कल्पना नहीं करनी पड़ती। प्रेमचन्द्र तर्कवागीश, रङ्गाचार्य रेड्डी, जीवानन्द विद्या- सागर और डा० धर्मेन्द्रकुमार गुप्त आदिने समाधान नदीपरक अर्थसे माना है : नाना प्रकारकी सैकड़ों लहरोंसे लोगोंको लील लेने वाली 'क' (जल) वाली, दुर्निवार (नदियाँ), द्रव्य (द्रु = वृक्षके विकार शाखा, तना आदि) का हरण कर लिये गये जनयुक्त मैदानी भूभागको छोड़कर धनवान् (रत्नाकर) के प्रति गमन करती हैं। इस व्याख्यामें क्लिष्टता अधिक है ॥ ११७ ॥ (११) समान-शब्दा—प्रकृत ११८वें श्लोकमें प्रसिद्ध 'प्रबाल' को 'प्र + बाल' में तोड़कर 'प्रकृष्ट (प्र) केश (बाल') से कल्पित पर्यायसे कहा है : जो प्रवाल (मूँगे अथवा कोंपल) से उत्कृष्ट है। 'भूमि' शब्द 'धरा' का पर्याय है। अतः 'अभूमि = अ-धर नाम वाला (अधरोष्ठ)' इस प्रकार, पर्याय- कल्पना की गई है। सुन्दरीके प्रवालके समान रक्तवर्ण अधरकी प्रशंसाको इस प्रकार कल्पित पर्यायके द्वारा घुमाफिराकर कहनेसे यहाँ समान-शब्दा प्रहेलिका है ॥ ११८ ॥ (१२) सम्मूढा—प्रकृत ११९वें श्लोकमें कविने 'उसी प्रकार सोये हुए प्रेमी-प्रेमिका मुँह चूमने लगे,' कहकर भी व्यामोहको बनाये रखा है : जैसे सोये हुए थे, वैसे ही सोये हुए वे मुँह कैसे चूम सकते हैं ? 'तथैव' का अर्थ है १. 'बवयोरभेदः' धारणाके कारण 'वाल = बाल' अभीष्ट है ।