भारतकोश
काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary

महाकवि दण्डी द्वारा

DevanagariHindipublished270 पृष्ठ

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पृष्ठ 168

३।११७] ४. प्रहेलिकाके भेदोंके उदाहरण १४५ (१०) हृत-द्रव्यं जनं त्यक्त्वा धनवन्तं व्रजन्ति काः । नाना-भङ्गि-शताकृष्ट-लोका ? वेश्या न दुर्धराः ॥ ११७ ॥ (१०) नाना प्रकारके हाव-भावोंके सैकड़ों प्रकारोंसे लोगोंको आकृष्ट करने वाली कौन ले लिये गये द्रव्य (धन) वाले लोगोंको छोड़कर धनवान्‌के पास जाती हैं ? काबूमें आनेमें कठिन वेश्याएँ नहीं ॥ ११७ ॥

और 'सनातन' कहकर फिर उसका निषेध किया है। इससे श्रोताकी बुद्धि भ्रान्त हो जाती है। उसका समाधान निम्न प्रकारसे होगा : 'पार्थिव' से यहाँ 'पृथिवीपति' अर्थ अभिप्रेत नहीं है, अपितु 'वृक्ष' अभीष्ट है ।१ कोई वृक्ष ऐसा है, जो आरम्भमें तो 'राजा' है, और वह (स) नहीं (न) अतन ('तन' शब्दसे रहित) है (स न अतनः च न), अर्थात् 'अतन' है : राजन् + अतन = राजातन है । यह 'राजातन' वृक्ष है, न राजा (भूमिपति) है, और न 'सनातन' (नित्य) है। कोषोंके अनुसार क्षीरिका अपरनाम पियाल, खीरणी वृक्षको मीठे फलों के कारण राजभोग्य होनेसे 'राजादन' कहते हैं । दक्षिणकी भाषाओंमें वर्गोंके प्रथम तीन वर्ण एक-दूसरेके स्थानमें प्रयुक्त हो जाते हैं। अतः दक्षिणमें इसे 'राजातन' भी कहते हैं । यह वर्तनी संस्कृतमें भी स्वीकृत हो गई थी ।२ इसी 'राजातन' वृक्षके नाममें नाना अर्थोंकी विधि और निषेधके रूपमें कल्पना इस उक्तिमें की गई है। अतः यहाँ 'नामान्तरिता' प्रहेलिका है ॥ ११६ ॥ (१०) निभृता--प्रकृत ११७वें श्लोकमें कविने जो उक्ति प्रस्तुत की है, वह श्रोताको अर्थके कारण व्यामोहकारी है। क्योंकि इसमें आपाततः प्रतीत होने वाले वेश्याके धर्मोंके समान धर्म वाले पदार्थको छुपाकर कहा है । रत्नश्रीज्ञान, वादी जङ्घाल देव और तरुण वाचस्पतिने उक्त धर्मोंकी समानता श्रीसे मानी है : स्थावर, जङ्गम गज, रत्न, भूमि, धन-धान्य आदि नाना प्रकार वाली लक्ष्मी नष्ट-द्रव्य मनुष्यको छोड़कर धनवानको चली १. 'पार्थिव' की दो व्युत्पत्तियाँ हैं : (१) पृथिव्या विकारः, 'पृथिव्या वाञौ' (वार्तिक ४।१।८५); (२) पृथिव्या ईश्वरः, 'सर्वभूमि-पृथिवीभ्यामणञौ' (अष्टा० ५।१।४१), 'तस्येश्वरः' (४२)। पार्थिवो नृपतौ, भूमिविकारे पार्थिवोऽन्यवत् (विश्वकोष) । २. 'राजादनं प्रसरको राजातनः' इति वाचस्पतिः (अमरकोष २।४।३५ पर र(माश्रमी) ।