काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary
महाकवि दण्डी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३।१२०] ४. प्रहेलिकाके भेद १४७ (१३) विजितान्न-भव-द्वेषि-गुरु-पाद-हतो जनः । हिमापहामित्र-धरैर्व्याप्तं व्योमाऽभिनन्दति ? ॥ १२० ॥ (१३) पक्षी द्वारा जीते हुए अन्न (भक्षणीय पदार्थ) वालेसे जनमने वाले को द्वेष करने वालेके पाँवोंसे हत (लतियाया हुआ) आदमी बर्फको नष्ट करने वालेके शत्रुको धारण करने वालोंसे व्याप्त आकाशका अभिनन्दन करता है ॥ १२० ॥ 'वैसे ही' । श्लोकके पूर्वार्धमें 'शयितौ' की पूर्वक्रिया 'परावृत्य' दी है । 'तथैव' से 'परावृत्य' का ही परामर्श है : पीठफेरकर सोये हुओने जब वैसे ही (परा- वर्तन) किया, तो उनके मुँह अपने आप आमने-सामने हो गये, और राग के कारण स्वैर (आवेशपूर्ण) चुम्बन सम्भव हो गया । इस प्रकार यहाँ 'तथैव' से साक्षात् निर्देश होते हुए भी अर्थके विषयमें सम्मोह बना रहता है । अतः यह सम्मूढा प्रहेलिका है ।² शयितौ पद शीङ् स्वप्ने (अदादि०) से अकर्मक होनेके कारण कर्तृवाक्य में 'क्त' से निष्पन्न 'शयित' का एकशेष है : शयितश्च शयिता च ।³ कामिनौ —कामोऽनुरागोऽस्त्यस्येति कामी । कामी च कामिनी चेति कामिनौ (एक- शेष । १।१६ ॥ (१३) पारिहारिकी — प्रकृत १२०वें श्लोकमें 'ग्रीष्मके सूर्यकी किरणोंसे १. 'हिमापहा...व्योम' को भामहने 'अवाचकत्व' दोषके उदाहरणके रूपमें प्रस्तुत किया है । और भोजने समूचे श्लोकको 'क्लिष्ट' नामक पददोषके उदाहरणके रूपमें : 'हिमापहामित्रधरैर्व्याप्तं व्योमेत्यवाचकम् । साक्षाद्रूढं वाच्येऽर्थे नाभिधानं प्रतीयते ॥ काव्याल० १।४१ दूरे यस्र्यार्थसंवित्तिः क्लिष्टं नेष्टं हि तत् सताम् । सरस्वती० १।११ 'विजितात्म...नन्दति ।।' अत्र...व्यवहितार्थप्रत्ययं क्लिष्टमेतत् । २. दण्डीको इस भावकी प्रेरणा कदाचित् अमरुशतकके निम्न श्लोकसे मिली है : एकस्मिञ्शयने पराङ्मुखतया वीतोत्तरं ताम्यतो- रन्योन्यस्य हृदि स्थितेऽप्यनुनये संरक्षतोगौरवम् । दम्पत्योः शनकैरपाङ्गवलनामिश्रीभवच्चक्षुषोर् भग्नौ मानकलिः सहासरभसंव्यावृत्तकण्ठग्रहम् ॥ २१ ३. अष्टा० ३।४।७२ : गत्यर्थाकर्मक-श्लिष-शीङ्-स्थाऽऽस-वस-जन-रुह-जीर्यति- भ्यश्च । १।२।६४ : सरूपाणामेकशेष एकविभक्तौ । ६७ : पुमान् स्त्रिया ।