काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary
महाकवि दण्डी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१२२ काव्यादर्श [३।६७ क्रीडा-गोष्ठी-विनोदेषु तज्ज्ञैराकीर्ण-मन्त्रणे । पर-व्यामोहने चापि सोपयोगाः प्रहेलिकाः ॥ ६७ ॥ (१) खेलों, गोष्ठियों, मनोरञ्जनके अवसरोंपर, (२) भीड़में बातचीत करनेमें और (३) दूसरोंको विशेष रूपसे भुलावा देने (चकराने) में प्रहेलि- काएँ उनके जानकारोंके द्वारा उपयोगी (लाभकारी) होती हैं ॥ ६७ ॥ ऐसे यमकको नाममात्रका यमक कहते हैं, जिसमें नाना धातु अथवा अर्थ गूढ़ रहते हैं । पर अर्थोंकी गूढ़ताके कारण वे इसे ‘प्रहेलिका’ मानते हैं, यमक नहीं । भामहके इस कथनसे प्रहेलिकामें (१) धातु तथा (२) अर्थकी गूढ़ता लक्षण सिद्ध होती है । ‘धातु’ उपलक्षक है नाम उपसर्ग आदि प्रकारके शब्दों का । इस प्रकार प्रहेलिकाके (१) शब्दगूढ़ और (२) अर्थगूढ भेद भामहको अभिप्रेत प्रतीत होते हैं । पर भामहका प्रहेलिकाको ‘यमक’ कहना कुछ जँचता नहीं है : यमकमें तो तुल्यश्रुति वर्णोंकी आवृत्ति मुख्य स्वरूपलक्षण धर्म है; प्रहेलिकाके स्थलमें वह अनुप्रास, उपमा आदिके समान आनुषङ्गिक तो हो सकती है, पर स्वरूपगत कैसे हो सकती है ? दण्डीने (श्लोक १०६ में) सोलह प्रकारकी पहेलियाँ पूर्वाचार्यों द्वारा निर्दिष्ट बताई हैं । रत्नश्रीज्ञानने पूर्वाचार्योंकी व्याख्या ‘रामशर्मादिभिः’ की है । कह नहीं सकते कि उन्होंने यह नामोल्लेख सुनी-सुनाई बातके आधारपर किया है, या रामशर्माके ग्रन्थको देखकर किया है । पर दण्डीने (श्लोक १०६ में) पूर्वाचार्योंको अभिमत १६ साधु और १४ दुष्ट प्रहेलिकाओंकी बात ठोस आधारपर (उनके ग्रन्थ देखकर) ही की लगती है । दण्डी द्वारा प्रस्तुत पूर्वा- चार्यसम्मत ये सोलह प्रहेलिकायें यमकके संस्पर्शसे रहित हैं । इससे अनुमान किया जा सकता है कि पूर्वाचार्यों रामशर्मा आदिकी प्रहेलिकाओंमें भी यमक तत्त्व आवश्यक नहीं रहा होगा, अन्यथा दण्डीके लक्षणोदाहरणोंमें यमक- संस्पर्श पूर्वपक्षके रूपमें ही सही, अवश्य, मिलता ॥ ६६ ॥ प्रहेलिकाओंकी उपयोगिता - दण्डीने प्रहेलिकाका सामान्य लक्षण न देकर भेदोंके लक्षणमें उसे स्पष्ट किया है । षोडशभेद निरूपणसे पूर्व आचार्यने एक (६७) श्लोकमें पहेलियोंका प्रयोजन बताया है । वात्स्यायनके अनुसार नाग- रककी दिनचर्यामें अपराह्नका समय गोष्ठी-विहारके लिये नियत था । इसके अतिरिक्त किसी निमित्तसे, पर्वोंपर, या पक्ष अथवा मासमें किसी एक घोषित दिन समान विद्या, बुद्धि, शील, आर्थिक स्थिति और वयस् वाले लोगोंका