भारतकोश
काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary

महाकवि दण्डी द्वारा

DevanagariHindipublished270 पृष्ठ

पृष्ठ 152, कुल 270 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 152

३।१०३] ४. प्रहेलिकाके भेद १२६ (११) समान-शब्दोपन्यस्त-शब्द-पर्याय-साधिता ।¹ (१२) सम्मूढा नाम, या साक्षान्निर्दिष्टार्थापि मूढये ॥ १०३ ॥ (११) शब्दके उपकल्पित पर्यायसे सिद्ध की हुई समान-शब्दा होती है । (१२) सम्मूढा नामक वह होती है, जो सीधे-सीधे (अभिधासे) निर्दिष्ट अर्थ वाली होते हुए भी व्यामोह उत्पन्न करती है ।। १०३ ।। (गुण) वाले पदार्थको छूने वाले, शब्दके कारण वैसी विवक्षितके समान अन्य अर्थका अभिधान करने वाली वाणी जो प्रयुक्त होती है; (क) इस अर्थका पर्यवसान (निभृतता) विवक्षित अर्थमें होता है; अथवा (ख) तुल्यधर्मस्पर्शी वाणीके कारण निभृत (निगूढ गृहीतकी अपेक्षासे अन्य) अर्थ जिसमें अभिधेय है, वह इस प्रकारकी पहेली 'निभृता' कही जाती है ।² 'तुल्य-धर्म स्पृशा गिरा' अंशकी इन दोनों व्याख्याओंमें तत्त्वतः कोई अन्तर नहीं है : (१) प्रथम व्या- ख्यामें धर्मके द्वारा धर्मीका ग्रहण निष्पन्न होता है; (२) द्वितीयमें बहुव्रीहिसे धर्मीका सीधे ग्रहण होता है । 'निभृतान्यार्था' की दो व्याख्याओंमें विधि- मुखता और निषेधमुखताका अन्तर है : (क) 'निभृत' का अर्थ प्रथम व्याख्यामें 'व्यवस्थित', 'निष्ठित' है; (ख) द्वितीय व्याख्यामें 'अप्रकट', 'निगूढ' है । वादिजङ्घालदेवने 'निभृत-गोपित' ही कहा है । उदाहरण ११७वें श्लोकमें है ।। १०२ ।। (११) समान-शब्दा — जो उक्ति विवक्षित शब्दके उपन्यस्त = कल्पित (घुमा-फिराकर बनाये गये) पर्याय (समानार्थक) शब्दोंसे साधित (ग्रथित) होती है, वह 'समान-शब्दा' प्रहेलिका कहलाती है । यहाँ 'पर्याय' शब्द अपने १. रत्नश्री : 'उपन्यस्त-पर्यायार्थ-प्रसाधिता' इत्यपि पाठः । २. रत्नश्री : या दर्शितान्यार्था, निभृतो व्यवस्थितो वाऽन्यार्थोऽभिधेयं यस्या- मिति निभृतान्यार्थाऽभिधेयान्तरात् । कथम् ? (१) तुल्यं समानमुभयत्र वृत्तेः, धर्ममर्थरूपं, तन्निमित्तीकृत्य प्रवृत्तेः, स्पृशतीति तुल्यधर्मस्पृक् । (२) तुल्यो वा विवक्षितेनार्थेन सदृशो धर्मो गुणोऽस्येति तुल्यधर्माणमर्थं स्पृशतीति तुल्यधर्मस्पृक् । तया (क) तुल्यधर्मस्पृशा गिरा शब्देन हेतुना तादृशी गीः प्रयुज्यते, या विवक्षितसदृशमर्थान्तरमभिधाना, तत्रैव विव- क्षितेऽर्थे निष्ठाऽस्येति । (ख) यद्वा तुल्यधर्मस्पृशा गिरा कारणेन निभृतोऽ- प्रकटोऽन्यो गृहीतार्थापेक्षयाऽर्थोऽभिधेयं यस्यामिति योज्यम् । सा तादृशी प्रहेलिका निभृताऽऽख्यायते ।