भारतकोश
काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary

महाकवि दण्डी द्वारा

DevanagariHindipublished270 पृष्ठ

पृष्ठ 153, कुल 270 में से

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पृष्ठ 153

१३० काव्यादर्श [ ३।१०३ रूढ ‘अल्पान्तरसमानार्थक प्रसिद्ध वाचक शब्द’ अर्थमें प्रयुक्त नहीं है । इस व्याख्यामें ‘उपन्यस्त’ शब्द ‘पर्याय’ का विशेषण है । वादीजीने ‘उपन्यस्त’ को ‘शब्द’ का विशेषण बनाकर अर्थ यों किया है : उपन्यस्त (प्रयुक्त) शब्दके पर्याय (समानार्थक रूढ शब्द) के द्वारा सम्पादित अर्थ वाली प्रहेलिका ‘समान-शब्दा’ कहलाती है ।¹ इस व्याख्यामें पर्याय शब्द उपन्यस्त शब्दसे कल्पित होता है, साक्षात् प्रयुक्त नहीं होता । रत्नश्रीज्ञानकी व्याख्यामें कल्पना- बाहुल्य है । संस्कृतमें कल्पित पर्यायोंका प्रयोग आम बात है । ‘हस्तिनापुर’ को ‘नागसाह्वयपुर’ कहना, ‘भ्रमर’ को ‘द्विरेफ’ कहना एवं ‘चक्रवाक’ को ‘रथाङ्गनामा’ कहना, इसी प्रकारका कल्पित पर्याय है । पर ये सब अभि- व्यक्तियाँ दुरूह न होनेसे व्यामोहकारी नहीं हैं, क्योंकि किसी स्तरपर इनमें अर्थान्तर-समानार्थता है । ‘प्रकृष्ट बालों वाला’ कहना ‘प्रवाल’ (मूँगे) का पर्याय उसी प्रकार नहीं है, जैसे ‘दिल लेने वाली’ कहना ‘दिल्ली’ का सही पर्याय नहीं है, कल्पित पर्याय है । ऐसे कल्पित पर्यायोंसे साधित उक्ति श्रोताको अवश्य उलझनमें डालती है । अतः वह ‘प्रहेलिका’ नामक चित्रालङ्कार है । ‘समान शब्द’ का अर्थ ‘पर्याय’ होता है । इस प्रकारके कल्पित समान शब्दके प्रयोगके कारण यह प्रहेलिकाप्रकार ‘समान-शब्दा’ कहलाता है । रत्नश्रीमें लक्षणांशका पाठान्तर उपन्यस्त-पर्यायार्थ-प्रसाधिता’ बताया है : उपन्यस्त अर्थके अनुगम (प्रतीति) से कल्पित, उस अर्थको प्रकाशित करनेके कारण पर्यायरूप शब्दान्तरके अर्थमें प्रसाधित प्रहेलिका ‘समानशब्दा कहलाती है ।² अर्थको छुपाकर कहनेके कारण यह अर्थ-गूढा है । उदाहरणार्थ ११८वाँ श्लोक देखें । (१२) सम्मूढा — सीधे-सीधे अभिधासे अर्थका निर्देश (कथन) की हुई होते हुए भी जो उक्ति अभिव्यक्तिकी अस्पष्टताके कारण श्रोताको भ्रममें डालती है, वह ‘सम्मूढा कहलाती है । साक्षात् निर्देश न होनेपर व्यामोह १. रत्नश्री : उपन्यस्तेन = तदर्थानुसारेण कल्पितेन, शब्दस्य विवक्षितत्वा- वाचकत्वेन प्रसिद्धस्य तदर्थप्रकाशनात् पर्यायेण = शब्दान्तरेण साधिता । वादिटीका : सा समानशब्दा नाम यस्यामुपन्यस्तो यः शब्दः, तस्य यः पर्यायः, तेन साधितः = सम्पादितोऽर्थः । २. रत्नश्री : ‘उपन्यस्त-पर्यायार्थ-प्रसाधिता’ इत्यपि पाठः । तत्र उपन्यस्तार्था- नुगमकल्पितस्य, तदर्थ-प्रकाशनात् पर्यायस्य = शब्दान्तरस्य, अर्थे प्रसाधिता = ‘उपन्यस्तपर्यायार्थ-प्रसाधिता’ इति व्याख्येयम् ।