भारतकोश
काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary

महाकवि दण्डी द्वारा

DevanagariHindipublished270 पृष्ठ

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पृष्ठ 147

१२४ काव्यादर्श [३।६७ बीत) कर ली जाती है । (३) लोगोंको गूढ शब्द अथवा गूढार्थके प्रयोगसे चक्करमें डालना भी पहेलीका प्रयोजन है । इन तीनों प्रयोजनोंमें अन्तिम प्रयोजन ही पहेलियोंका मुख्य प्रयोजन है । वैदिक साहित्यमें गूढार्थक बहुतसे मन्त्र उपलब्ध हैं, जिनकी गूढार्थताका प्रयो- जन श्रोताओंको चक्करमें डालना है । प्रसिद्ध अस्यवामीय (ऋ० १।१६४) सूक्तके १-४, ७, ११-२०, २२, ३२, ४१, ४८ मन्त्र ठेठ पहेलियाँ ही हैं, जिन्हें समझ न पानेपर श्रोताको ऋषिसे पूछना पड़ा होगा : महाराज, अब इनका अर्थ समझाइये । अथर्ववेदका तो एक पूरा सूक्त (२०।१३३) ही 'पहेलियोंका सूक्त' कहा जाता है ।१ ऐतरेय महीदासने इन्हें 'प्रवह्निका' कहा है : असुरों को पहेलियोंमें उलझनमें डालकर देव लोग उनसे आगे बढ़ गये । यजमान भी पहेलियोंसे अपने शत्रुको उलझाकर उनसे आगे बढ़ जाते हैं ।२ आचार्य रुद्रटने इन तीनों प्रयोजनोंमें दण्डीकी 'क्रीडा' को ही उपयुक्त माना है ।३ उनकी दृष्टि कदाचिद् यह है कि पहेलियोंसे परव्यामोहन क्रीडा (मनोविनोद) का ही साधन है, साध्य नहीं । परव्यामोहन साध्य होनेपर शत्रुता पनपती है, जो काव्यका प्रयोजन नहीं हो सकती । पर भोजने (सरस्वती० २।१३४में) दण्डीकी दृष्टिका ही अनुकरण किया है । स्पष्ट ही ये सब बातें महाकाव्यमें यत्र-तत्र-सर्वत्र आने वाली स्थितियाँ नहीं हैं । अतः महाकाव्यमें तो इनका प्रयोग सीमित ही होगा । हाँ, मुक्तक आदि छोटे बन्ध इनका स्वतन्त्र क्षेत्र हैं । पर उनमें भी अवसर और प्रयोजन सीमित ही हैं । यही कारण है कि अच्छे कवि तथा काव्यशास्त्री पहेलियोंको अधिक प्रोत्साहन नहीं देते । किन्तु भामहका यह कहना भी उचित नहीं है कि गूढशब्दार्थ होनेके कारण व्याख्यागम्य होनेसे प्रहेलिकायें हेय हैं ।४ सहृदयोंके १. बृहद्देवता १।५७ : वितताऽऽदिः* प्रवह्निका । अथर्व २०।१३३ । २. प्रवह्निकाः शंसति । प्रवह्निकाभिर्वै देवा असुरान्* प्रवल्ह्याथैनान- त्यायन् । तथैवैतद् यजमानाः प्रवह्निकाभिरेवाप्रियं भ्रातृव्यं प्रवल्ह्याथैन- मति यन्ति । सायण : 'विततौ किरणौ द्वौ' (अथर्व० २०।१३३) इत्याद्या षडनुष्टभः प्रवह्निकाऽऽख्याः । *इन शब्दोंकी वर्तनीके लिये देखें निरुक्त के पाँच अध्याय, ७।११, पृष्ठ ५६६ । ३. मात्रा-बिन्दु-च्युतके, प्रहेलिका, कारक-क्रिया-गूढे । प्रश्नोत्तरादि चान्यत् क्रीडामात्रोपयोगमिदम् ।। काव्याल० ५।२४ ४. काव्यान्यपि यदीमानि व्याख्यागम्यानि शास्त्रवत् । उत्सवः सुधियामेव, हन्त दुर्मेधसो हताः ।। काव्याल० २।२०