भारतकोश
काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary

महाकवि दण्डी द्वारा

DevanagariHindipublished270 पृष्ठ

पृष्ठ 148, कुल 270 में से

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पृष्ठ 148

३। - ८] ४. प्रहेलिकाओंके लक्षण १२५ (१) आहुः समागतां नाम गूढार्थां पद-सन्धिना । (२) वञ्चिताऽन्यत्र रूढेन यत्र शब्देन वञ्चना ॥ ६८ ॥ (१) पदों (सुबन्त-तिङन्तरूप शब्दों) की सन्धिसे जिस उक्तिका अर्थ छुप जाता है, उसे समागता कहते हैं । (२) अन्य अर्थमें प्रसिद्ध शब्दका प्रयोग करके जहाँ छला जाता है, वह वञ्चिता (कहलाती) है ॥ ६८ ॥

छोटे-मोटे जमावड़ोंमें इस तरहके हल्के-फुल्के काव्य लोकहृदयग्राही होते हैं । यह अनुभवसिद्ध है, किसी आचार्यवचनकी अपेक्षा नहीं करता ॥ ६७ ॥ आचार्य दण्डीने प्रहेलिकाओंका निरूपण तीन क्रमोंमें किया है : (१) ६८- १०४।। तकके श्लोकोंमें पन्द्रह शुद्ध प्रहेलिकाओंके लक्षण बतानेके बाद इनके सङ्करसे निष्पन्न सङ्कीर्ण प्रहेलिका प्रकारको बताया है; (२) पूर्वाचार्यसम्मत दोषयुक्त चौदह प्रहेलिकाओंका अभिधान न करनेका हेतु १०६-१०७ में बताया है; (३) फिर १०८-१२२ तक पन्द्रह शुद्ध प्रहेलिकाओंके पन्द्रह उदा- हरण देकर १२३ में उदाहृत संकीर्ण प्रहेलिकामें सङ्कीर्ण पहेलियाँ बताकर इस उदाहरणको अन्य भेदोंके साङ्कर्यका उपलक्षक बताया है । सभी प्रहेलिकाओंमें सामान्य तत्त्व परव्यामोहन है । व्यामोहन कहीं शब्दका स्वरूप समझ न आनेसे आता है, तो कहीं अर्थकी दुरूहताके कारण आता है । शब्द और अर्थ को दुरूह बनानेके प्रकारोंमें भेद होनेसे ये प्रहेलिकायें एक-दूसरेसे भिन्न हैं । इन सोलह भेदोंके अतिरिक्त पूर्वाचार्य चौदह दोषयुक्त प्रहेलिकायें भी मानते थे, यह दण्डीने बताया है । (१) समागता—यह पहेली विशुद्ध रूपसे शब्दगूढा है । दो पदोंमें स्वर- सन्धि या व्यञ्जनसन्धिसे जब भिन्न प्रकारका शब्द निष्पन्न हो जाता है, तब पदके स्वरूपके विषयमें श्रोताकी बुद्धि भ्रान्त हो जाती है । उस उक्तिका वास्तविक अर्थ छुप जाता है । इस प्रकारकी यह प्रहेलिका पदोंके समागम (सन्धान) के कारण निष्पन्न होनेसे 'समागता' कहलाती है । इसका उदाहरण आचार्यने १०८वें श्लोकमें दिया है । (२) वञ्चिता—विवक्षितसे भिन्न अर्थमें प्रसिद्ध शब्दका प्रयोग करके उससे जहाँ विवक्षितार्थका गोपन किया जाये, वह प्रहेलिका 'वञ्चिता' होती है । इस प्रकार अन्यार्थक शब्दके प्रयोगसे श्रोताकी सही अर्थका बोध नहीं होता, वह भ्रान्त हो जाता है । इस प्रकार वञ्चन (छलने) के कारण यह पहेली 'वञ्चिता' है । 'वञ्चिता' पद 'वञ्चितं = वञ्चनमस्त्यस्यां' व्युत्पत्तिसे