भारतकोश
काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary

महाकवि दण्डी द्वारा

DevanagariHindipublished270 पृष्ठ

पृष्ठ 149, कुल 270 में से

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पृष्ठ 149

१२६ काव्यादर्श [३।६६-१०० (३) व्युत्क्रान्ताऽतिव्यवहित-प्रयोगान्मोहकारिणी । (४) सा स्यात् प्रमुषिता, यस्यां दुर्बोधार्था पदावली ॥ ६६ ॥ (५) समानरूपा गौणार्थारोपितैर्ग्रथिता पदैः । (३) पादोंके अधिक व्यवधानसे प्रयोगके कारण (अर्थके बारेमें) भ्रान्ति करने वाली व्युत्क्रान्ता (होती है) । (४) वह प्रमुषिता होती है, जिसमें पदसमूह कठिनाईसे समझमें आने वाले अर्थसे युक्त होता है ॥ ६६ ॥ (५) गौण (लाक्षणिक) अर्थोंमें आरोपित पदोंसे विरचित (प्रहेलिका) समान-रूपा होती है । ‘प्रहेलिका’ का विशेषण है । यहाँ वञ्चन (प्रतारण) शब्दके द्वारा नहीं, अपितु अन्य अर्थमें रूढ शब्दके माध्यमसे गूढ हुए अर्थके द्वारा होता है । अर्थ के द्वारा अर्थके विषयमें भ्रान्ति करनेसे यह अर्थगूढा है । उदाहरणार्थ १०६ वाँ श्लोक देखें ॥ ६८ ॥ (३) व्युत्क्रान्ता—पदोंके अत्यन्त व्यवहित प्रयोग (विन्यास) से अन्वय में कठिनाई आ जाती है, जिससे श्रोताको अर्थके विषयमें व्यामोह हो जाता है । व्युत्क्रमणसे विन्यास शब्दका धर्म है, जिससे प्रभावित होता है पदोंका परस्पर सम्बन्ध (अन्वय) । सम्बन्ध अर्थगत होता है । अतः यह प्रहेलिका भी अर्थगूढा ही है । पदोंके सम्बन्धके निश्चित न होनेसे या तो (i) अर्थका निश्चय ही नहीं होगा, या (ii) विपरीत अर्थका अवबोध भी हो सकता है । इस प्रहेलिकामें व्यामोहका आदि कारण पदोंका व्युत्क्रम (व्यवहित प्रयोग) है । अतः इसे ‘व्युत्क्रान्ता’ कहा गया है । यहाँ ‘क्त’ प्रत्यय कर्त्रर्थमें है । इसका उदाहरण ११०वें श्लोकमें है । (४) प्रमुषिता—जिस प्रहेलिकामें शब्दावलीका अर्थ स्वरूपतः ही दुर्बोध हो, तो वह अर्थका अपहरण (प्रमोषण) हो जानेसे ‘प्रमुषिता’ कहलाती है । यह भी अर्थगूढा है । उदाहरण १११वें श्लोकमें है ॥ ६६ ॥ (५) समानरूपा—प्रहेलिकाके ग्रथनमें प्रयुक्त पद अपने प्रसिद्ध मुख्यार्थके वाचक न होकर उनके वाच्य पदार्थके गुणोंसे साम्यके कारण उन गुणोंसे युक्त किसी अन्य पदार्थको लक्षित करते हों, तब समान पदार्थके आरोपके कारण यह प्रहेलिका ‘समान-रूपा’ कहलाती है । यह आरोप प्रायः समासोक्तिकी सृष्टि करता है । यह प्रहेलिका भी अर्थगूढा है । शब्दोंसे किसी वस्तुका वर्णन प्राप्त होते हुए भी अन्य सदृश पदार्थकी विवक्षा साधारण जनके लिये दुर्बोध होती है, अतः यह दुष्कर चित्र शब्दालङ्कार है । उदाहरण ११२वें श्लोकमें है ।