काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary
महाकवि दण्डी द्वारा
१२६ काव्यादर्श [३।६६-१०० (३) व्युत्क्रान्ताऽतिव्यवहित-प्रयोगान्मोहकारिणी । (४) सा स्यात् प्रमुषिता, यस्यां दुर्बोधार्था पदावली ॥ ६६ ॥ (५) समानरूपा गौणार्थारोपितैर्ग्रथिता पदैः । (३) पादोंके अधिक व्यवधानसे प्रयोगके कारण (अर्थके बारेमें) भ्रान्ति करने वाली व्युत्क्रान्ता (होती है) । (४) वह प्रमुषिता होती है, जिसमें पदसमूह कठिनाईसे समझमें आने वाले अर्थसे युक्त होता है ॥ ६६ ॥ (५) गौण (लाक्षणिक) अर्थोंमें आरोपित पदोंसे विरचित (प्रहेलिका) समान-रूपा होती है । ‘प्रहेलिका’ का विशेषण है । यहाँ वञ्चन (प्रतारण) शब्दके द्वारा नहीं, अपितु अन्य अर्थमें रूढ शब्दके माध्यमसे गूढ हुए अर्थके द्वारा होता है । अर्थ के द्वारा अर्थके विषयमें भ्रान्ति करनेसे यह अर्थगूढा है । उदाहरणार्थ १०६ वाँ श्लोक देखें ॥ ६८ ॥ (३) व्युत्क्रान्ता—पदोंके अत्यन्त व्यवहित प्रयोग (विन्यास) से अन्वय में कठिनाई आ जाती है, जिससे श्रोताको अर्थके विषयमें व्यामोह हो जाता है । व्युत्क्रमणसे विन्यास शब्दका धर्म है, जिससे प्रभावित होता है पदोंका परस्पर सम्बन्ध (अन्वय) । सम्बन्ध अर्थगत होता है । अतः यह प्रहेलिका भी अर्थगूढा ही है । पदोंके सम्बन्धके निश्चित न होनेसे या तो (i) अर्थका निश्चय ही नहीं होगा, या (ii) विपरीत अर्थका अवबोध भी हो सकता है । इस प्रहेलिकामें व्यामोहका आदि कारण पदोंका व्युत्क्रम (व्यवहित प्रयोग) है । अतः इसे ‘व्युत्क्रान्ता’ कहा गया है । यहाँ ‘क्त’ प्रत्यय कर्त्रर्थमें है । इसका उदाहरण ११०वें श्लोकमें है । (४) प्रमुषिता—जिस प्रहेलिकामें शब्दावलीका अर्थ स्वरूपतः ही दुर्बोध हो, तो वह अर्थका अपहरण (प्रमोषण) हो जानेसे ‘प्रमुषिता’ कहलाती है । यह भी अर्थगूढा है । उदाहरण १११वें श्लोकमें है ॥ ६६ ॥ (५) समानरूपा—प्रहेलिकाके ग्रथनमें प्रयुक्त पद अपने प्रसिद्ध मुख्यार्थके वाचक न होकर उनके वाच्य पदार्थके गुणोंसे साम्यके कारण उन गुणोंसे युक्त किसी अन्य पदार्थको लक्षित करते हों, तब समान पदार्थके आरोपके कारण यह प्रहेलिका ‘समान-रूपा’ कहलाती है । यह आरोप प्रायः समासोक्तिकी सृष्टि करता है । यह प्रहेलिका भी अर्थगूढा है । शब्दोंसे किसी वस्तुका वर्णन प्राप्त होते हुए भी अन्य सदृश पदार्थकी विवक्षा साधारण जनके लिये दुर्बोध होती है, अतः यह दुष्कर चित्र शब्दालङ्कार है । उदाहरण ११२वें श्लोकमें है ।
३।१००-१०२] ४. प्रहेलिकाके भेद १२७ (६) परुषा लक्षणास्तित्व-मात्र-व्युत्पादित-श्रुतिः ॥१००॥ (७) सङ्ख्याता नाम सङ्ख्यानं यत्र व्यामोहकारणम् । (८) अन्यथा भासते यत्र वाक्यार्थः, सा प्रकल्पिता ॥ १०१ ॥ (६) सा नामान्तरिता यस्या नाम्नि नानाऽर्थकल्पना । (६) पदोंके निरूपक शास्त्र (व्याकरण) के सद्भाव मात्रसे व्युत्पन्न किये गये पदों वाली परुषा होती है ॥ १०० ॥ (७) जिसमें गिनती उलझाने वाली होती है, वह सङ्ख्याता है । (८) जहाँ वाक्यका अर्थ (इष्टसे) भिन्न प्रकारसे प्रतीत होता है, वह प्रकल्पिता है ॥ १०१ ॥ (६) वह (पहेली) नामान्तरिता (दूसरे नामपदसे युक्त) होती है, जिसके नाम (सञ्ज्ञापद) में विभिन्न (अनेक) अर्थोंकी कल्पना होती है । (६) परुषा जिस प्रहेलिकामें ऐसे शब्दोंका प्रयोग किया जाता है, जिनका लोकमें प्रयोग नहीं होता । शब्दोंके व्युत्पादक शास्त्र व्याकरणके सूत्रोंमें उनकी व्युत्पत्ति अवश्य प्रतिपादित होती है । व्यवहार और काव्यके क्षेत्रसे बाहरके शास्त्राभ्याससे ही ज्ञेय ऐसे शब्द कोमलमति लोगोंको चावलमें कंकड़की तरह कठोर लगते हैं । अतः इस प्रकारके प्रयोग जब विनोदार्थ किये जायें, तो वे कोमलमति नागरिकोंको खूब व्यामूढ करते हैं । प्रहेलिकाका उप- योग ही परव्यामोहनार्थ है । इस लिये ऐसे प्रयोग प्रहेलिकामें शोभाकारक होते हैं । काव्यके सामान्य प्रकारमें भले ये प्रयोग दोष माने जाते हैं । यह अर्थगूढताका ही एक प्रकार है । उदाहरण ११३वें श्लोकमें देखें ॥ १०० ॥ (७) सङ्ख्याता—जिस उक्तिमें गिनती उलझानेवाली होती है, उसे ‘सङ्ख्याता’ प्रहेलिका कहा जाता है । ‘सङ्ख्या’ अर्थ है । अतः यह पहेली भी अर्थगूढा है । इसका उदाहरण ११४वें श्लोकमें है । (८) प्रकल्पिता—जिस उक्तिमें वाक्यार्थ विवक्षितसे अन्य रूपमें भासित होता है, वह वास्तविक नहीं होता । जानबूझकर अर्थान्तरका आभास करानेके कारण उस उक्तिको ‘प्रकल्पिता’ प्रहेलिका कहा जाता है । यह भी अर्थगूढा है । इसका उदाहरण ११५वें श्लोकमें है ॥ १०१ ॥ (६) नामान्तरिता—जिस उक्तिमें प्रयुक्त नाम (सञ्ज्ञा) पदोंमें अनेक अर्थोंकी कल्पनाकी जाती है, उसे ‘नामान्तरिता’ प्रहेलिका कहा जाता है ।
१२८ काव्यादर्श [३।१०२ (१०) निभृता निभृतान्यार्था तुल्य-धर्म-स्पृशा गिरा ॥ १०२ ॥ (१०) समान धर्मों (अथवा तुल्य धर्म वाले अर्थों) को स्पर्श करने वाली वाणी (शब्दों) से अन्य अर्थको छुपाने वाली पहेली निभृता होती है ॥१०२॥ (८) 'प्रकल्पिता' में अर्थान्तरकल्पना श्रोताको हो जाती है, वह कविको विवक्षित नहीं होती । अर्थात् कवि उन अनेक अर्थोंका वर्णन पहेलीमें नहीं करता, वह तो श्रोताको आभासित होती है; जब कि 'नामान्तरिता' में नाना अर्थ कविको विवक्षित होते हैं । प्रेमचन्द्र शर्मानि यहाँ 'नाम' से 'वस्तु' (अर्थ) ली है, केवल उसकी बोधक सञ्ज्ञा नहीं । इससे वर्णित पदार्थमें नाना (भिन्न) अर्थकी कल्पनासे भी 'नामान्तरिता' निष्पन्न हो जाती है ।¹ यह प्रहेलिका भी अर्थगूढा है । ११६वाँ श्लोक इसका उदाहरण है । (१०) निभृता—विवक्षित और अविवक्षित पदार्थोंके समान धर्मोंको छूने वाली पदावलीके प्रयोगसे अन्य अर्थको छुपाकर प्रस्तुत करने वाली उक्ति छुपानेके कारण 'निभृता' प्रहेलिका कहलाती है । आचार्य रत्नश्रीज्ञानने 'तुल्य-धर्म-स्पृशा गिरा' की दो व्याख्याएँ की हैं: (१) विवक्षित और अवि- वक्षित दोनोंमें वर्तमान होनेके कारण तुल्य=समान अर्थरूपी धर्मको, उसे निमित्त बनाकर प्रवृत्तिके कारण छूने वाले, (२) विवक्षित अर्थके समान धर्म १. रङ्गाचार्यरेड्डी, प्रभा : अत्राहू: प्रेमचन्द्रशर्माण:—लक्षणे 'नाम'-पदं च 'वस्तु'-परं, न तु 'सञ्ज्ञा' मात्रपरं बोध्यम् । तेन 'तरुण्याऽऽलिङ्गितः कण्ठे नितम्बस्थलमाश्रितः । गुरूणां सन्निधानेऽपि कः कूजति मुहुर्मुहुः ? ॥' अत्र 'सजल-कलश'-रूप-वस्तुनि वक्तव्ये प्रथमं नानाऽर्थकल्पनान् नामान्तरिता । एवं 'य एवादौ स एवान्ते मध्ये भवति मध्यमः । अस्यार्थं यो न जानाति, तन्मुखे तं ददाम्यहम् ॥' इत्यादावपि अत्र 'यवसः' प्रतिपाद्य इति । इस उदाहरणमें 'यः', में सर्वनामरूप नानार्थकी कल्पना होती है । उसके बाद नाम शब्दमें उसके घटक वर्णोंके आदि, अन्त और मध्य स्थानोंकी विचित्रतासे व्यामोह उत्पन्न किया गया है । अतः सङ्ख्याताके समान प्रहेलिकाका स्थान- कथनवैचित्र्यमूलक नूतन प्रकार है ।
३।१०३] ४. प्रहेलिकाके भेद १२६ (११) समान-शब्दोपन्यस्त-शब्द-पर्याय-साधिता ।¹ (१२) सम्मूढा नाम, या साक्षान्निर्दिष्टार्थापि मूढये ॥ १०३ ॥ (११) शब्दके उपकल्पित पर्यायसे सिद्ध की हुई समान-शब्दा होती है । (१२) सम्मूढा नामक वह होती है, जो सीधे-सीधे (अभिधासे) निर्दिष्ट अर्थ वाली होते हुए भी व्यामोह उत्पन्न करती है ।। १०३ ।। (गुण) वाले पदार्थको छूने वाले, शब्दके कारण वैसी विवक्षितके समान अन्य अर्थका अभिधान करने वाली वाणी जो प्रयुक्त होती है; (क) इस अर्थका पर्यवसान (निभृतता) विवक्षित अर्थमें होता है; अथवा (ख) तुल्यधर्मस्पर्शी वाणीके कारण निभृत (निगूढ गृहीतकी अपेक्षासे अन्य) अर्थ जिसमें अभिधेय है, वह इस प्रकारकी पहेली 'निभृता' कही जाती है ।² 'तुल्य-धर्म स्पृशा गिरा' अंशकी इन दोनों व्याख्याओंमें तत्त्वतः कोई अन्तर नहीं है : (१) प्रथम व्या- ख्यामें धर्मके द्वारा धर्मीका ग्रहण निष्पन्न होता है; (२) द्वितीयमें बहुव्रीहिसे धर्मीका सीधे ग्रहण होता है । 'निभृतान्यार्था' की दो व्याख्याओंमें विधि- मुखता और निषेधमुखताका अन्तर है : (क) 'निभृत' का अर्थ प्रथम व्याख्यामें 'व्यवस्थित', 'निष्ठित' है; (ख) द्वितीय व्याख्यामें 'अप्रकट', 'निगूढ' है । वादिजङ्घालदेवने 'निभृत-गोपित' ही कहा है । उदाहरण ११७वें श्लोकमें है ।। १०२ ।। (११) समान-शब्दा — जो उक्ति विवक्षित शब्दके उपन्यस्त = कल्पित (घुमा-फिराकर बनाये गये) पर्याय (समानार्थक) शब्दोंसे साधित (ग्रथित) होती है, वह 'समान-शब्दा' प्रहेलिका कहलाती है । यहाँ 'पर्याय' शब्द अपने १. रत्नश्री : 'उपन्यस्त-पर्यायार्थ-प्रसाधिता' इत्यपि पाठः । २. रत्नश्री : या दर्शितान्यार्था, निभृतो व्यवस्थितो वाऽन्यार्थोऽभिधेयं यस्या- मिति निभृतान्यार्थाऽभिधेयान्तरात् । कथम् ? (१) तुल्यं समानमुभयत्र वृत्तेः, धर्ममर्थरूपं, तन्निमित्तीकृत्य प्रवृत्तेः, स्पृशतीति तुल्यधर्मस्पृक् । (२) तुल्यो वा विवक्षितेनार्थेन सदृशो धर्मो गुणोऽस्येति तुल्यधर्माणमर्थं स्पृशतीति तुल्यधर्मस्पृक् । तया (क) तुल्यधर्मस्पृशा गिरा शब्देन हेतुना तादृशी गीः प्रयुज्यते, या विवक्षितसदृशमर्थान्तरमभिधाना, तत्रैव विव- क्षितेऽर्थे निष्ठाऽस्येति । (ख) यद्वा तुल्यधर्मस्पृशा गिरा कारणेन निभृतोऽ- प्रकटोऽन्यो गृहीतार्थापेक्षयाऽर्थोऽभिधेयं यस्यामिति योज्यम् । सा तादृशी प्रहेलिका निभृताऽऽख्यायते ।
१३० काव्यादर्श [ ३।१०३ रूढ ‘अल्पान्तरसमानार्थक प्रसिद्ध वाचक शब्द’ अर्थमें प्रयुक्त नहीं है । इस व्याख्यामें ‘उपन्यस्त’ शब्द ‘पर्याय’ का विशेषण है । वादीजीने ‘उपन्यस्त’ को ‘शब्द’ का विशेषण बनाकर अर्थ यों किया है : उपन्यस्त (प्रयुक्त) शब्दके पर्याय (समानार्थक रूढ शब्द) के द्वारा सम्पादित अर्थ वाली प्रहेलिका ‘समान-शब्दा’ कहलाती है ।¹ इस व्याख्यामें पर्याय शब्द उपन्यस्त शब्दसे कल्पित होता है, साक्षात् प्रयुक्त नहीं होता । रत्नश्रीज्ञानकी व्याख्यामें कल्पना- बाहुल्य है । संस्कृतमें कल्पित पर्यायोंका प्रयोग आम बात है । ‘हस्तिनापुर’ को ‘नागसाह्वयपुर’ कहना, ‘भ्रमर’ को ‘द्विरेफ’ कहना एवं ‘चक्रवाक’ को ‘रथाङ्गनामा’ कहना, इसी प्रकारका कल्पित पर्याय है । पर ये सब अभि- व्यक्तियाँ दुरूह न होनेसे व्यामोहकारी नहीं हैं, क्योंकि किसी स्तरपर इनमें अर्थान्तर-समानार्थता है । ‘प्रकृष्ट बालों वाला’ कहना ‘प्रवाल’ (मूँगे) का पर्याय उसी प्रकार नहीं है, जैसे ‘दिल लेने वाली’ कहना ‘दिल्ली’ का सही पर्याय नहीं है, कल्पित पर्याय है । ऐसे कल्पित पर्यायोंसे साधित उक्ति श्रोताको अवश्य उलझनमें डालती है । अतः वह ‘प्रहेलिका’ नामक चित्रालङ्कार है । ‘समान शब्द’ का अर्थ ‘पर्याय’ होता है । इस प्रकारके कल्पित समान शब्दके प्रयोगके कारण यह प्रहेलिकाप्रकार ‘समान-शब्दा’ कहलाता है । रत्नश्रीमें लक्षणांशका पाठान्तर उपन्यस्त-पर्यायार्थ-प्रसाधिता’ बताया है : उपन्यस्त अर्थके अनुगम (प्रतीति) से कल्पित, उस अर्थको प्रकाशित करनेके कारण पर्यायरूप शब्दान्तरके अर्थमें प्रसाधित प्रहेलिका ‘समानशब्दा कहलाती है ।² अर्थको छुपाकर कहनेके कारण यह अर्थ-गूढा है । उदाहरणार्थ ११८वाँ श्लोक देखें । (१२) सम्मूढा — सीधे-सीधे अभिधासे अर्थका निर्देश (कथन) की हुई होते हुए भी जो उक्ति अभिव्यक्तिकी अस्पष्टताके कारण श्रोताको भ्रममें डालती है, वह ‘सम्मूढा कहलाती है । साक्षात् निर्देश न होनेपर व्यामोह १. रत्नश्री : उपन्यस्तेन = तदर्थानुसारेण कल्पितेन, शब्दस्य विवक्षितत्वा- वाचकत्वेन प्रसिद्धस्य तदर्थप्रकाशनात् पर्यायेण = शब्दान्तरेण साधिता । वादिटीका : सा समानशब्दा नाम यस्यामुपन्यस्तो यः शब्दः, तस्य यः पर्यायः, तेन साधितः = सम्पादितोऽर्थः । २. रत्नश्री : ‘उपन्यस्त-पर्यायार्थ-प्रसाधिता’ इत्यपि पाठः । तत्र उपन्यस्तार्था- नुगमकल्पितस्य, तदर्थ-प्रकाशनात् पर्यायस्य = शब्दान्तरस्य, अर्थे प्रसाधिता = ‘उपन्यस्तपर्यायार्थ-प्रसाधिता’ इति व्याख्येयम् ।
३।१०४] ४. प्रहेलिकाके भेदोंके लक्षण १३१ (१३) योग-मालाऽऽत्मकं नाम यस्याः, सा पारिहारिकी । (१४) एकच्छन्नाऽऽश्रितं व्यज्य यस्यामाश्रयगोपनम् ॥ १०४ ॥ (१३) जिस (पहेली) का नाम (सञ्ज्ञापद) सम्बन्धोंकी मालाके रूपमें होता है, वह पारिहारिकी (प्रसिद्ध नामका परिहार करके सम्बन्धोंके अभि- धानसे निष्पन्न) होती है । (१४) एकच्छन्ना वह है, जिसमें आधेयको व्यक्त करके आधारको छुपाया जाता है ॥ १०४ ॥ स्वाभाविक है, पर निर्देश करनेपर व्यामोह होना उक्तिकी विशिष्टता है । इसी विशेषता (अतिशय) को आचार्यने ‘अपि’से कहा है ।१ व्यामोहका कारण अस्पष्ट अभिधान है । अतः यह भेद अर्थगूढ है । उदाहरण ११६वें श्लोकमें है ॥ १०३ ॥ (१३) पारिहारिकी—जिस प्रहेलिकाके सञ्ज्ञा शब्द सम्बन्धोंकी मालाके रूपमें हों, वह प्रहेलिका प्रसिद्ध सञ्ज्ञा पदका परिहार करनेके कारण ‘पारि- हारिकी’ कहलाती है । इस प्रहेलिकामें वस्तुका अभिधान सीधे स्पष्ट वाचक शब्दोंसे न करके, वाचकोंका प्रयोग बचाते हुए, सम्बन्धोंके अभिधानसे परम्परया किया जाता है । अतः यह भी अर्थ-गूढा है । उदाहरण १२०वें श्लोकमें है । (१४) एकच्छन्ना—आश्रयाश्रयिभाव सम्बन्ध द्विष्ठ होता है । जब आश्रितके धर्म (द्रव्य, गुण और क्रिया) का तो अभिधान किया जाये, किन्तु इनके आश्रय (आधार धर्मी) को छुपाया जाये,२ तब एकको छुपानेके कारण ‘एकच्छन्ना’ प्रहेलिकाभेद निष्पन्न होता हैं । यह आश्रयरूप अर्थके निगूहनके कारण अर्थगूढा है । धर्मोंके कथनसे धर्मीकी कल्पनामें कुछ चमत्कार होता है; आश्रयको कहनेसे धर्म स्वतः उक्त हो जाते हैं; अतः व्यामोहकत्व आश्रय- गोपनमें ही है, आश्रितगोपनमें नहीं । इस भेदको ‘एकच्छन्ना’ कहना तो तभी उचित होता, जब दो सम्बन्धियों में किसीके भी गोपनसे व्यामोह होता । इसलिये इसे ‘धर्मिच्छन्ना’ कहना अधिक उचित है । सम्भवतः, अगले ‘उभयच्छन्ना’ भेदमें भेदकके रूपमें सङ्- ख्या (उभय) का प्रयोग विवक्षित होनेसे आचार्यने इस भेदमें भी उसे ही भेदक मानकर सञ्ज्ञा बनाई है । उदाहरण १२१वें श्लोकमें देंगे ॥ १०४ ॥ १. रत्नश्री : अतिशये ‘अपि’-शब्दः । २. वादिटीका : एकच्छन्ना नाम सा, यस्यामाश्रितं नाम धर्म द्रव्य-गुण-कर्म- लक्षणमभिव्यज्य प्रकाश्य तद्धर्माधारस्याश्रयस्य धर्मिणो गोपनम् ।
१३२ काव्यादर्श [३।१०५-१०६ (१५) सा भवेदुभयच्छन्ना, यस्यामुभय-गोपनम् । (१६) सङ्कीर्णा नाम सा, यस्यां नाना-लक्षण सङ्करः ॥ १०५ ॥ एताः षोडश निर्दिष्टाः पूर्वाचार्यैः प्रहेलिकाः । दुष्ट-प्रहेलिकाश्चान्यास्तैरेधोताश्चतुर्दश ॥ १०६ ॥ (१५) वह (पहेली) उभयच्छन्ना है, जिसमें दोनों (आश्रित और आश्रय) को छुपाया जाता है । (१६) सङ्कीर्णा नामक वह होती है, जिसमें एकाधिक पहेलियोंके लक्षणों का सङ्कर (उपकार्योपकारक भावसे तथा तुल्यबलतासे) होता है ॥ १०५ ॥ पिछले आचार्योंने ये सोलह पहेलियां बताई हैं । उन्होंने चौदह दोषयुक्त पहेलियाँ भी पढ़ी (दी) हैं ॥ १०६ ॥ (१५) उभयच्छन्ना—जिस उक्तिमें आश्रित धर्म द्रव्य, गुण और क्रियाका भी गोपन किया जाये, और आश्रयका भी, वहाँ दोनोंके गोपनके कारण 'उभयच्छन्ना' प्रहेलिका होती है । यह भी अर्थगूढा है । १२२वें श्लोकमें उदाहरण है । (१६) सङ्कीर्णा—जिस उक्तिमें नाना (अलग-अलग) लक्षणों (प्रहेलिका- घटक) तत्त्वोंका सङ्कर (सम्मिश्रण) होता है, वह पहेली 'सङ्कीर्णा' होती है । आचार्यने 'सङ्कर' के अर्थमें 'संसृष्टि' शब्दका प्रयोग (२।३५७-३५८) में किया है । उनके मतमें ये दोनों पर्याय हैं । अतः यहाँ (i) अङ्गाङ्गि- भाव संसृष्टि और (ii) समकक्षभाव संसृष्टि दोनों अभीष्ट है । अङ्गाङ्गि- भावसंसृष्टि समकक्ष संसृष्टिकी अपेक्षा दुष्कर होती है । आचार्यने १२३वें श्लोकमें सङ्कीर्णाका जो उदाहरण दिया है, वहाँ दोनों प्रकारकी प्रहेलिकाएँ अङ्गाङ्गिभावसम्बन्धसे परस्पर सङ्कीर्ण हैं । पूर्वार्धोक्त नामान्तरिता अङ्ग है और उत्तरार्धोक्त वञ्चिता वाक्यपर्यवसायी होनेसे मुख्य है । इसकी शब्द- गूढता या अर्थ-गूढता सङ्करकी विषय प्रहेलिकाओंके स्वरूपपर निर्भर करती है ॥ १०५ ॥ ४. प्रहेलिकाओंका उपसंहार : प्रहेलिकाओंके सोलह भेदोंके लक्षण बतानेके बाद आचार्यने इनका उपसंहार अगले १०६वें श्लोकमें किया है । दण्डीका कहना है कि ये १६ प्रकारकी प्रहेलिकायें पिछले आचार्यों ने बताई हैं । भामहने पूर्वाचार्य रामशर्मा तथा उनके ग्रन्थ 'अच्युतोत्तर' का नाम दिया है । पर भामहने प्रहेलिकाको व्याख्यागम्य बनाने वाला यमक-
३।१०७ ] ४. प्रहेलिकाओंका उपसंहार १३३ दोषानपरिसङ्ख्येयान् मन्यमाना वयं पुनः । साध्वीरेवाभिधास्यामस्ता दुष्टा, यास्त्वलक्षणाः ॥ १०७ ॥ किन्तु दोषोंको अनादरणीय मानते हुए हम निर्दोष (पहेलियाँ) ही कहेंगे । दोषयुक्त वे होती हैं, जो तो उनके लक्षणसे रहित हैं ॥ १०७ ॥ व्यपदेशित्वका जो तत्त्व आवश्यक बताया है, वह पूर्वाचार्यानुसारिणी इन षोडशविध प्रहेलिकाओंमें तनिक भी नहीं है । इस आधारपर यह कहना कदाचित् अनुचित न होगा कि दण्डीकी प्रहेलिकाओंके निरूपक पूर्वाचार्योंमें रामशर्मा सम्मिलित नहीं हैं । दण्डीने अवन्तिसुन्दरीकथामें अपने समयके बुधों में केरलके एक रामशर्माका उल्लेख किया है । यदि अच्युतोत्तरके लेखक यही रामशर्मा हैं, तो हो सकता है कि काव्यादर्शके प्रणयन तक उसकी रचना न हो पाई हो । इसी कारण दण्डीने उनके चिन्तनका उल्लेख यहाँ न करके अपने समयमें चर्चामें आ चुकी निर्दोष और सदोष पहेलियोंका उल्लेख किया है । आचार्य रत्नश्रीज्ञानका 'पूर्वाचार्यै रामशर्मादिभिः' कथन भामहके उल्लेख पर, अथवा अन्य सुनी-सुनाई बातोंपर, आधारित प्रतीत होता है । उन्हीं पूर्वाचार्योंने इनके अतिरिक्त १४ दोषयुक्त पहेलियाँ बताई हैं ॥ १०६ ॥ प्रहेलिकाओंको दुष्ट बनाने वाले ये दोष किस प्रकारके हैं, यह सङ्केत न आचार्य दण्डीने किया है, और न किसी अन्य आचार्यने ही किया है । आचार्य दण्डीने १०७वें श्लोकमें मात्र इतना कहा है कि जिन पहेलियोंपर उनके लक्षण पूरी तरह नहीं घटते, वे दुष्ट पहेलियाँ हैं । पदसन्धिके कारण सम्पन्न (१) समागता नामक पहेलीमें दोषकी सम्भावना नहीं है । अतः वह तो शुद्ध ही रहेगी । शेष चौदह असङ्कीर्ण प्रहेलिकाओंकी प्रस्तुतिमें किसी लक्षणगत त्रुटिके कारण वे चौदह प्रहेलिकायें दोषयुक्त होंगी । रत्नश्रीज्ञानने आचार्यके इस कथनको यों प्रस्तुत किया है : उन (प्रहेलिकाओं) के लक्षणके विरोधके १. रत्नश्री ३।१०६ : तल्लक्षणविरोधाद् दुष्टा हेयाश्च ताः प्रहेलिकाश्चेति दुष्टप्रहेलिकाः । ००० अत एव समागतादिविलक्षणत्वादन्याश्चतुर्दश तैः पूर्वाचार्यैरधीता = निर्दिष्टा इति । १०७ : 'कथं तर्हि दुष्टप्रहेलिका ज्ञायन्ते, यथा वर्ज्येरन् ? न हि दुष्टतयाऽज्ञातानां परिहारः सम्भवति ।' इत्याशङ्क्य तत्प्रत्युपायमाह - 'याः = प्रहेलिकाः, 'तु'-शब्दोऽर्थान्तरविव- क्षायाम्, यथोक्तलक्षणविरहान्न विद्यते लक्षणमासामित्यलक्षणाः, ताः स्वयमेव दुष्टा ज्ञायन्ते; प्रतिनियतलक्षणव्युत्पत्तेरतल्लक्षणानां तदाभासता- प्रतिपत्तेः । किं तासां प्रपञ्चप्रयासेन ?' इति ।
१३४ काव्यादर्श [३।१०७ कारण वे दोषयुक्त और हेय हो जाती हैं। दोषयुक्त होनेके कारण ये ‘समागता’ आदिसे विलक्षण (भिन्न प्रकारकी) हैं। उनके निश्चित लक्षणके न होनेके कारण ये प्रहेलिकाभास हैं, प्रहेलिकायें नहीं । अतः इनका विस्तार बतानेका प्रयास आवश्यक है । इस व्याख्यामें ‘अलक्षणाः’ में ‘नञ्’ का अर्थ ‘विरोध’ रत्नश्रीज्ञानको अभिप्रेत है । किन्तु वादीजीने ‘नञ्’ को ‘अभाव’ अर्थ में बताया है : अलक्षणाः = लक्षणवर्जिताः । रङ्गाचार्य रेड्डीजीने भी इसी प्रकार ‘नञ्’ को ‘शून्य’ अर्थमें बताया है ।१ पर यदि ये प्रहेलिकाके लक्षणसे ‘वर्जित’ या ‘शून्य’ ही हैं, तो प्रहेलिका ही कैसे हैं ? जब प्रहेलिकायें ही नहीं हैं, तो दुष्ट कैसे होंगीं ? इसलिये रत्नश्रीज्ञानकी व्याख्या ही उचित है । अतः निष्कर्ष यही है कि जिस भी प्रकारकी पहेलीका लक्षण अव्याप्ति, अतिव्याप्ति या असम्भवमें से अन्यतम दोषसे युक्त होगा, वह भले प्रहेलिकाका पूरा आनन्द न दे सके, प्रहेलिकाका आभास अवश्य देगी । अतः ऐसी पहेली ‘दुष्ट’ पहेली कहलाती है । (क) पहेलियोंके ये दोष पहेलियोंको हेय बना देनेके कारण कुछ गिने जानेके, आदर दिये जानेके, योग्य नहीं हैं । (ख) या ‘वे केवल १४ ही हैं, यह नहीं कहा जा सकता । पूर्वाचार्योने १४ बताये हैं । हमारी समझसे वे अनगिनत हैं । इसलिये उनके प्रपञ्चमें पड़ना अनावश्यक है । अतः आचार्य दण्डीका कथन है कि वे साधु (लक्षणसम्पन्न) पहेलियोंके ही उदाहरण देंगे ।२ परन्तु आचार्य यदि प्रहेलिकाओंके दोषोंके कुछ प्रकारोंका निरूपण कर देते, तो अच्छा तो होता ही, दोषप्रकरणकी समुचित प्रस्तावना भी इससे हो जाती । उन्होंने काव्यशरीरके साधु स्वरूपका निरूपण उसके समस्त शोभाकारक १. प्रभा ३।१०७ : ‘यास्त्वलक्षणाः’—समागतादिषोडश प्रहेलिका लक्षण- शून्याः, ता दुष्टा बोद्धव्याः । रेड्डीजीने इससे पूर्व १०६ की व्याख्यामें च्युताक्षरादिको ‘दुष्ट सदोष प्रहेलिका’ कहा है । पर यह रुद्रटसे प्रारब्ध समूची परम्पराके विरुद्ध है । च्युताक्षरादि चित्रालङ्कारके अन्तर्गत निर्दोष अभिधान-प्रकार हैं । विशेषार्थ आगे व्याख्या देखें । २. रत्नश्री ३।१०७ : (क) दोषाः प्रहेलिकासम्भविनो हेयाः, प्रहेलिका-दोषा अपरिसङ्ख्येयाः । न लक्षणतो न लक्ष्यतो गुणवदादरेणाप्रतिपाद्यान् मन्यमानाः पश्यन्तः साध्वीरेव प्रहेलिका अभिधास्यामः ।...यद्वा (ख) प्रहेलिकादोषा अपरापरदोषसम्भवेन ‘चतुर्दश’ इति इयत्तयाऽपरि- सङ्ख्येयाः । ततश्चातिप्रसङ्गान्नोच्यन्ते । इत्यभिप्रायेणोक्तं ‘दोषान्०’ इत्यादि ।
३१[०७] ४. प्रहेलिकाओंका इतिहास १३५ धर्मोंको बताकर करनेके बाद अगले प्रकरणमें काव्यशरीरके दोषोंका निरूपण किया है, तो जैसे इससे अध्येताका कल्याण ही हुआ है, वैसे ही, प्रहेलिकाओंके साधु प्रकारके निरूपणके पश्चात् वे दुष्ट प्रहेलिकाओंका भी दिङ्मात्र प्रदर्शित कर देते, तो अध्येताका उपकार ही होता । लगता है कि आचार्य दण्डी यहाँ परिश्रमसे कतरा गये । ४. प्रहेलिकाओंका इतिहास : आचार्य दण्डीके अनुसार प्रहेलिकाका उपयोग परव्यामोहन है; वह शब्दके द्वारा सम्भव नहीं है, अपितु अर्थसे ही सम्भव है । शब्दकी गूढता भी अर्थको व्यामोहकारी बनायेगी । यही कारण है कि आचार्यने पदसन्धिसे सम्पन्न (१) समागताको भी 'गूढार्था' बताया है । इसलिये प्रहेलिकाएँ आचार्य दण्डीके मतमें अर्थालङ्कार हैं । शब्दालङ्कार यमक आदिके प्रकरणमें तो दुष्कर चित्र अलङ्कार होनेसे दुष्कर चित्रमार्ग प्रकरणमें दी हैं, शब्दालङ्कार होनेके कारण नहीं । परवर्ती आचार्योंमें उद्भट तो यमकपर ही मौन हैं । वामन भी प्रहे- लिकाओंके विषयमें मौन हैं । इन दोनों आचार्योंने दुष्कर चित्रमार्गका उल्लेख नहीं किया है । आचार्य रुद्रटने इस प्रसङ्गमें चित्रमार्गके विषयको आचार्य दण्डीसे आगे बढ़ाया है : उन्होंने इसके (१) मात्राच्युतक, (२) बिन्दुच्युतक, (३) प्रहेलिका, (४) कारकगूढ, (५) क्रियागूढ, (६) प्रश्नोत्तर भेद बताकर 'आदि' शब्दसे अन्य चित्रालङ्कारोंकी दिशा उद्घाटित रखी है । इसके अतिरिक्त दण्डिप्रोक्त परव्यामोहनको रुद्रटने उतना महत्त्व नहीं दिया, अपितु दण्डी द्वारा बताये एक अन्य उपयोग क्रीडापर ही बल दिया है । उनकी दृष्टि में कदाचित् परव्यामोहनका साध्य होना उचित नहीं है । अपितु उस साधन होना चाहिये क्रीडाका, मनोविनोदका । यहाँ भी यह बात ध्यान देने योग्य है कि रुद्रटने भी अर्थके कारण चमत्कार उत्पन्न करने वाले इन अलङ्कारोंको चित्रमार्गका विषय होनेसे ही यहाँ दिया है, शब्दालङ्कार होनेसे नहीं । काव्यालङ्कारके पञ्चम अध्यायका विषय चित्रनिरूपण है ।१ चित्रमार्गके अन्तर्गत कुछ शब्दालङ्कार हैं । जैसे चक्रबन्धसे लेकर सर्वतोभद्रबन्ध तकके चित्रबन्ध (५।२-२३) । (१-२) मात्राच्युतक आदिमें मात्रा (स्वर) और बिन्दु (अनुस्वार, नासिक्य वर्ण) के च्युत होनेसे अर्थभेद हो जाता है, १. भङ्ग्यन्तरकृत-तत्क्रम-वर्ण-निमित्तानि वस्तुरूपाणि । साङ्गानि विचित्राणि च रच्यन्ते यत्र, तच्चित्रम् ।। काव्यालङ्कार ५।१ इत्थं स्थितस्यास्य दिशं निशम्य शब्दार्थवित् क्षोदित चित्रवृत्तः । आलोच्य लक्ष्यं च महाकवीनां चित्रं विचित्रं सुकविर्विदध्यात् ।। ३३
१३६ काव्यादर्श [३।१०७ जिससे श्रोता व्यामूढ हो जाता है । इन दोनों चित्रालङ्कारोंमें अर्थभेदका निमित्त स्वर एवम् अनुस्वार शब्द (वर्ण) हैं । अतः इन्हें शब्दार्थालङ्कार कहना उचित है । (३) रुद्रटने प्रहेलिकाके दो भेद बताये हैं : (क) पदारूढ होनेसे स्पष्ट एवं निगूढ होनेसे प्रच्छन्न अर्थ वाली, (ख) अव्याहृतार्था (अनु- क्त अर्थ वाली) ।¹ इस विवरणसे स्पष्ट है कि यह अर्थालङ्कार है । व्या- मोहकारी होनेसे चित्र (विस्मयजनक) है । रुद्रटने चित्रबन्धोंकी दुष्कर, सुकरके रूपमें कल्पना नहीं की है । महाराज भोजने प्रहेलिकाके स्वरूपनिरूपणमें दण्डीकी दृष्टि न अपनाकर रुद्रटके निरूपणको व्यवस्थित किया है : उन्होंने (१) प्रहेलिकाका प्रश्नरूपमें होना आवश्यक माना; (२) रुद्रटके मात्रा-बिन्दुच्युतकोंका समाहार प्रहेलिका में किया; (३) मात्रा और बिन्दुको अक्षरमात्र (वर्णमात्र) का उपलक्षक माना; (४) च्युतिके विपरीत वर्णदानका नवीन समावेश किया; (५) अक्षरोंका आकारविशेष (मुष्टि) के रूपमें विन्यास बताकर मुरजादि बन्धका प्रहेलिकामें सम्मिश्रण किया; (६) केवल अनुस्वार, विसर्ग आदिका विन्यास करके तथा स्वरव्यञ्जनोंका प्रयोग न करके निष्पन्न बिन्दुमती प्रहेलिकाकी उद्भावना की । ये पाँचों प्रकारकी प्रहेलिकाएँ शब्दमूलक होनेसे शब्दालङ्कार हैं। (७) अर्थके कारण व्यामोह वाली अर्थवती (छठी) प्रहेलिकाके भेदोपभेद भोजने नहीं दिये हैं।² दण्डीकी प्रहेलिकाएँ (१) समागता, (३) व्युत्क्रान्ता जैसी कुछेकको छोड़कर प्रायेण अर्थवती ही हैं। इससे यह स्पष्ट है कि भोजने दण्डी की दिशामें चिन्तन न करके रुद्रटकी दृष्टिको आधार बनाकर उसे अपनी स्वतन्त्र दृष्टिसे व्यवस्थित करके प्रहेलिकाको नये रूपमें देखा है । भोजने रुद्रटके क्रिया-कारकगूढ भेदोंको चार और प्रकारोंका उपलक्षक मानकर यों प्रस्तुत किया है : (१) क्रिया, (२) कारक, (३) शेष सम्बन्ध, (४) पद, (५) अभिप्राय, (६) वस्तु (द्रव्य) के गोपनसे छह प्रकारके गूढ- बन्ध निष्पन्न होते हैं ।³ गूढबन्धोंकी प्रथम उद्भावना रुद्रटने ही की है । पर रुद्रटके मतमें ये चित्रबन्धके अन्तर्गत आते हैं । जबकि भोजने इनका तथा १. मात्रा-बिन्दु-च्यवनादन्यार्थत्वेन तच्च्युते नाम । स्पष्ट-प्रच्छन्नार्था प्रहेलिकाऽव्याहृतार्था च ॥ काव्याल० ५।२५ २. प्रहेलिका = सकृत्प्रश्नः साऽपि षोढा च्युताक्षरा । दत्ताक्षरोभयं, मुष्टिर्बिन्दुमत्यर्थवत्यपि ॥ सरस्वती० २।१३३ ३. क्रियाकारकसम्बन्धे पदाभिप्रायवस्तुभिः । गोपितैः षड्विधं प्राहुर्गूढं गूढार्थवेदिनः ॥ सरस्वती० २।१३५
३।१०७ ] ४. प्रहेलिकाओंका इतिहास १३७ प्रहेलिकाओंका निरूपण चित्र बन्धोंके प्रकरणकी समाप्तिके बाद किया है । १ भोजने दण्डीकी (१) समागता पहेलीको पहेली न मानकर शेषसम्बन्धगूढ- बन्ध अलङ्कार माना है । २ तत्त्वतः यदि देखा जाये, तो इन षड्विध गूढबन्धों का प्रयोजन परव्यामोहन तथा क्रीडा ही है । अतः ये 'प्रहेलिका' कहलानेके अधिकारी हैं । पर दण्डिद्वारा प्रस्तुत पूर्वाचार्योंके प्रहेलिकालक्षणोंकी आधार- भूत दृष्टिसे इन गूढबन्धोंकी दृष्टिमें अन्तर है । पूर्वाचार्योंकी १५ प्रहेलिकाओं की आधारभूत दृष्टिको अन्य दृष्टिका उपलक्षक यदि मान लिया जाये, तो ये भेद अर्थवती (गूढार्था) प्रहेलिकाके भेद माने जा सकते हैं । तथा इन्हें दण्डी की १५ प्रहेलिकाओंसे अतिरिक्त प्रहेलिकाएँ माना जा सकता है । कलिकालसर्वज्ञ आचार्य हेमचन्द्रने (१) दण्डीके तृतीय परिच्छेदके प्रहेलि- काविषयोंको दण्डीकी दृष्टिके अनुकरणसे सादृश्य और आश्चर्यहेतुताके कारण चित्रालङ्कारमें तो माना ही है, (२) रुद्रटका अनुकरण करके च्युत, गूढका समावेश स्पष्टतः चित्रमें किया (३) और भोजका समन्वय करनेको प्रश्नोत्तर, प्रहेलिका और दुर्वाचक (दुःश्रव)'का भी चित्रमें ही समावेश किया है । ४ किन्तु १. दुष्करत्वात् कठोरत्वाद्, दुर्बोधत्वाद् विनाऽवधेः । दिङ्मात्रं दर्शितं चित्रे शेषमूह्यं महात्मभिः ।। सरस्वती० २।१३० २. सरस्वती० २।३६८ : सम्बन्धगूढं यथा—'न मयागोरसा०' (काव्यादर्श ३।१०८) । अत्र 'न मे आगोरसाभिज्ञ' चेत' इति सम्बन्धपदस्य 'मया' इति तृतीयाभ्रान्त्या गोपितत्वादिदं सम्बन्धगूढम् । ३. कामसूत्र १।३।१६ पर जयमङ्गलने ३० दुर्वाचकयोगा कलाकी व्याख्यामें काव्यादर्शके उल्लेखसे एक श्लोक उद्धृत करके उसकी व्याख्या की है । पर दण्डीके काव्यादर्शमें न दुर्वाचक बन्ध उपलब्ध है, और न जयमङ्गलोद्धृत- व्याख्यात श्लोक । इसी प्रकार ३३ काव्यसमस्यापूरण कलाकी व्याख्यामें भी काव्यादर्शके नामसे एक श्लोक उद्धृत करके उसकी व्याख्या की है । पर काव्यादर्शके उपलब्ध भागमें न समस्यापूर्ति उपलब्ध है और न यह उदाहरण । जयमङ्गलके कथनसे अनुमान किया जा सकता है कि काव्या- दर्शके अब अनुपलब्ध कलापरिच्छेद (३।१७१ में उक्त) में ये दोनों कलायें रही होंगी । ४. काव्यानुशासन, ५म अध्याय, पृष्ठ २५७ : स्वर-व्यञ्जन-स्थान-गत्याकार- नियम-च्युत-गूढादि चित्रम् । स्वरादीनां नियमः, च्युतगूढादिश्च चित्रं, सादृश्यादाश्चर्यहेतुत्वाद् वा चित्रम् । पृष्ठ २७२ : 'गूढादि' इत्यादिपदेन प्रश्नोत्तर-प्रहेलिका-दुर्वाचकादि-परिग्रहः ।
१३८ काव्यादर्श [ ३।१०८ (१) न मया गो-रसाभिज्ञं चेतः कस्मात् प्रकुप्यसि ? अस्थान-रुदितैरेतैरैरलमालोहितेक्षणे ॥ १०८ ॥ (१) हे कुछ-कुछ रक्तिम नयनों वाली (प्रिये), नहीं मैंने गोरस (दूध, दही, छाछ आदि) से परिचित मन (धारण किया है) । क्यों इतनी कुपित हो रही हो ? यह बिना बातके रोना-धोना मत करो ॥ १०८ ॥ हेमचन्द्रने प्रहेलिकाओंको च्युत, गूढ आदिसे पृथक् रखकर प्राचीन परम्पराका अनुगमन किया है, आचार्य भोजका नहीं ॥ १०७ ॥ (१) समागता प्रहेलिका इस उक्ति के यथाधृत पाठको 'मया गोरसाभिज्ञं' के रूपमें लेनेसे उपर्युक्त असङ्गत अर्थकी प्रतीतिके कारण श्रोता उलझनमें पड़ जाता है कि मानवती प्रिया और उसके सम्मुख मनुहार करते दीन खड़े प्रियके बीच ये 'गो-रस' (दूध, दही आदि) कहाँसे आ गया ? सिर खुजाकर सोचनेपर यदि उसे व्याकरणका अच्छा अभ्यास है, तो 'मे + आगो-रसाभिज्ञं' सन्धिविच्छेद समझ आ जायेगा कि अयादिसन्धिसे प्राप्त यकारका शाकल्यसम्मत लोप¹ कविने नहीं किया है । तब उसके ज्ञानचक्षु उन्मीलित होंगे : मेरा चित्त अपराध (अन्य स्त्रीगमन आदि) करनेमें आनन्दकी अनुभूतिका अभिज्ञ नहीं है, अर्थात् मैंने कोई अपराध नहीं किया है; तब प्रिये तुम काहे को नाराज़ हुईं ? इस प्रकार यहाँ 'मे + आगो०' पदोंमें सन्धि (शब्दधर्म) के कारण पदान्तरकी तथा उसके द्वारा अविवक्षित अर्थकी प्रतीति होनेसे श्रोताको व्या- मोह हो जाता है । दो पदोंके समागम (सन्धानके) कारण यह सब होनेसे यह 'समागता' प्रहेलिका है । यह शब्दके गोपनसे निष्पन्न होनेसे शब्द-गूढा है । रचनामें असुकर तथा अवबोधमें दुर्बोध होनेसे यह दुष्कर है और वैचित्र्ययुक्त होनेसे चित्र है । सन्धियुक्त शब्दप्रयोगसे इस शोभाके उत्पन्न होनेसे यह शब्दालङ्कार है । भोजके मतमें इस प्रकारकी सन्धिसे शेष सम्बन्ध ('मे') का गोपन हो जाता है और कर्तृ सम्बन्ध 'मया' (कर्तरि तृतीयान्त) की भ्रान्ति होती है । अतः यहाँ सम्बन्धगूढ बन्ध है । भोजके अनुसार यह प्रहेलिका नहीं है । यह सम्बन्ध अर्थके रूपमें है । अतः दण्डीने इसे 'पदसन्धिके कारण गूढार्था' कहा है । व्यामोहका कारण असाधारण (अव्यवहित पूर्ववर्ती) कारण अर्थका गोपन है । उसका कारण पदसन्धिसे सम्बन्ध अर्थका गोपन या सम्बन्धिपदका गोपन है । इस प्रकार पदसन्धि प्रहेलिकाका आधार है ॥ १०८ ॥ १. अष्टाध्यायी ६।१।७८ : एचोऽयवायावः । ८।३।१९ : लोपः शाकल्यस्य ।
३।१०६-११०] ४. प्रहेलिकाके भेदोंके उदाहरण १३६ (२) कुब्जामासेवमानस्य यथा ते वर्धते रतिः । नैवं निर्विशतो नारीरमरस्त्री-विडम्बिनीः ॥ १०६ ॥ (३) दण्डे चुम्बति पद्मिन्या हंसः कर्कश-कण्टके । मुखं वल्गु-रवं कुर्वंस्तुण्डेनाङ्गानि घट्टयन् ॥ ११० ॥ (२) कुब्जा (कुबड़ी) का भोग करते हुए तुम्हारा आनन्द जैसे बढ़ता है, वैसे देवताओंकी स्त्रियोंकी विडम्बना करने वाली (अप्सराओंके समान सुन्दर) रमणियोंका भोग करते हुए नहीं (बढ़ता) ॥ १०६ ॥ (३) नालमें चूम रहा पद्मिनीके हंस कठोर काँटों वालेमें, मुखको सुन्दर बोली वाला करता हुआ, चोंचसे अङ्गोंको टकराता हुआ ॥ ११० ॥ (२) वञ्चिता—यहाँ 'कुब्जा' शब्दके प्रयोगसे आपाततः असङ्गत अर्थ प्रतीत होता है : अप्सरा जैसी सुन्दर रमणी तो अच्छी न लगे, और कुबड़ी मन मोहे, यह भी कोई बात है ! इससे शङ्का होती है कि 'कुब्जा' शब्द अपने प्रसिद्ध अर्थ (कुबड़ी) से भिन्न किसी अर्थमें होगा । तब ध्यान जाता है कि कहीं 'कान्यकुब्ज' अपरनाम 'महोदया' नामक नगरीको, अथवा कान्यकुब्जकी किसी स्त्रीको, ही सत्यभामाको सत्या, भामा¹ आदि कहनेके समान पूर्वपद- लोप करके 'कुब्जा' शब्दसे तो नहीं कहा है : कान्यकुब्ज नगरी (राजधानी) अथवा कान्यकुब्ज देशकी स्त्रीका उपभोग करते हुए तुम्हें जैसे निरन्तर वर्ध- मान आनन्द मिलता है, वैसे अप्सरासदृश सुन्दर रमणियोंके भोगसे नहीं मिलता । राजाकी पत्नीके रूपमें पृथ्वी अथवा राजधानीकी कल्पना कवि- समयमें प्रसिद्ध है । इस प्रयोगमें कुब्जासे विवक्षित नगरीका अथवा कान्यकुब्ज की स्त्रीका अन्य नगरियोंसे या स्त्रियोंसे अतिशय व्यक्त होता है । यहाँ 'कुबड़ी' अर्थमें प्रसिद्ध 'कुब्जा' शब्दका प्रयोग विवक्षित 'कान्य- कुब्जा' (कन्नोज, अथवा कन्नौजिया स्त्री) के अर्थमें करके श्रोताको छला गया है, भुलावेमें डाला गया है । अविवक्षितार्थक 'कुब्जा' शब्दसे विवक्षितार्थ 'कान्यकुब्जा' को छुपानेके कारण यह अर्थगूढ प्रयोग व्यामोहकारी हो गया है ॥ १०६ ॥ (३) व्युत्क्रान्ता—प्रकृत (११०वें) श्लोकमें विवक्षित अन्वय है : वल्गु- रवं कुर्वन्, कर्कश-कण्टके दण्डे अङ्गानि घट्टयन्, हंसः तुण्डेन पद्मिन्या मुखं चुम्बति । पर श्लोकमें प्रदत्त पदविन्याससे व्यामोहकारी और ही अर्थ प्रकट १. सिद्धान्तकौमुदी, स्वाथिकाः, वार्तिक : विनाऽपि प्रत्ययं पूर्वोत्तरपदयोर्वा लोपो वाच्यः । देवदत्तो, दत्तो, देवः । सत्यभामा, भामा, सत्या ।
१४० काव्यादर्श [३।१११ (४) खातयः कनि काले ते स्फातयः स्फीत१-वल्गवः । चन्द्रे साक्षाद् भवन्त्यत्र वायवो२ मम चारिणः ॥ १११ ॥ (४) हे कन्ये (कनि), तुम्हारे आह्लादकारी चरणमें (काले) शोभायमान, मनोहरतामे बजते हुए अथवा चञ्चल घुँघरू (खातयः) अनुभवमें आ रहे हैं । इस स्थितिमें मेरी हवा अस्थिर हो (खिसक) रही है ॥ १११ ॥ होता है । इसका कारण पदोंका अतिव्यवहित प्रयोग है । इससे विवक्षित अर्थके अभिधानमें बाधा आती है ॥ ११० ॥ (४) प्रमथिता—'खातयः कनि, काले ते०' (१११) में 'ते', 'मम' और 'स्फीत' को छोड़कर शेष सभी शब्द दुर्बोधार्थक हैं : 'खातयः' पद 'खाति' पुं० प्रथमा, ब०व० है । यह शब्द प्रसिद्ध कोषोंमें उपलब्ध नहीं है, न प्रयोगमें ही है । अपितु 'खस्य आकाशस्यायं खः शब्दः, तस्य अतिः सततप्राप्तिर्येषु; ते खातयः' व्युत्पत्तिसे किङ्किणी, नूपुर, नेवर, घुँघरू घर्घरिका (भोज) अर्थमें कविको इष्ट है । कनि कन्यार्थक वैदिक 'कनी'३ का सम्बोधन ए०व० है । काले पद काल्यते क्षिप्यते इति कालः पदम्, तस्मिन् चरणे' अर्थमें है । यह दक्षिणकी चारों भाषाओंमें 'काल' या 'कालु' के रूपमें इस अर्थमें उपलब्ध है । संस्कृतमें इस अर्थमें प्रयुक्त नहीं है ।४ स्फातयः पद 'स्फायी ओप्यायी वृद्धौ' (भ्वादि०) १. यह रत्नश्रीसम्मत पाठ है । वादि, तरुण टीकाओंमें धृत व्याख्यात और सरस्वतीकण्ठाभरण १।१२८में उद्धृत श्लोकमें धृत और रत्नदर्पणमे व्याख्यात पाठ 'स्फाटं' है । २. रत्नश्री, सरस्वतीक०, रत्नदर्पणमें 'वायवो' है । वादीटीका और तरुण- टीकामें 'तायवो' धृत एवं व्याख्यात है । 'चारिणः' केवल रत्नश्रीमें है । अन्य पूर्वोक्त सब स्थलोंमें 'धारिणः' है । ३. 'पुनस्तदा बृहति यत् कनाया दुहितुरा अनुभृतमनर्वा' (ऋ० १०।६१।५) आदि (१०,११,२१) में 'कन्या' अर्थमें 'कना' का तथा 'जारः कनीनां, पतिर्जनीनाम्' (ऋ० १।६६।४), 'पतमकृणुतं कनीनाम्' (ऋ० १।११६ १०) आदि (ऋ०१।१५२।४, १६३।८; २।१५।७, ५।३।२) में 'कनी' का प्रयोग है । यह लौकिक संस्कृतमें प्रचलित नहीं है । 'कन्या' में धृत है । ४. 'कल गतौ सङ्ख्याने च' (चु०) 'नुदति, क्षिपतीत्येतावात्मने, कालयत्यपि' (आख्यातचन्द्रिका २।३।८६) से 'कर्मण्यण्' (अष्टा० ३।२।१) से निष्पन्न यह शब्द तेलुगुमे 'कालु', कन्नड, तमिल और मलयालममें 'काल' रूपमें 'चरण' अर्थमें प्रसिद्ध है । रत्नदर्पण : कालश्चरणः कर्णाटदेशभाषा- नुसारात् । 'कर्णाटदेश'से 'दक्षिण भारत' इष्ट है ।
३।११२] ४. प्रहेलिकाके भेदोंके उदाहरण १४१ (५) अत्रोद्याने मया दृष्टा वल्लरी¹ पञ्च-पल्लवा । पल्लवे-पल्लवे चार्द्रा यस्याः कुसुम-मञ्जरी ॥ ११२ ॥ (५) इस बगियामें देखी मैंने पाँचपतिया (एक) लतर पत्ते-पत्तेमें कुसुममञ्जरी है जिसके पानीदार ॥ ११२ ॥ से क्तिन्से निष्पन्न 'स्फीताः' पद 'वृद्धाः' अर्थमें निष्पन्न है ।² रत्नश्रीसे अन्यत्र उपलब्ध स्फार्ह शब्द टीकाकारोंके अनुसार 'मधुर', 'मनोहर' अर्थमें है ।³ पर प्रसिद्ध नहीं है । 'वल्गु' शब्द 'सुन्दर' अर्थमें तो प्रसिद्ध हैं, पर 'आवाज' अर्थमें प्रसिद्ध नहीं है । चन्द्र 'चन्द्रमा' अर्थमें रूढ है । पर यौगिक 'आह्लादक अर्थमें प्रसिद्ध नहीं है । घुँघरुओंकी मधुर ध्वनिका अनुभव श्रवणसे और स्फातिसे लभ्य आकारवृद्धिका अनुभव आँखसे होता है । इन दोनोंको इकट्ठे 'साक्षाद् भवन्ति'से प्रकट किया है । पर यह अभिव्यक्तिप्रकार प्रसिद्ध नहीं है । 'प्राण' अर्थमें 'वायु' का प्रयोग भी दुर्बोध है । तायु का प्रयोग तो और भी दुर्बोध है । चारिणः (√चर्+णिनि) का 'अस्थिर' अर्थमें प्रयोग तो उतना दुर्बोध नही है, पर रत्नश्रीतर स्थलोंमें धृन्-उद्धृत व्याख्यात धारिणः पद 'धृङ् अवस्थाने (तुदादि) के विपरीत है । यहाँ इस अर्थमें प्रयोग व्याख्यागम्य है : प्राणोंका स्वभाव सदा चलते रहना है; वे टिक गये हैं, अर्थात् चलना बन्द कर दिये हैं; इस प्रकार प्राण अस्थिर (अपने स्वभावसे विचलित) हो गये हैं । यह प्रक्रिया भी सुबोध नहीं है । इस प्रकारकी दुर्बोधार्थ पदावली श्रोताको सिर खुजानेको बाध्य करनेको पर्याप्त है । इस प्रकारकी पदावली यद्यपि रूढिच्युति दोषसे युक्त प्रतीत होती है । तथापि परव्यामोहन प्रयोजनमें तात्पर्य होनेसे यहाँ यह दोष नहीं, अपितु गुण बन जाती है⁴ ॥ १११ ॥ (५) समान-रूपा—'अत्रोद्याने मया दृष्टा०' (११२) में कविने ऐसे पदोंका प्रयोग किया है जिनके मुख्यार्थसे तो किसी लताका वर्णन है, पर विवक्षित १. तिरुहुति-सं० के मूलपाठमें तथा तरुणटीकामें 'मञ्जरी' पाठ है : अत्रो- द्याने पञ्चपल्लवा मञ्जरी किसलय-मञ्जरी दृष्टा । २. अमरकोष ३।२।६ : स्फातिर्वृद्धौ । ३. वादितीका : स्फार्हो मधुरः । रत्नदर्पण : मनोहरः । तरुणटीका : स्फा- र्हंवल्गवः स्फीतशब्दाः । ४. यत्तु रूढिच्युतत्वेन प्रोक्तमन्यार्थसञ्जितम् । प्रहेलिकादिषु प्रायो गुणत्वं तस्य युज्यते ॥ सरस्वती० १।६४
१४२ काव्यादर्श [३।११३ (६) सुराः सुरालये स्वैरं भ्रमन्ति दशनाचिषा । मज्जन्त इव मत्तास्ते सौरे सरसि सम्प्रति ॥ ११३ ॥ (६) शराब खींचने वाले वे अब मस्त हुए सुरामय तालाबमें दन्तकान्तिसे डूबतेसे मदिरागारमें स्वच्छन्दतासे घूमते हैं ॥ ११३ ॥ अर्थ उसके गौण आरोपसे किसी सुन्दरीकी भुजाका वर्णन है : इस (प्रकृत रमणीके शरीर रूपी) उद्यानमें मैंने पाँच (अंगुलीरूपी) कोंपलों वाली (भुजलता) देखी है। इसके प्रत्येक (अंगुलिरूपी) पल्लवमें स्निग्ध (पानीदार, चमकीली नखरूपी) कुसुम-मञ्जरी है। इस प्रकार समानरूप वाले गौणार्थक पदोंसे ग्रथित यह प्रहेलिका 'समान-रूपा' है । 'वल्लरी' शब्द अमरकोषके अनुसार 'मञ्जरी' अर्थमें है । सम्भवतः इसी कारण तरुणवाचस्पतिने 'वल्लरी' के स्थानमे 'मञ्जरी' पाठकी व्याख्या 'किसलय-मञ्जरी' की है । पर 'वल्लरी' का प्रयोग इसी √वल्ल् से निष्पन्न 'वल्ली' (बेल, लता) अर्थमें कवियोंने किया है ।१ यहाँ भी वही अर्थ अभिप्रेत है : मञ्जरीके पत्ते नहीं होते, किसलयोंपर मञ्जरीका आरोप विचित्र है; मञ्जरीमें पुनः कुसुममञ्जरी भी नहीं होती; 'लता'में यह सब सम्भव है । वादी जङ्घालदेवने वल्लरीसे नारीकी देहलता अर्थ लिया है । उस देहलताके 'दो हाथ, दो पाँव और अधरोष्ठ', ये पाँच पल्लव हैं । इनमें हाथ- पाँवकी अंगुलियाँ कुसुम हैं, उनके कान्तिमान् नख मञ्जरियाँ हैं । अधरोष्ठ कुसुमके दन्तप्रभा मञ्जरी है । रत्नश्रीज्ञानने भी 'वल्लरी'से 'स्त्री'को ही लिया है । पर 'पल्लव' से 'अंगुलियाँ' और 'कुसुममञ्जरी'से 'नख' लिये हैं । वादी जीकी व्याख्या अधिक मनोरम है ॥ ११२ ॥ (६) परुषा — 'सुराः सुरालये स्वैरं' (११३) में ओंठोंसे जाम लगाये मदमस्त सुराविक्रेताओंके अपने शराबखानेमें घूमनेका वर्णन लोकमें अप्रसिद्ध किन्तु व्याकरणकी लाठीसे हाँके हुए (शास्त्रमात्रसिद्ध सुरां कुर्वन्तीति सुराः, सुरा + णिच् + अच् सुराः, पुं०, प्र०, ब० व०,२ सुराया इदं सौरं, तस्मिन् सौरे) शब्दोंसे किया है । होंठोंसे लगाये जाममें दाँतोंकी परछाँई पड़ती है, तो लगता है जैसे वे उस जाममें डुबकी लगा रहे हैं ॥ ११३ ॥ १. तनुरभिलषितं क्लमच्छलेन व्यवृणुत वेल्लितबाहुवल्लरीका ॥ माघ ७।७२ २. 'तत्करोति, तदाचष्टे' (वार्तिक) से णिच् तथा 'नन्दि-ग्रहि-पचादिभ्यो ल्युणिन्यचः' (अष्टा० ३।१।१३४) से अच् होता है ।
३।११४] ४. प्रहेलिकाके भेदोंके उदाहरण १४३ (७) नासिक्य-मध्या, परितश्चतुर्वर्णविभूषिता । अस्ति काचित् पुरी यस्यामष्टवर्णाद्वया नृपाः ॥ ११४ ॥ (७) बीचमें नासिकासे उच्चरित वर्ण वाली, दोनों ओर चार (दो-दो) वर्णोंसे सुशोभित कोई नगरी है, जिसमें आठ वर्णोंसे युक्त नाम वाले राजा हैं ॥ ११४ ॥ (७) सङ्ख्याता — 'नासिक्यमध्या परितश्०' (११४) में किसी राजधानी का वर्णन उसके नाम और शासकोंके नामका निर्देश सङ्ख्या शब्दोंके प्रयोगसे करके किया है । तमिलनाडुकी नगरी काञ्ची है । इसके मध्यमें नासिक्य वर्ण 'ञ्' है । दोनों ओर मिलाकर चार वर्ण — ञ्' के पहले 'का' (क् + आ) और बादमें 'ची' (च् + ई) – हैं । इसके राजाओंके नाममें आठ वर्ण हैं । रत्नश्री- ज्ञान और तरुण वाचस्पतिने इससे 'पल्लवाः' (विसर्गसहित आठ वर्ण) का ग्रहण किया है । प्रेमचन्द्र तर्कवागीश तथा जीवानन्द विद्यासागरने 'पुण्ड्रक' वंशके राजाओंका ग्रहण किया है । उन्होंने 'पल्लवाः'में विसर्ग (प्रथमा- बहुवचनमें लभ्य) का वर्णोंमें ग्रहण इनके अयोग-वाह होनेसे नहीं किया है ।¹ इतिहासके अनुसार ४थीसे ६वीं शती तक काञ्ची पल्लवोंकी राजधानी रही है ।² रही बात अयोगवाहों ('अ' आदि स्वरोंके योग = सम्बन्धके वाहकों) को वर्ण माननेकी, शौनक और पाणिनिने अनुस्वार, विसर्ग, उसके भेदों जिह्वामूलीय, उपध्मानीयको वर्ण माना है ।³ पल्लवोंके लिये अष्टवर्णाः योगका प्रयोग सिंहविष्णु पल्लवके पुत्र 'मत्त- विलास', 'विचित्रचित्त' के नामोंसे भी प्रसिद्ध महेन्द्रवर्मा पल्लव (५६० ई० से ६३० ई०) के मामन्दूर शिलालेखमें भी मिलता है । अतः शब्दोपात्त तथा न्यायोपात्त होनेसे 'पल्लवाः' ही 'अष्टवर्णाद्वय नृप' हैं, 'पुण्ड्रक' नहीं । पुण्ड्रकोंका काञ्चीसे सम्बन्ध नहीं रहा है । वे तो प्राचीन कालमें प्रेमचन्द्र तर्क- बागीशके देश बंगालसे सम्बद्ध रहे हैं । यहाँ सङ्ख्याके प्रयोगसे व्यामोह उत्पन्न किया गया है । दण्डीके इस भेद १. प्रभा : तत्र 'पल्लवा' इत्यत्र वर्णगणनायां विसर्जनीयस्यायोगवाहत्वेन गणनमनुचितमिति तेषामभिप्रायः स्यात् । २. नीलकण्ठ शास्त्री, ए हिस्ट्री आफ साउथ इण्डिया, अष्टम अध्याय । ३. ऋक्प्रातिशाख्य १।६ : सर्वः शेषो व्यञ्जनान्येव । १।३८-३६ भी देखें । त्रिषष्टिश्चतुःषष्टिर्वा वर्णाः शम्भुमते मताः । पाणिनीयशिक्षा ३ अनुस्वारो विसर्गश्च ≍ क ≍ पौ चापि पराश्रितौ ॥ ५
१४४ काव्यादर्श [३।११५-११६ (८) गिरा स्खलन्त्या नम्रेण शिरसा दीनया दृशा । तिष्ठन्तमपि सोत्कम्पं वृद्धे, मां नानुकम्पसे ॥ ११५ ॥ (६) आदौ राजेत्यधीराक्षि, पार्थिवः कोऽपि गीयते । सनातनश्च, नैवासौ राजा, नैव सनातनः ॥ ११६ ॥ (८) लड़खड़ाती वाणीसे, झुके सिरसे, दीन दृष्टिसे, कँपकँपाते खड़े हुए भी मुझपर अरी बुढ़िया, तू कृपा क्यों नहीं करती ? ॥ ११५ ॥ (६) हे चञ्चल चितवन वाली, कोई पार्थिव आदिमें 'राजा' के रूपमें कहा जाता है, और सनातन भी (कहा जाता है) । (किन्तु) वह न ही 'राजा' है, न ही 'सनातन' है ॥ ११६ ॥ को उपलक्षक माना जा सकता है वर्णोंके स्थाननिर्देशसे व्यामोहकारी प्रहे- लिकाका¹ ॥ ११४ ॥ (८) प्रकल्पिता — प्रकृत उदाहरण (श्लोक ११५) में इस प्रकारसे कथन किया गया है कि उससे विवक्षित अर्थसे भिन्न अर्थका आभास होता है । विवक्षित अर्थ है : कोई दरिद्र अपनी दीन अवस्थाका वर्णन करता हुआ लक्ष्मीको (क) पुराण पुरुषोत्तमकी वधू² होनेसे वृद्धा, अथवा (ख) वृद्धि- स्वभावा होनेसे 'वृद्धा' शब्दसे अथवा (ग) 'वृद्धि' (समृद्धि) शब्दसे सम्बोधित करके उससे शिकायत करता है कि वह उसपर दया क्यों नहीं करती ? परन्तु इससे भिन्न अर्थ यह आभासित होता है कि कामका मारा कोई बुढऊ (छोकरा नहीं डोकरा) किसी बुढ़िया (छोकरी नहीं डोकरी) से प्रेमकी भिक्षा माँग रहा है । अतः यह प्रकल्पिता है ॥ ११५ ॥ (६) नामान्तरिता — प्रकृत (११६वें) श्लोकमें पार्थिवको पहले 'राजा' १. य एवादौ, स एवान्ते, मध्ये भवति मध्यमः । अस्यार्थं यो न जानाति, तन्मुखे तं ददाम्यहम् ॥ यहाँ 'जो ही आदिमें है, वही अन्तमें है, बीचमें बीच वाला है । जो इसका अर्थ नहीं जानता, उसके मुँहमें उसे देता हूँ ।' कथन व्यामोहकारी है । समाधान है : 'य' ही आदि में है, 'स' ही अन्तमें है, और 'एवादौ' तथा 'एवान्ते' के बीच वाला 'व' बीचमें है : यवस । जो इत्तीसी बात नहीं जानता, उस अज्ञानी पशुके मुँहमें मैं उसे ('यवस', 'घास') देता हूँ । २. पुंसः पुराणादाच्छिद्य श्रीस्त्वया परिभुज्यते । काव्यादर्श २।३४३
३।११७] ४. प्रहेलिकाके भेदोंके उदाहरण १४५ (१०) हृत-द्रव्यं जनं त्यक्त्वा धनवन्तं व्रजन्ति काः । नाना-भङ्गि-शताकृष्ट-लोका ? वेश्या न दुर्धराः ॥ ११७ ॥ (१०) नाना प्रकारके हाव-भावोंके सैकड़ों प्रकारोंसे लोगोंको आकृष्ट करने वाली कौन ले लिये गये द्रव्य (धन) वाले लोगोंको छोड़कर धनवान्के पास जाती हैं ? काबूमें आनेमें कठिन वेश्याएँ नहीं ॥ ११७ ॥
और 'सनातन' कहकर फिर उसका निषेध किया है। इससे श्रोताकी बुद्धि भ्रान्त हो जाती है। उसका समाधान निम्न प्रकारसे होगा : 'पार्थिव' से यहाँ 'पृथिवीपति' अर्थ अभिप्रेत नहीं है, अपितु 'वृक्ष' अभीष्ट है ।१ कोई वृक्ष ऐसा है, जो आरम्भमें तो 'राजा' है, और वह (स) नहीं (न) अतन ('तन' शब्दसे रहित) है (स न अतनः च न), अर्थात् 'अतन' है : राजन् + अतन = राजातन है । यह 'राजातन' वृक्ष है, न राजा (भूमिपति) है, और न 'सनातन' (नित्य) है। कोषोंके अनुसार क्षीरिका अपरनाम पियाल, खीरणी वृक्षको मीठे फलों के कारण राजभोग्य होनेसे 'राजादन' कहते हैं । दक्षिणकी भाषाओंमें वर्गोंके प्रथम तीन वर्ण एक-दूसरेके स्थानमें प्रयुक्त हो जाते हैं। अतः दक्षिणमें इसे 'राजातन' भी कहते हैं । यह वर्तनी संस्कृतमें भी स्वीकृत हो गई थी ।२ इसी 'राजातन' वृक्षके नाममें नाना अर्थोंकी विधि और निषेधके रूपमें कल्पना इस उक्तिमें की गई है। अतः यहाँ 'नामान्तरिता' प्रहेलिका है ॥ ११६ ॥ (१०) निभृता--प्रकृत ११७वें श्लोकमें कविने जो उक्ति प्रस्तुत की है, वह श्रोताको अर्थके कारण व्यामोहकारी है। क्योंकि इसमें आपाततः प्रतीत होने वाले वेश्याके धर्मोंके समान धर्म वाले पदार्थको छुपाकर कहा है । रत्नश्रीज्ञान, वादी जङ्घाल देव और तरुण वाचस्पतिने उक्त धर्मोंकी समानता श्रीसे मानी है : स्थावर, जङ्गम गज, रत्न, भूमि, धन-धान्य आदि नाना प्रकार वाली लक्ष्मी नष्ट-द्रव्य मनुष्यको छोड़कर धनवानको चली १. 'पार्थिव' की दो व्युत्पत्तियाँ हैं : (१) पृथिव्या विकारः, 'पृथिव्या वाञौ' (वार्तिक ४।१।८५); (२) पृथिव्या ईश्वरः, 'सर्वभूमि-पृथिवीभ्यामणञौ' (अष्टा० ५।१।४१), 'तस्येश्वरः' (४२)। पार्थिवो नृपतौ, भूमिविकारे पार्थिवोऽन्यवत् (विश्वकोष) । २. 'राजादनं प्रसरको राजातनः' इति वाचस्पतिः (अमरकोष २।४।३५ पर र(माश्रमी) ।