भारतकोश
काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary

महाकवि दण्डी द्वारा

DevanagariHindipublished270 पृष्ठ

पृष्ठ 143, कुल 270 में से

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पृष्ठ 143

१२० काव्यादर्श [३।६६ प्रकारकी पहेलियोंके नाम तथा लक्षण दिये हैं। उन्हीं आचार्यों द्वारा प्रोक्त १४ दुष्ट पहेलियाँ न बतानेका प्रयोजन ११वें श्लोकमें बताकर १६ श्लोकोंमें पूर्वोक्त साधु प्रहेलिकाओंके उदाहरण प्रस्तुत किये हैं। सङ्कीर्ण प्रकार उप- लक्षक है नाना (गौण-मुख्य भावसे तथा समकक्ष रूपसे सम्पन्न) सङ्कर- प्रकारोंका। प्रहेलिका प्रकरणके अन्तिम (१७वें) श्लोकमें सङ्कीर्ण प्रहेलिकाकी सङ्गति बताई है। इस प्रकार ६७से १२४ तकके २७ श्लोकोंकी नक्षत्रमालासे आचार्यने रमणीय प्रहेलियोंकी कण्ठभूषा निर्मित की है। आचार्यने प्रहेलिकाओंके प्रयोजनोंमें (६७वें श्लोकमें) 'परव्यामोहन' भी एक प्रयोजन बताया है। इससे प्रहेलिकाओंकी दुष्करता सूचित होती है। रत्नश्रीज्ञान, वादि जङ्घालदेव तरुण वाचस्पति आदि प्राचीन तथा रङ्गाचार्य रेड्डी आदि अर्वाचीन सभी टीकाकारोंने इसके पूर्वार्ध श्लोकमें दुष्कर मार्गका उपसंहार माना है। यह उचित नहीं है। केवल पूर्वार्धमें दुष्करका उपसंहार माननेसे प्रहेलिकाएँ दुष्करसे बहिर्भूत माननी होंगी। तब वे पर-व्यामोहनमें उपयुक्त कैसे होंगी ? यह प्रयोजन तो इनके दुष्कर, दुर्बोध होनेसे ही सिद्ध हो सकता है, सुकर होनेसे नहीं। अतः इस समूचे श्लोकमें दुष्करका उपसंहार मानना उचित है ॥ त्रयोदश्यां गुरौ प्रातश्चन्द्रे रिरंसि-संयुते । वर्णनियमवांश्चित्रबन्धो व्याख्यायि यत्नतः ॥ १ ॥ हन्तेदमुज्ज्वलं दीप्तं प्रजाहाहाकरं नभः । न स्पृष्टं मेघनाम्नाऽपि; नितान्ताकरुणः प्रभुः ॥ २ ॥ कपूयाचरणे राज्ञि प्रजास्वस्यानुयासु च । कुतो देवस्य दृष्टिः स्यात्कोमला सुखदायिनी ॥ ३ ॥ हरो हरतु सन्तापमूलं दुष्कर्मभावनाम् । भव्यं भवतु लोकस्य; देशे स्याच्छासनं शुभम् ॥ ४ ॥ — ০ — नभःकृष्णे भृगो रात्रौ युगे-युगे प्रहेलिकाः । लोकमानसगाहिन्यो हंस्यो यथा समुज्ज्वलाः ॥ १ ॥ निर्दोषारावसंयुक्ता विद्वद्बालमनोहराः । सम्प्रत्याख्यामि ताः सम्यग् वेदे लोके समादृताः ॥ २ ॥ नैवेष्टा भामहैर्मुग्धैर्युक्त्याऽऽख्यातास्तु दण्डिभिः । इतो यत्नेन मध्येषा प्रीयतां वागधीश्वरी ॥ ३ ॥