काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary
महाकवि दण्डी द्वारा
पृष्ठ 142, कुल 270 में से
संदर्भ में पढ़ें३।६६] दुष्कर एवं सुकर मार्गका उपसंहार ११६ इति दुष्करमार्गेऽपि किञ्चिदादर्शितः क्रमः। प्रहेलिकाप्रकाराणां पुनरुद्दिश्यते गतिः ॥ ६६ ॥ इस प्रकार दुष्कर (कठिन, दुर्बोध रचना वाले) मार्गमें भी क्रम (व्यवस्था, स्वरूप) कुछ दिखा दिया है। अब प्रहेलिकाके भेदोंका स्वरूप नामतः बताया जा रहा है ॥ ६६ ॥ एकव्यञ्जन नियमको शिथिल करता है।¹ परवर्ती आचार्यों द्वारा अन्त्य वर्णकी भिन्नताको दोषावह न बताना² कविके सामर्थ्यकी शिथिलताको स्वीकार करना है। दण्डीके प्रकृत उदाहरणमें एक ही व्यञ्जन नकारका प्रयोग किया गया है। विसर्गको उस दृष्टिसे व्यञ्जन नहीं माना जाता (श्लोक ६२, पृष्ठ ११६ देखें) । अतः वह एकव्यञ्जन नियमका भञ्जक नहीं है ॥ ६५ ॥ दुष्कर एवं सुकर मार्गका उपसंहार—आचार्य दण्डीने तृतीय अध्यायमें (क) ३७वें श्लोक तक सुकर बन्ध वाले यमकका निरूपण किया है। (ख) ३८वेंसे ७७वें श्लोक तक ४० श्लोकोंमें दुष्कर बन्ध वाले यमकके विभिन्न भेद और उनके उदाहरण दिये हैं। (ग) ७८वें से ८२वें तक ५ श्लोकोंमें त्रिविध दुष्कर आकारबन्ध प्रदान किये हैं। (घ) ८३वें से ६५ वें तक १३ श्लोकोंमें दुष्कर वर्णनियमके तीन प्रकार उनके चार-चार अवान्तर भेदोंमें प्रतिपादित किये हैं। इस प्रकार (ख—घ) ३८वेंसे ६५वें तक ५८ श्लोकोंमें आचार्य दण्डीने काव्यमें शोभावह दुष्कर निबन्धनके मार्गका सङ्क्षेपमें किन्तु अनुक्त- की उपलक्षकताकी दृष्टिसे समृद्ध वर्णन किया है। 'अपि'से दुष्करसे पूर्व प्रतिपादित (क) सुकर मार्गका समुच्चय आचार्य को इष्ट है। दुष्करके अतिरिक्त सुकर मार्गका भी निरूपण सङ्क्षेपसे (किञ्चिद्) ही किया गया है। सुकरकी सङ्क्षिप्तताका स्पष्ट कथन पीछे ३७वें श्लोकमें किया जा चुका है। दुष्कर मार्ग भी पूरी तरहसे नहीं दिखलाया गया है। कुछ ही दिखलाया गया है। दुष्करके इस 'किञ्चिदादर्शित क्रम' में अभी (ङ) प्रहेलिकाओं (पहेलियों) का निरूपण रहता है। आचार्यने अगले ८० श्लोकोंमें पूर्वाचार्यों द्वारा निर्दिष्ट पन्द्रह शुद्ध और एक संकीर्ण १. न नोननुन्नो, नुन्नोनो, नाना नानाऽऽनना ननु । नुन्नोऽनुन्नो ननुन्नेनो नानेना नुन्ननुन्न नुत् ।। किरातार्जुनीय १५।१५ २. किरातार्जुनीय १५।१४ पर मल्लिनाथ सूरिका घण्टापथ : अयमेकव्य- ञ्जनः । अन्त्यस्तकारस्तु न दोषावहः । 'नान्त्यवर्णस्तु भेदकः' इत्यभ्यनु- ज्ञानात् ।