काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary
महाकवि दण्डी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें११८ काव्यादर्श [३।६४-६५ (३.३) सूरिः सुरासुरासारि-सारः, सारसि-सारसाः । ससार सरसीः सीरी स-सूरूः स सुरा-रसी ॥ ६४ ॥ (३.४) नूनन्नुन्नानि नानेन नाननेनाननानि नः । नानेना ननु नानूनेनैनेनानानिनो निनीः १ ॥ ६५ ॥ (३.३) विद्वान् (नीतिज्ञ), सुरों और असुरोंको व्याप्त करने वाले बलसे युक्त, सुन्दर जाँघों वाली रमणियों सहित, सुरामें रस लेने वाले उन हलधर (बलराम) ने कलरव करते सारसों वाली सरसियों (पुष्करिणियों) में अव- गाहन किया ।। ६४ ।। (३.४) इस बलवान् (पुरुष) ने हमारी सेनाओंको निश्चय ही ध्वस्त नहीं कर दिया है, ऐसा नहीं है (अर्थात् ध्वस्त कर ही दिया है) । न्यूनके विपरीत (अर्थात अधिक, बलवत्तर) इस (पूर्वोक्त पुरुष) के साथ बलहीनों (दुर्बलों) को लड़ाने वाला (पुरुष) क्या निरपराध हो, ऐसा नहीं है ? (अर्थात् ऐसा पुरुष अपराधी है ही) ।। ६५ ।। दुदाव—टुदु उपतापे (स्वादि०) कर्तरि लिट्, प्र० ए० व० । द्युलोक (आकाश अमूर्त, निराकार द्रव्य) को उपतप्त करना सम्भव नहीं है । अतः लक्षणया द्युस्थ विभिन्न लोकोंके निवासी अभिप्रेत हैं । श्रीमद्भागवतमें इसी भावको सुन्दर अभिव्यक्ति दी गई है। दण्डीने सङ्क्षेपके कारण सङ्केत ही किया है । दाने— दो अवखण्डने (दिवादि०) से ल्युट्, सप्तमी, ए० व० ॥६३॥ (३.३) द्वि-व्यञ्जन-नियम चित्र बन्ध—चौरानवेंवे श्लोकमें आचार्य दण्डीने बलवत्ता, स्त्रीसङ्ग और सुरापानके लिये प्रसिद्ध हलायुध बलरामके पुष्करिणियोंमें विहारका वर्णन समूचे श्लोकमें 'स' और 'र' दो व्यञ्जनोंका ही प्रयोग करके किया है । स्वर यहाँ यद्यपि अ, इ, उ (सब ह्रस्व और दीर्घ) तीन ही प्रयुक्त हुए हैं, अतः स्वरनियम भी है । तथापि समूचे ध्वनिप्रभावकी दृष्टिसे व्यञ्जननियम चारुतर है । यों इसमें सादा-सा यमक भी है ।। ६४ ।। (३.४) एक-व्यञ्जन-नियमवान् चित्र बन्ध—वर्णनियम बन्ध प्रकरणके अन्तिम श्लोकमें आचार्य दण्डीने बलवान् शत्रुसे भिड़नेके कारण डरे हुए निर्बल लोगों द्वारा अपने स्वामीकी आलोचना कराई है । भारविका उदाहरण अर्थकी दृष्टिसे इससे बेहतर है । किन्तु उसमें चतुर्थपादान्तमें तकारका प्रयोग १. अन्वय : अनेन अननेन नः अननानि नूनं न नुन्नानि, न । अनूनेन एनेन अनानिनः निनीः ना ननु अनेनाः न ?