भारतकोश
काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary

महाकवि दण्डी द्वारा

DevanagariHindipublished270 पृष्ठ

पृष्ठ 135, कुल 270 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 135

११२ काव्यादर्श [३।६० (२.३) अनङ्ग-लङ्घनालग्न-नानाऽऽतङ्का सदङ्गना । सदानघ, सदानन्द, नताङ्गासङ्ग सङ्गत ॥ ६० ॥ (२.३) हे सदा अनघ (पापरहित), सदानन्द (श्रेष्ठोंको आनन्दित करने वाले), नत (विनत) अङ्गों वालीको प्रेम करने वाले मित्र, वह श्रेष्ठ सुन्दरी अनङ्गका लङ्घन (कामदेवकी मर्यादाका अतिक्रमण) करनेके कारण तरह- तरहके आतङ्कोंमें आ घिरी है। (उसे तुम कामदेवके कोपसे बचाओ) ॥६०॥ विभाव सुन्दरीके उद्दीपन विभाव मुखकी अद्भुत आकर्षकताका वर्णन पिछले पद्यके समान प्रथम पादमें नविपुलासे युक्त श्लोक छन्दमें किया है। कोमल तथा आनन्ददायी नील कुञ्चितकेशोंसे तथा कमलसदृश नयनोंसे युक्त ज्योत्स्नामय, देखते ही भली भाँति प्राण युक्त कर देने वाले (आनन) मुख पदार्थ द्वारा भी हनन किए जानेसे अधिक विषम क्या होगा ? दण्डीके यहाँ यह विरोध है । ग३३४ देखें । यहाँ (१) स्वरोंमें कण्ठ्य (i) अ, आ, (ii) तालव्य इ, ई, (iii) कण्ठ-तालव्य ए स्वरोंका ही प्रयोग किया गया है। (२) व्यञ्जनोंमें (i) कण्ठ्य क, घ, ह, (ii) तालव्य च, छ, य, श, (iii) दन्त्य त, न, ल, स का, (३) तथा स्वरव्यञ्जनोभयात्मक अनुस्वारका¹ प्रयोग किया गया है। यहाँ भी अवान्तर सभी भेदोंका प्रयोग किया हुआ है। अर्थावबोधकी दृष्टिसे यद्यपि यह पद्य प्रसादगुणयुक्त (झटिति अर्थसमर्पक) होनेसे सुगम है, पर रचनाविधानमें वर्णचयनमें स्थानविशेषसे तथा उसमें भी अवान्तर भेदोंको स्थान देनेके लिये विशेष प्रयत्न अपेक्षित होनेसे यह आधुनिक मन्त्रिमण्डलके गठनके प्रयासोंके समान दुष्कर है, यह स्पष्ट है ॥ ८६ ॥ (२.३) द्विस्थान वर्णनियम चित्र बन्ध—नवतितम श्लोकमें कविने वर्ण- स्थाननियम चित्रबन्ध वाले पद्यमें सुन्दरीकी विप्रलम्भ रतिका वर्णन किया है। उत्तरार्धके सभी पद सम्बोधन हैं। कोई पुरुष अपने मित्रको मित्रके प्रेममें बिरहिन नायिकाकी स्थितिका वर्णन कर रहा है। अर्थकी दृष्टिसे यह सुगम १. शौनकके अनुसार अनुस्वारमें स्वर और व्यञ्जन दोनोंके धर्म हैं। अतः यह स्वर भी माना जा सकता है और व्यञ्जन भी : अनुस्वारो व्यञ्जनं वा, स्वरो वा (ऋक्प्रातिशाख्य १।५) । उवटने इसकी व्याख्या इसे स्वरव्यञ्जनोभयात्मा वर्णान्तरके रूपमें बताकर की है : ‘अं’ इत्यनुस्वारो वर्णसमाम्नाये पठ्यते । स कांश्चित् स्वरधर्मान् गृह्णाति, कांश्चिद् व्यञ्जन-धर्मान् ।...तत्रोभय-धर्म-योगादुभय-स्वभावं स्वर-व्यञ्जनयोरन्यद् वर्णान्तरं प्रकाशयति—‘अनुस्वारो व्यञ्जनं वा, स्वरो वा ।’ इति ।