भारतकोश
काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary

महाकवि दण्डी द्वारा

DevanagariHindipublished270 पृष्ठ

पृष्ठ 134, कुल 270 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 134

३।८६] ३. वर्णनियम : चित्र बन्ध (२.२) त्रिस्थानवर्णनियमवान् १११ (२.२) अलि-नीलालक-लतं कं न हन्ति घन-स्तनि ? आननं नलिन-च्छाय-नयनं शशि-कान्ति ते ॥ ८६ ॥ (२.२) हे मघन स्तनों वाली, भ्रमरसमान काली घुंघराली अलकावली वाला, कमलसमान शोभासे युक्त नज़रों वाला, चन्द्रके समान कान्ति वाला तुम्हारा मुख किसे कष्ट नहीं पहुँचाता है ? ॥ ८६ ॥ प्रथम पाद तृतीयपादोक्त 'गगने' का सप्तम्यन्त विशेषण भी हो सकता है, तो 'अङ्गने' का सम्बुद्धिविभक्त्यन्त विशेषण भी हो सकता है । 'अघने' से शरद् ऋतुके कारण 'निरभ्रे' अर्थ अभिप्रेत है । नक्षत्रोंसे शोभित निरभ्र गगनमें एक ही कमी रह गई है चन्द्रकी । वह यहाँ तुम मेरे पास हो ! अतः 'हे नयनोंको आनन्दित करने वाली' कहना अधिक उपयुक्त है । 'आनन्दजनने' से √ह्लाद्, √चन्द् धातुओंका अर्थ कविने जानबूझकर कहा हैं। नयनोंकी कमलसे प्रसिद्ध समानताको दृष्टिमें रखते हुए 'चन्द्र' या 'चन्द्रिका' का तथा नयनोंका प्रयोग नहीं किया है, क्योंकि कमल और चन्द्रमा में विरोध जो है। 'दृष्टि'से कमलकी प्रतीति नहीं होती । यहाँ कविने समूचे श्लोकमें कण्ठ्य अकार ह्रस्व, गुरु और दीर्घ तीनों प्रकारका, (ii) तालव्य इकार (ह्रस्व और दीर्घ), (iii) कण्ठतालव्य ए तथा (iv) मूर्धन्य ऋ (ह्रस्व और गुरु), इन चार स्थानोंसे उच्चार्य स्वरोंका प्रयोग किया है । (i) कण्ठ्य क, ख, १ ग, घ, ङ का, (ii) तालव्य ज, य, श का, (iii) मूर्धन्य ट, ण, र, और षका तथा (iv) दन्त्य त, द, न, और स का इस प्रकार इन चार ही स्थानोंसे उच्चार्य व्यञ्जनोंका प्रयोग कविने किया है । कविने इन स्थानों से उच्चार्य वर्णोंके चयनमें एक और बात ध्यानमें रखी है : (१) स्वरोंमें मात्रिक अवान्तर भेद भी दिये हैं । (२) व्यञ्जनोंमें (i) स्पर्श, (ii) अन्तस्थ और (iii) ऊष्म प्रत्येक वर्गका चयन किया है । इस प्रकार यहाँ शब्दचयनकी दुष्करता स्पष्ट है ॥ ८८ ॥ (२.२) तीन स्थानोंमें उच्चरित वर्णोंके नियम वाला चित्र बन्ध- प्रस्तुत ८६ वाँ श्लोक स्थाननियमवाले चित्रबन्धके द्वितीय त्रिस्थान वर्णनियम चित्रबन्धको प्रदर्शित करनेको दिया है। इसमें कविने वक्ताकी रतिके आलम्बन १. 'नक्षत्र' के 'क्ष' का पूर्वाङ्ग 'क्' 'ष्' के योगमें 'ख्' के रूपमें भी उच्चरित होता है : चयो द्वितीयाः शरि पौष्करसादेरिति वाच्यम् (सिद्धान्तकौमुदी, हल्सन्धि); शुक्लयजुःप्रातिशाख्य ४।१२० : असस्थाने मुदि द्वितीयं शानकस्य ।