भारतकोश
काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary

महाकवि दण्डी द्वारा

DevanagariHindipublished270 पृष्ठ

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३।६० ] ३. वर्ण-नियम चित्र बन्ध : (२.३) द्वि-स्थान वर्ण-नियम ११३ है । पर रचनाकी दृष्टिसे दो ही स्थानोंके व्यञ्जनोंके चयनके कारण कठिन है । इसमें (i) कण्ठ्य व्यञ्जनों क, ग, घ, ङ, का तथा (ii) दन्त्य त, द, न और स का प्रयोग हुआ है । पिछले दो उदाहरणोंमें स्वर और व्यञ्जन दोनों, सदृशसङ्ख्यक स्थाननियमसे प्रयुक्त थे ।१ यहाँ स्वरस्थाननियम है, किन्तु वह व्यञ्जनस्थाननियमसे भिन्न है : केवल कण्ठ्य 'अ' का ही ह्रस्व और दीर्घ रूपोंमें प्रयोग हुआ है । इससे यह सूचित होता है कि आचार्यके मनमें (i) केवल व्यञ्जन या (ii) केवल स्वरका स्थाननियम भी शोभाकारकके रूपमें स्थित है । इस दृष्टिसे यह श्लोक द्विस्थानव्यञ्जननियम और एकस्थान- स्वरनियमका उदाहरण है । मिश्र पद्धतिको आदर देने वाले आचार्यके लिये यह दिग्निर्देश उचित ही है । यहाँ भी कविने स्पर्श, अन्तस्थ और ऊष्म तीनों प्रकारके व्यञ्जनोंका प्रयोग किया है । नताङ्गासङ्ग—नतान्यङ्गानि यस्याः, सा नताङ्गी, नताङ्गा२ (बहुव्रीहि) । नताङ्गायामासङ्ग आसक्तिः प्रेमा यस्य, तथाविध (बहु०) । रत्नश्रीज्ञान आदिने 'नताङ्गासङ्गेन सङ्गत' विग्रह मानकर 'सङ्गत' को समासका उत्तर पद माना है : हे अन्यस्त्रीसम्भोगप्रसङ्ग । पर यह पिछले दो विशेषणोंके विपरीत होनेसे उचित नहीं है : अन्यस्त्रीसम्भोगप्रसङ्ग (परस्त्रीके सम्भोगमें लीन) पुरुष 'सदा अनघ' (निष्पाप) तथा 'सदानन्द' (सत्‌को, या सदा, आनन्दित करने वाला) कैसे होगा ? सङ्गत—सम् + √गम् + क्त । 'क्त' जब भावमें होता है, तब 'सख्य' अर्थ होता है और जब कर्ता अर्थमें, तब रूढिमे 'सखा' अथवा यौगिक 'संयुक्त' अर्थ होता है३ ।। ६० ।। १. पीछे स्वरों और व्यञ्जनोंके स्थानोंमें भेद व्यञ्जनोंका कण्ठ-तालव्य भेद सम्भव न होनेसे हुआ है । समानाक्षर (simple vowels) उसी स्थान वाले प्रयुक्त हैं, जिस स्थानके व्यञ्जन हैं । सन्ध्यक्षर (diphthongs) भिन्न हैं । २. सिद्धान्तकौमुदी, स्त्रीप्रत्यय : नासिकोदरौष्ठजङ्घादन्तकर्णशृङ्गाच्च (अष्टा० ४।१।५५) । अत्र वृत्तिः—अङ्ग गात्र-कण्ठेभ्यो वक्तव्यम् । स्वङ्गी, स्वङ्गेत्यादि । कवियोंमें ङीषन्त अधिक प्रचलित है : अद्य प्रभृत्यवनताङ्गि, तवास्मि दासः (कुमारसम्भव ५।८६) । दण्डीने अकारबहुल पद्यमें भिन्नस्थानोच्चार्य एक ईकारान्तका प्रयोग वैरस्य- कारक समझकर नहीं किया है । ३. अष्टाध्यायी ३।१।१०४ : अजर्यं सङ्गतम् । भट्टिकाव्य ६।५३ : तेन सङ्गतमार्येण रामाजर्यं कुरु द्रुतम् । ५५ : आदृत्यस्तेन वृत्त्येन स्तुत्यो जुष्येण सङ्गतः ।