काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary
महाकवि दण्डी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३।७३ ] १ यमकके विशिष्ट भेद : (७) प्रतिलोमयमकका इतिहास ८६ पर रुद्रटने व्यपेत प्रतिलोम आवृत्ति का उदाहरण दिया है।१ (३) काव्यमें यमक औचित्य और सुबोधता होनेपर, अर्थात् सुकर होनेपर, ही ग्राह्य (मधुर) होता है, यह पीछे (पृष्ठ १६में) कहा जा चुका है।२ (४) इससे दुष्कर यमककी माधुर्यविरोधिता स्वतः प्राप्त है। (५) जब दुष्कर यमक ही काव्यको अग्राह्य बनाता है, तो सुदुष्कर चित्रबन्ध तो माधुर्यके लिये सुतराम् माहुर हैं, यह स्वतः स्पष्ट है। (६) रुद्रटने मात्राच्युतक आदि तथा पहेलियों को कवियोंके खेलकी चीज बताया है।३ प्रायः दण्डीके अनुयायी महाराज भोजने यमकके प्रतिलोमभेदके विषयमें थाचार्य रुद्रटका अनुसरण किया है : उन्होंने इसे गतिके प्रतिलोमनियमके कारण सम्पन्न 'चित्र' नामक शब्दालङ्कारके अन्तर्गत माना है। इसे उन्होंने 'गत-प्रत्यागत' नाम दिया है। उदाहरण दण्डीके न देकर भारवि (सरस्वती० २।३००, किराता० १५।२२) तथा माघके (सरस्वती० २।२६६, ३०१-३०२, ३०५, शिशु० १६।४४, ३३-३४, ६०) दिये हैं। भोजने गत-प्रत्यागतके दण्डी और रुद्रटके भेदोंसे अन्य भी अक्षरगत (२।३००), भाषान्तरगत (३०३- ३०४), अर्थानुगत (३०५) भेद किये हैं। दण्डीने प्रतिलोमपठित काव्यको चित्राकारबन्धमें निष्पन्न न होनेके कारण चित्रबन्ध नहीं माना है, अपितु प्रतिलोम आवृत्तिके कारण 'यमक' ही बताया है। जिस प्रतिलोम आवृत्तिसे किसी प्रकारका चित्रबन्ध बन जाता है, उसे वे 'यमक' न कहकर चित्र ही कहते हैं। उदाहरणार्थ सर्वतोभद्रके चारों पादोंमें पूर्वांशकी प्रतिलोम आवृत्ति होती है, तथा 'सर्वतोभद्र' नामक वेदीका आकार भी निर्मित होता है। तो उन्होंने इसे (८०, ८२ श्लोकोंमें) १. वेदापन्ने स शकले रचितनिजरुगुच्छेदयत्नेऽरमेरे, देवासक्तेऽमुदक्षो बलदमनय दस्तोददुर्गासवासे । सेवासगर्दुदस्तो दयनमदलवक्षोदमुक्ते सवादे, रेमे रत्नेऽयदच्छे गुरुजनितचिरक्लेशसन्नेऽपदावे ।। काव्याल० ५।१७ २. इति यमकमशेषं सम्यगालोचयद्भिः सुकविभिरभियुक्तैर्वस्तु चौचित्यविद्भिः । सुविहितपदभङ्गं सुप्रसिद्धाभिधानं तदनु विरचनीयं सर्गबन्धेषु भूम्ना ।। काव्याल० ३।५६ ३. मात्राबिन्दुच्युतके प्रहेलिकाकारकक्रियागूढे । प्रश्नोत्तरादि चान्यत् क्रीडामात्रोपयोगमिदम् ।। काव्याल० ५।२४