भारतकोश
काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary

महाकवि दण्डी द्वारा

DevanagariHindipublished270 पृष्ठ

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पृष्ठ 111

८८ काव्यादर्श [३७३ अपरनाम महायमक, के सादे भेद श्लोकाभ्यास यमकसे आगे नहीं बढ़े हैं।¹ (३) प्रतिलोम, गत-प्रत्यागत प्रकारकी आवृत्तियाँ उन्होंने नहीं दी हैं। (४) उन्होंने चित्रबन्ध तो दिये ही नहीं हैं। इससे प्रतीत होता है कि शास्त्र- काव्यप्रणयन प्रयोजन होनेसे व्याकरणज्ञानकी अत्यन्त अपेक्षाके कारण व्याख्यागम्य काव्य लिखते हुए भी महाकवि भट्टि निबन्धनकी दृष्टिसे काव्य को व्याख्यागम्य बनाना उचित नहीं समझते थे। इस विषयमें दण्डीका चिन्तन बिल्कुल स्पष्ट एवं युक्तियुक्त है : (१) वे यमकको एकान्तमधुर नहीं मानते, यह पीछे (१।६१, पृष्ठ १२४में) कहा जा चुका है। (२) उन्होंने सुकर, दुष्कर यमकों और चित्रबन्धोंको न केवल आन्तरिक क्रमिक विकासके साथ प्रस्तुत किया है, अपितु यमक और चित्र- बन्धोंके पौर्वापर्यसे भी इनका आपेक्षिक वैषम्य सूचित किया है। अर्थात् दण्डी शब्दालङ्कारोंमें (१) अनुप्रासको माधुर्यकारक मानते हैं; (२) सुकर यमक भी काव्यमें माधुर्यकी पुष्टि करता है; (३) दुष्कर यमक जितना दुष्कर होता है, काव्यमें माधुर्यका उतना विघातक होता है, (४) चित्रबन्ध तो काव्यमें वैषम्यकारक ही होते हैं। आचार्य रुद्रटने इस दिशामें चिन्तनका विकास यों किया है : (१) उन्होंने 'यमक' के अन्तर्गत अनुलोम वर्णावृत्ति ही ली है।² प्रतिलोम आवृत्ति को उन्होंने चित्रबन्धोंमें सम्मिलित किया है।³ (२) दण्डीको केवल अव्यपेत प्रतिलोम आवृत्ति अभीष्ट है, यह उनके (७४-७७) उदाहरणोंसे स्पष्ट है। १. बभौ मरुत्वान् विकृतः समुद्रो...॥ भट्टिकाव्य १०।१६ अभियाता वरं तुङ्गं भूभृतं रुचिरं पुरः। कर्कशं प्रथितं धाम ससत्त्वं पुष्करेक्षणम् ॥ २०-२१ २. तुल्य-श्रुति-क्रमाणांमन्यार्थानां मिथस्तु वर्णानाम् । पुनरावृत्तिर्यमकं, प्रायश्छन्दांसि विषयोऽस्य ॥ काव्याल० ३।१ नमिसाधुटीका : 'क्रम'-ग्रहणात् प्रतिलोमानुलोम-सर्वतोभद्रानुप्रासादीनां यमकत्वनिरासः । न हि तेषु तुल्य-श्रुति-सद्भावेऽपि तुल्य-क्रमो विद्यते । ३. भङ्ग्यन्तरकृततत्क्रमवर्णनिमित्तानि वस्तुरूपाणि । साङ्गानि विचित्राणि च रच्यन्ते यत्र, तच्चित्रम् ।। काव्याल ० ५।१ तच्चक्रखङ्ग... अनुलोमप्रतिलोमैरर्धभ्रममुरजसर्वतोभद्रैः । २-३ ...भेदैर्विभिद्यमानं सङ्ख्यातुमनन्तमस्मि नैतदलम् । ४