भारतकोश
काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary

महाकवि दण्डी द्वारा

DevanagariHindipublished270 पृष्ठ

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३७३] १. यमकके विशिष्ट भेद : (७) प्रतिलोम यमकका इतिहास ८७ आते-आते इन अलङ्कारोंमें तुलनात्मक उत्तमाधमत्वकी दिशा निर्धारित हो चुकी थी : उन्होंने चित्रबन्धोंको सर्वाधिक विषम (काव्यको दुरूह बनाने वाला) बताया है।¹ माघके इस कथनका एक फलितार्थ और भी है : वे आनन्दमात्र प्रयोजन वाले काव्यमें दुष्कर विधानसे विषमता लाना उचित नहीं समझते । भले ही भारविकी प्रतिद्वन्द्वितामें उन्होंने अपने ही काव्यको विषम बनानेसे बचनेका प्रयास नहीं किया : अहो दुरन्ता बलवद्विरोधिता । महाकवि भट्टिने अपने महाकाव्य 'रामचरित' के दशम सर्गमें अनुप्रास और यमक शब्दालङ्कारों तथा दीपक आदि अर्थालङ्कारोंका प्रशस्त प्रदर्शन किया है । उसमें उन्होंने (१) यमकके २० भेदोंके उदाहरण दिये हैं, जो भरत और भामहके भेदोंसे अधिक एवं भिन्न प्रकारके हैं, किन्तु दण्डीकी चिन्तनपरम्पराके अनुकूल हैं।² (२) भट्टि दुष्करतामें एकाकार चतुष्पाद, समपादान्त यमक २३, सर्वतोभद्रबन्ध २७, मुरजबन्ध २६, श्लोक प्रति- लोम ३३-३४, ६० पादादि व्यपेत यमक ३६, पादप्रतिलोम ४०, अर्धप्रतिलोम ४४, ८८, गोमूत्रिकाबन्ध ४६, समुद्गयमक ५८, ११८, प्रथम-तृतीय-पादादि यमक ६०, सजातीय चतुष्पादाद्यन्तादि व्यपेत यमक ६२, द्व्यक्षर श्लोक, ६६, ८४, ८६, ९४, ९८, १००, १०२, १०४, १०६, १०८, अर्धभ्रमक ७२, विषमान्त समान्त यमक ६२, गूढ चतुर्थपाद ६६, अतालव्य श्लोक ११०, विषमपादमध्य समपादान्त सजातीय यमक ११२, एकाक्षर श्लोक ११४, अर्थत्रयवाची ११६, चक्रबन्ध १२० । १. विषमं सर्वतोभद्र-चक्र-गोमूत्रिकाऽऽदिभिः । श्लोकैरिव महाकाव्यं व्यूहैस्तदभवद् बलम् ।। माघ १६।४१ २. भट्टिकाव्य, विषमपाद यमक १०।१०, समपाद यमक २, पादान्त अव्यपेत चतुष्पाद्यमक ३, पादादि अव्यपेत चतुष्पादयमक ४, पादमध्याव्यपेत चतुष्पाद यमक ५, चक्रवाल यमक ६, समुद्ग ७, काञ्ची ८, यमकावली (अव्यपेत आदियमक अन्त्यमक माला) ९, पादाद्यन्त विजातीय चतुष्पाद यमक ११, तृतीय चतुर्थ पाद (जयमङ्गल — मिथुन-) यमक १२, चतुष्पादादि (वृन्त) यमक १३, चतुष्पादान्त सजातीय (पुष्प-) यमक १४, एकपादादि-मध्य-व्यपेत विजातीय १५, प्रथम चतुर्थपादाभ्यास १६, एकपादमध्यान्त यमक १७, द्वि-तृतीयपादाभ्यास (गर्भ) यमक १८, महायमक (सादा) १९, श्लोकाभ्यास २०-२१, प्रथम पादादि अव्यपेत चतुर्थपादान्त अव्यपेत विजातीय यमक २२ ।