भारतकोश
काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary

महाकवि दण्डी द्वारा

DevanagariHindipublished270 पृष्ठ

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पृष्ठ 109

८६ काव्यादर्श [३।७३ उपलब्ध काव्यशास्त्रियोंमें दण्डी ही प्रथम आचार्य हैं, जिन्होंने नानाविध दुष्कर अलङ्कारोंका सुन्दर, व्यवस्थित और परिमार्जित निरूपण इन्हें अलङ्कार की सम्भव गरिमा प्रदान करते हुए किया है । काव्यशरीरमें शब्दालङ्कारोंको महत्त्व देकर संस्कृत काव्यमें पच्चीकारी को कलाके स्तरकी ओर उन्मुख करने वाले महाकवियोंमें भारवि, माघ और भट्टिके नाम उल्लेख्य हैं : भारविने (१) न केवल दुष्कर यमकोंका पर्याप्त प्रयोग किया है, अपितु (२) प्रतिलोम यमकके भी तीनों भेदोंका सुन्दर प्रयोग किया है ।१ इससे प्रतीत होता है कि भारविसे पूर्वके महाकवियों और काव्य- शास्त्रियोंमें यमकके ये भेद प्रसिद्ध हो चुके थे । दण्डीने उनका प्रसिद्ध स्वरूप ही निरूपित किया है । (३) भारविने विविध प्रकारके दुष्कर बन्धोंका तथा एकाक्षर, द्वयक्षर, और अतालव्यादि दुष्कर श्लोकोंका भी प्रणयन किया है ।२ भारवि इस पच्चीकारीके ज्ञात प्रथम कलाकार महाकवि हैं । माघ तो उनके नक़लची हैं । भारवि और माघने (१) यमकों, चित्रबन्धों और एकाक्ष- रादिका प्रणयन एक ही प्रकरणमें मिश्रित रूपमें किया है ।३ (२) माघ तक १. (क) वेत्रशाककुजे शैलेऽलेशैजेऽकुकशात्रवे । यात किं विदिशो जेतुं तुब्जेशो दिवि किं तया ।। किराता०१५।१८ (ख) ननु हो मथना राघो घोरा नाथमहो नु न । तयदातवदा भीमा माभीदा बत दायत ॥ २० (ग) निशितासिरतोऽभीको न्येजतेऽमरणा रुचा । सारतो न विरोधी नः स्वाभासो भरवानुत ॥ २२ तनुवारभसो भास्वानधीरोऽविनतोरसा । चारुणा रमते जन्ये कोऽभीतो रसिताशिनि ॥ २३ २. किरातार्जुनीय, एकाक्षर पाद १५।५, एकाक्षर श्लोक १४, द्वयक्षर श्लोक ३८, निरोष्ठ्य श्लोक ७, २६, आद्यन्तयमक ३७, पादादियमक १०, पादाद्यन्तयमक ३१, पादान्तादियमक ८, द्वि-चतुर्थपादयमक ३५, शृङ्खलायमक ४२, समुद्गयमक १६, महायमक ५२, पादप्रतिलोम १८, अर्धप्रतिलोम २०, श्लोकप्रतिलोम २२-२३, गूढचतुर्थपाद ४, अर्थ- त्रयवाचक ४५, गोमूत्रिकाबन्ध १२, सर्वतोभद्र २५, अर्धभ्रमरक २७ । ३. शिशुपालवध एकाक्षरपाद १६।३, द्वि-चतुर्थपादाभ्यास यमक ५, १७, १६, २१, २५, ३१, ३८, ४२, ४८, ५०, ५२, ५४, ५६, ६४, ७४, ७६ ७८, ८०, ८२, निरोष्ठ्य श्लोक ११, सन्दंशयमक १३, विषमपादादि-